नई दिल्ली, 23 मई (वेब वार्ता)। आठवें वेतन आयोग को लेकर केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनधारकों के बीच चर्चाएं तेज हो गई हैं। आयोग के गठन और वेतन संशोधन की प्रक्रिया को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही हैं। इसी बीच ‘फिटमेंट फैक्टर’ एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है, क्योंकि वेतन और पेंशन में होने वाली वृद्धि काफी हद तक इसी पर निर्भर करती है।
फिटमेंट फैक्टर एक ऐसा गुणांक होता है, जिसके आधार पर कर्मचारियों की मौजूदा मूल वेतन को संशोधित वेतन में बदला जाता है। सरल शब्दों में कहें तो यह वह संख्या है जिससे वर्तमान मूल वेतन को गुणा कर नई मूल वेतन तय की जाती है। यही कारण है कि वेतन आयोगों के दौरान इस पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है।
फिटमेंट फैक्टर का मूल सूत्र इस प्रकार माना जाता है— नई मूल वेतन = मौजूदा मूल वेतन × फिटमेंट फैक्टर। यदि फिटमेंट फैक्टर अधिक तय होता है, तो वेतन, पेंशन, वार्षिक वृद्धि और बकाया राशि पर भी उसका सीधा प्रभाव पड़ता है।
सातवें वेतन आयोग के दौरान फिटमेंट फैक्टर 2.57 रखा गया था। इसके परिणामस्वरूप न्यूनतम मूल वेतन 7,000 रुपये से बढ़कर 18,000 रुपये हो गई थी। इसी उदाहरण के आधार पर कर्मचारी अब आठवें वेतन आयोग में संभावित वृद्धि का आकलन कर रहे हैं।
हालांकि आठवें वेतन आयोग के लिए अभी तक कोई आधिकारिक फिटमेंट फैक्टर घोषित नहीं किया गया है। विभिन्न कर्मचारी संगठनों और विशेषज्ञों की ओर से अलग-अलग सुझाव दिए जा रहे हैं। कुछ संगठनों ने 3.0 से 3.83 तक के फिटमेंट फैक्टर की मांग उठाई है, जबकि कई अनुमान इससे कम भी लगाए जा रहे हैं। अंतिम निर्णय आयोग की सिफारिशों और केंद्र सरकार की स्वीकृति के बाद ही सामने आएगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि पहले पांच वेतन आयोगों में ऐसा कोई एक निश्चित गुणांक नहीं होता था और वेतन संशोधन पूरी वेतन संरचना में बदलाव के जरिए किया जाता था। बाद के आयोगों में फिटमेंट फैक्टर की व्यवस्था अधिक स्पष्ट रूप में सामने आई, जिससे वेतन निर्धारण की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल हुई।
केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनधारकों की नजर अब आयोग की आगामी सिफारिशों पर टिकी है। माना जा रहा है कि फिटमेंट फैक्टर को लेकर होने वाला फैसला आने वाले वर्षों में लाखों कर्मचारियों की आय और वित्तीय स्थिति पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।




