1991 आर्थिक संकट: जब भारत को विदेश भेजना पड़ा था अपना सोना

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नई दिल्ली, 15 मई (वेब वार्ता)। साल 1991 भारत के आर्थिक इतिहास का वह दौर था, जब देश गंभीर वित्तीय संकट के कगार पर पहुंच गया था। हालात इतने खराब हो चुके थे कि भारत के पास केवल कुछ दिनों तक आवश्यक वस्तुओं का आयात करने लायक विदेशी मुद्रा बची थी। आर्थिक दिवालियापन से बचने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को देश का सोना गिरवी रखकर विदेशों से डॉलर जुटाने पड़े। उस समय यह खबर पूरे देश के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं थी, लेकिन यही फैसला आगे चलकर भारत की नई आर्थिक दिशा का आधार बना।

1990-91 के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था भारी विदेशी कर्ज, राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रही थी। इसी बीच खाड़ी युद्ध शुरू हो गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं। विदेशों में काम कर रहे भारतीयों से आने वाला धन भी घटने लगा। इससे देश की आर्थिक स्थिति और खराब हो गई।

विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घटता गया और स्थिति यहां तक पहुंच गई कि भारत के पास केवल एक सप्ताह तक आयात करने लायक डॉलर बचे थे। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भारत की क्रेडिट रेटिंग कम कर दी और विदेशी बैंक भारत को नया कर्ज देने से बचने लगे। ऐसे में देश के सामने विदेशी भुगतान रोकने यानी डिफॉल्ट का खतरा खड़ा हो गया।

इस संकट से निपटने के लिए तत्कालीन सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने आपातकालीन उपायों पर विचार किया। अंततः फैसला लिया गया कि भारत अपना सोना गिरवी रखकर विदेशी बैंकों से डॉलर उधार लेगा। रिजर्व बैंक ने करीब 46.91 टन सोना इंग्लैंड भेजा, जिसके बदले लगभग 405 मिलियन डॉलर जुटाए गए। इससे पहले सरकार ने 20 टन जब्त सोना बेचकर 215 मिलियन डॉलर की व्यवस्था की थी।

जुलाई 1991 में मुंबई स्थित रिजर्व बैंक के भंडार से भारी सुरक्षा के बीच सोना ट्रकों में भरकर सांता क्रूज़ हवाई अड्डे तक पहुंचाया गया। वहां से इसे कार्गो विमानों के जरिए विदेश भेजा गया। पूरे अभियान को बेहद गोपनीय रखा गया था। हालांकि बाद में एक अंग्रेजी समाचार पत्र में इस खबर के प्रकाशित होने के बाद देशभर में हलचल मच गई।

भारत में सोना केवल एक धातु नहीं बल्कि सामाजिक सम्मान, सुरक्षा और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में देश का सोना विदेश भेजे जाने को कई लोगों ने राष्ट्रीय अपमान के रूप में देखा। हालांकि आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उस समय यह कदम नहीं उठाया जाता, तो भारत विदेशी भुगतान करने में असमर्थ हो सकता था।

इसी आर्थिक संकट के बीच 21 जून 1991 को पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में नई सरकार बनी। इसके बाद वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने देश में बड़े आर्थिक सुधारों की शुरुआत की। लाइसेंस राज में ढील, विदेशी निवेश को बढ़ावा और बाजार आधारित नीतियों जैसे कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए। इन्हीं सुधारों ने आगे चलकर भारतीय अर्थव्यवस्था को नई गति दी।

भारत ने नवंबर 1991 तक सोने के बदले लिया गया कर्ज चुका दिया था। बाद के वर्षों में देश की आर्थिक स्थिति लगातार मजबूत होती गई। रिजर्व बैंक ने विदेशों में रखे गए सोने का बड़ा हिस्सा वापस भारत लाना शुरू किया। मार्च 2026 तक रिजर्व बैंक के पास लगभग 880.5 टन सोना मौजूद है, जिसकी कीमत 115 अरब डॉलर से अधिक बताई जाती है।

हाल के समय में एक बार फिर सोने की चर्चा बढ़ी है। मध्य पूर्व में जारी तनाव और तेल कीमतों में वृद्धि के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से गैर-जरूरी सोना खरीदने से बचने की अपील की है। सरकार का मानना है कि अत्यधिक सोना आयात करने से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है। आंकड़ों के अनुसार भारत ने वर्ष 2025-26 में लगभग 72 अरब डॉलर का सोना आयात किया, जो 1991 में जुटाई गई राशि से कई गुना अधिक है।

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार 1991 का संकट भारत के लिए कठिन जरूर था, लेकिन इसी दौर ने देश को आर्थिक सुधारों और आत्मनिर्भरता की नई राह दिखाई। रिजर्व बैंक द्वारा विदेश भेजा गया सोना केवल आर्थिक मजबूरी का प्रतीक नहीं था, बल्कि आधुनिक भारतीय अर्थव्यवस्था की नई शुरुआत का महत्वपूर्ण मोड़ भी साबित हुआ।

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