पश्चिम बंगाल में नई मतदाता सूची से बदले सियासी समीकरण, तृणमूल कांग्रेस की बढ़ी चिंता

कोलकाता, 08 मई (वेब वार्ता)। पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों से पहले जारी नई मतदाता सूची ने राज्य की राजनीति में हलचल तेज कर दी है। बीते चुनाव में ‘खेला होबे’ के नारे के सहारे भारतीय जनता पार्टी को मात देने वाली तृणमूल कांग्रेस अब खुद राजनीतिक चुनौतियों से घिरती दिखाई दे रही है। नई मतदाता सूची और विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के बाद पार्टी के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सीमावर्ती और मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में भारी कमी दर्ज की गई है, जिससे कई सीटों के चुनावी समीकरण बदल गए हैं। इसके साथ ही चुनाव आयोग द्वारा प्रशासनिक अमले पर कड़ी निगरानी और बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों की तैनाती ने चुनावी मुकाबले को और अधिक दिलचस्प बना दिया है।

शुरुआत में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर ममता बनर्जी  और तृणमूल कांग्रेस संसद से लेकर सड़क तक आक्रामक रुख अपनाते नजर आए थे। लेकिन न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की घटना के बाद राज्य सरकार को सर्वोच्च न्यायालय की नाराजगी का सामना करना पड़ा। इसके बाद जारी नई मतदाता सूची में लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम कटने से तृणमूल की रणनीति को बड़ा झटका लगा है।

बताया जा रहा है कि नई सूची में नाम दर्ज कराने में असफल रहने वालों में बड़ी संख्या मुस्लिम समुदाय से जुड़े मतदाताओं की है, जिन्हें तृणमूल का मजबूत समर्थक माना जाता रहा है। सामान्य विधानसभा क्षेत्रों में औसतन 31 हजार वोट कम हुए हैं, जबकि मुस्लिम बहुल या प्रभाव वाली सीटों पर यह आंकड़ा 45 से 50 हजार तक पहुंच गया है।

मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, नादिया, मालदा तथा उत्तर और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में सबसे अधिक असर देखा गया है। इन जिलों को लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। जानकारी के अनुसार केवल इन छह जिलों में ही लगभग 50 लाख मतदाता सूची से बाहर हुए हैं।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया का असर लगभग 157 विधानसभा सीटों पर सीधे तौर पर दिखाई दे सकता है। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच मतों का अंतर सात से आठ प्रतिशत के बीच रहा था। ऐसे में मतदाताओं की संख्या में हुई यह कमी कई सीटों पर परिणाम बदल सकती है।

पिछले चुनावों में 57 ऐसी सीटें थीं जहां जीत और हार का अंतर मात्र 600 से 8 हजार वोटों के बीच था। अब नई मतदाता सूची के बाद करीब 100 मुस्लिम बहुल और 57 करीबी मुकाबले वाली सीटों पर राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदलने की संभावना जताई जा रही है।

इस बार चुनाव आयोग ने निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सख्त निगरानी रखी है। मुख्य सचिव और पुलिस अधिकारियों में बदलाव के साथ पांच डीआईजी स्तर के अधिकारियों, 13 जिलों के पुलिस अधीक्षकों और जिलाधिकारियों समेत 200 से अधिक थाना प्रभारियों का तबादला किया गया है।

इसके अलावा पहली बार राज्य में अर्धसैनिक बलों की 2,000 कंपनियां तैनात करने का निर्णय लिया गया है। इनमें से 500 कंपनियां पहले ही तैनात की जा चुकी हैं। अधिकारियों का दावा है कि इस सख्ती के कारण चुनाव पूर्व हिंसा की घटनाओं पर काफी हद तक रोक लगी है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि नई मतदाता सूची और प्रशासनिक बदलावों के कारण इस बार पश्चिम बंगाल का चुनाव पहले की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण और रोमांचक हो सकता है।

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