पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हो चुकी है। नई सरकार के सामने समस्याओं का अम्बार लगा है। समाधान ढूंढने के साथ-साथ उसे क्रियान्वित करने का चुनौती किसी दावानल से कम नहीं है। पुरानी सरकारों के उपकारों तले पूरी तरह से दब चुके विलासतापूर्ण जीवन जीने वाले अधिकारियों की मानसिकता में जादुई परिवर्तन सम्भव नहीं है। संवैधानिक व्यवस्था के तहत कार्यपालिका के अन्तहीन अधिकार हमेशा से ही विधायिका के नासमझ जिम्मेवारों के लिए परेशानी का कारण बनते रहे हैं। जनप्रतिनिधियों के सीमित कार्यकाल के सामने दीर्घकालिक अधिकारी हमेशा ही ठहाके लगाते रहे हैं। पलक झपकते ही अवैध वसूली वाले नाके, गुण्डा टैक्स लेने वाली जमातें, अतिक्रमणकारियों के गिरोह, राजनैतिक संरक्षण में अत्याचार करने वाले माफिया भूमिगत भले ही गये हों परन्तु उनकी उपस्थिति पर्दे के पीछे अभी भी बनी हुई है। सक्रियता ने निष्क्रियता का जामा भले ही पहन लिया हो परन्तु ऊपर से राख दिखने वाले ढेर के नीचे चिंगारी नहीं बल्कि सीमापार से भरा गया लावा अभी भी धधक रहा है। रोको, देखो और फिर चलो की नीतियों को अपनाने वाले राष्ट्रविरोधियों ने फिलहाल अवसर की तलाश में मौन धारण कर लिया है। मीरजाफरों की यह फौज केवल पश्चिमी बंगाल तक ही सीमित नहीं है। उसका विस्तार समूचे देश में हो चुका है। महानगरों से लेकर गांवों की आबादी तक में भितरघातियों, घुसपैठियों तथा राष्ट्रद्रोहियों की एक बडी संख्या मौजूद है जिसे क्षेत्रीय नेताओं, स्थानीय अधिकारियों तथा समाजसेवा का ढोंग रचने वाले कथित बुद्धिजीवियों का खुला संरक्षण प्राप्त है। डंडों में लगे झंडों के रंग आज भी अपनी कट्टरता, एकता और क्रूरता का खुलेआम यशगान कर रहे हैं। ऐसे में गंगा के सफाई अभियान को गंगोत्री से ही चलाना होगा तभी मोक्षदायनी का वास्तविक स्वरूप सामने आ सकेगा। गंगासागर के घाटों को सफाई से समूची पतित पावनी के स्वच्छ होने के आधिकारिक आंकडे केवल और केवल छलावा मात्र होता है। वास्तविकता तो यह है कि कार्यपालिका की जडों में मट्ठा पिलाने वाले चन्द अधिकारियों ने समूची जमात को कल्याण, सुरक्षा और सहायता का तिलिस्म दिखाकर संगठन का निर्माण किया और फिर संगठन की शक्ति को हथियार बनाकर स्वार्थ सिद्धि के छुपे लक्ष्य को साधने की किस्तों में कोशिशें शुरू कर दीं। ऐसे लोगों को राष्ट्रवाद की मुख्यधारा से जोडना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। यही वह जमात है जो सीमापार के षडयंत्रों को स्लीपर सेल्स के माध्यम से क्रियान्वित होने में सहयोग करती है। पहलगाम हमले जैसी दुःखद घटनाओं के लिए एक भी अधिकारी को उत्तरदायी नहीं ठहराया गया। उस क्षेत्र की व्यवस्था के लिए सरकारी खजाने से मोटी-मोटी पगार पाने वाले आज भी अपने वातानुकूलित भवनों में सुख भोग रहे हैं। सभी पीडादायक घटनायें आकस्मिक नहीं होतीं। उनकी जानकारियों स्थानीय अधिकारियों से लेकर धरातली कर्मचारियों तक को पूरी तरह से रहती है परन्तु किन्हीं खास कारणों से वे अपने कर्तव्यों की स्वयं ही चिता जलाते रहते हैं। उन्हें अपने आकाओं पर पूरा भरोसा रहता है जो प्रत्येक विसम परिस्थितियों में हमेशा ही बचाते रहे हैं। सत्य का शोर जब ज्यादा तेज होने लगता है तब स्थानान्तरण, निलंबन, जांच के आदेश जैसे दिखावे किये जाते हैं। आरोपियों की मानसिकता परिवर्तित करने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं होते, उस घातक कृत्य के लिए दण्डात्मक विधान नहीं अपनाया जाता और न ही उसके कृत्यों पर निगरानी करने वाली श्रंखला को कोई वरिष्ठ कभी प्रभावित किया जाता है। ईमानदाराना बात तो यह है कि आज समूचे देश में पश्चिम बंगाल जैसे ही हालात मौजूद हैं। अन्तर केवल इतना है कि ज्यादातर सरकारों का स्वरूप ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेसी सरकार की मानसिकता से फिलहाल पूरी तरह मेल नहीं खा रहा है जिसके कारण ज्वालामुखी की ऊपरी परत अभी तक फटी नहीं है। कल्पना करें कि टुकडे-टुकडे गैंग को समर्थन देने वालों, आतंकियों को मासूम बताने वालों, विभाजनकारी नारे बुलंद करवाने वालों, जातिगत आधारों पर संगठन बनाने वालों, सम्प्रदायगत जहर उगलने वालों के नेतृत्व में स्थापित दलों की सत्ता आते ही हालात कैसे होंगे। बंगाल को तो केवल बानगी के तौर पर देखा जाना चाहिए। ऐसे राज्यों में तैनात कार्यपालिका के अधिकांश वेतनभगियों की मानसिकता का स्वरूप भी राष्ट्रवादी न होकर स्वार्थवादी हो चुका है। संविधान में विनिमय के सिद्धान्त पर वेतन के बदले में कर्तव्यों, दायित्वों और जिम्मेवारियों को निभाने की व्यवस्था की गई है परन्तु धरातली स्वरूप इससे बिलकुल अलग है। सुविधा शुल्क, अतिरिक्त आय तथा भेंट का नया स्वरूप सामने आ चुका है जिसे अप्रत्यक्ष में सरकार, समाज और समूहों द्वारा स्वीकारा भी जा चुका है। अव्यवस्था की जड़ पर प्रहार करने का साहस किसी भी सरकार, संगठन या व्यक्ति में नहीं है। राष्ट्रद्रोहियों की जमातों के शिकंजे में समूचा राष्ट्र तड़फ रहा है। तड़फन की चीखें सुनकर भी सभी उत्तरदायी उसे निरंतर अनसुना कर रहे हैं। आम आवाम पर लागू होने वाले नियम, कानून और कायदों से कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में कार्यरत वेतनभोगियों को पृथक कैसे रखा जा सकता है। सरकारी खजाने से पैसे पाने वालों के परिवारजनों के लिए केवल सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग की बाध्यता क्यों नहीं की जा सकती। उनके परिवारजनों को अत्याधुनिक सुविधायें, अतिविशिष्ट महात्व और अतिरिक्त लाभ के अवसर क्यों उपलब्ध कराये जाते हैं। ऐसे विभेद करने वालों पर सामाजिक ढांचे को तोडने वाले कानून लागू क्यों नहीं होते। चुनौतियों के यक्ष प्रश्न केवल शुभेन्दु अधिकारी के समक्ष ही नहीं हैं बल्कि समूचे देश के सामने है जिसका उत्तर पाये बिना कथित शान्ति के वर्तमान स्वरूप का ज्यादा दिनों तक टिका रहना असम्भव है। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

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राष्ट्र के हालातों को उजागर करती बंगाल की बानगी
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