-तनवीर जाफ़री- 
पिछले दिनों देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हुये। इनमें सबसे अधिक चर्चा पश्चिम बंगाल चुनाव परिणामों की रही। चर्चा का कारण था पश्चिम बंगाल राज्य में पहली बार दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी का सत्ता में आना। दरअसल पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहाँ प्रायः धर्मनिरपेक्ष सत्तारूढ़ दलों का लंबे समय तक राज करने का इतिहास रहा है। मिसाल के तौर पर स्वतंत्रता के बाद 1947 से लेकर 1977 तक यानी लगभग 30 वर्षों तक यहाँ लगातार कांग्रेस की सरकार रही। कांग्रेस शासन में बिधान चंद्र रॉय, प्रफुल्ल चंद्र सेन, और सिद्धार्थ शंकर रे जैसे दिग्गज नेता राज्य के मुख्यमंत्री रहे थे। बाद में 1977 में कांग्रेस को हराकर वाम मोर्चा सत्ता में आया और लगातार 34 वर्षों वामपंथी सरकार का शासन रहा। उसके बाद कांग्रेस छोड़कर अपनी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस बनाने वाली ममता बनर्जी ने मई 2011 में सत्ता संभाली और मई 2026 तक यानी लगातार 15 वर्षों तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया है। लगातार तीन कार्यकालों तक सत्ता संभालने वाली राज्य की वह पहली महिला मुख्यमंत्री भी रही हैं। 1947 से लेकर 2026 तक राज्य में जितनी भी सरकारें बनीं वे सभी धर्मनिरपेक्ष सरकारें थीं परन्तु यह पहला मौक़ा है जबकि दक्षिणपंथी विचारधारा की भाजपा ने यहाँ सत्ता संभाली है। 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद जिसतरह सत्ता व अनेक सरकारी संस्थाओं का दुरूपयोग कर,दूसरे राजनैतिक दलों में फूट डालकर या तोड़फोड़कर,भय लालच आदि के बल पर यहाँ तक कि राज्यपालों के पद का खुला राजनैतिक दुरूपयोग कर देश के अनेक राज्यों में भाजपा द्वारा अपनी सरकारें बनाई गयी हैं उसे देखकर पश्चिम बंगाल में भाजपा की इस बार सरकार बनना कोई ख़ास आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिये।
वैसे भी जिसतरह भाजपा को अपनी मनपसंद यानी ‘साम्प्रदायिकता ‘ की ‘पिच’ पर यहाँ खेलने का मौक़ा मिला उसमें निश्चित रूप से उसे महारत हासिल हो चुकी है। जिन शुभेंदु अधिकारी को भाजपा ने अपना पहला मुख्यमंत्री बनाया है वह भी मूल रूप से तृणमूल कांग्रेस के ही नेता थे परन्तु 2020 में भाजपा में शामिल होकर उन्होंने राज्य में भाजपा के आधार का विस्तार किया। यह वही शुभेंदु अधिकारी हैं जिन्हें 2014 में नारदा स्टिंग ऑपरेशन मामले में एक फ़र्ज़ी कंपनी के प्रतिनिधियों से रंगे हाथ नक़द रिश्वत लेते हुए एनडीटीवी के मैथ्यू सैमुअल द्वारा किये गये स्टिंग वीडीओ में दिखाया गया था। 2016 में बंगाल में एक चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी ने शुभेंदु जैसे भ्रष्ट व रिश्वतख़ोर नेताओं का ज़िक्र भी किया था। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मार्च 2017 में नारदा स्टिंग ऑप्रेशन की सीबीआई जांच के आदेश भी दिए थे। स्टिंग ऑप्रेशन के बाद, तृणमूल कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ-साथ शुभेंदु अधिकारी से भी सीबीआई व ईडी ने पूछताछ की थी। बाद में चूँकि शुभेंदु अधिकारी भाजपा में शामिल हो गए इसलिये उन्हें इस मामले में गिरफ़्तार नहीं किया गया। सीबीआई ने 2021 में बताया भी कि उन्होंने शुभेंदु अधिकारी और मुकुल रॉय के ख़िलाफ़ जांच के लिए सरकार से आवश्यक मंज़ूरी न मिलने के कारण कार्रवाई नहीं की। गोया भाजपा की ‘वाशिंग मशीन’ से पाक साफ़ होने वाले नेताओं में शुभेंदु अधिकारी भी मुख्य नेता हैं।
इस समय राज्य में भाजपा के निर्वाचित 207 विधायकों में लगभग 35 विधायक ऐसे हैं जो 2021–2026 के बीच या उससे पहले तृणमूल, कांग्रेस या वामपंथी दलों से आए हुये “दलबदलू ” हैं। बहरहाल शुभेंदु अधिकारी अपनी जिस विशेषता के चलते भाजपा की आँखों का तारा बने हैं वह है उनके घोर ज़हरीले व साम्प्रदायिकतावादी बयान। चुनाव प्रचार से लेकर चुनाव जीतने तक उन्होंने जैसी भाषा का प्रयोग किया है वह किसी धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक देश के किसी नेता की भाषा क़तई नहीं कही जा सकती। जैसे कि नंदीग्राम में अपनी जीत के बाद, उन्होंने कहा कि ‘मुसलमान मतदाता कट्टरपंथी हैं और उन्होंने टीएमसी को एकतरफ़ा वोट दिया है। उन्होंने कहा कि “नंदीग्राम की हिंदू जनता ने मुझे फिर से जिताया। वहां मुसलमान वोट पूरा का पूरा टीएमसी को मिला। इसलिए, मैं अब नंदीग्राम के हिंदुओं के लिए काम करूँगा”। इसी तरह उन्होंने मतदान के दौरान एक अत्यंत विवादास्पद बयान देते हुये कहा था कि’ हिंदू वोट एकजुट होकर बीजेपी को मिले और मुस्लिम वोट टीएमसी को।” उन्होंने एक जनसभा के दौरान मुसलमानों को ‘कट्टरवादी’ कहते हुये कहा था कि कट्टर मुसलमान ममता बनर्जी के साथ हैं।” भाजपा की जीत के बाद उन्होंने यह भी कहा था कि वह राज्य के अल्पसंख्यकों के लिये नहीं, बल्कि ‘हिंदुत्व’ के लिए काम करेंगे।
शुभेंदु अधिकारी की मुसलमानों के प्रति नफ़रत की पराकाष्ठा को उनके दिसंबर 2025 के उस बयान से भी समझा जा सकता है जिसमें उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुये हमलों के विरोध में कोलकता में आयोजित एक रैली के दौरान कहा था कि बांग्लादेश को भी “उसी तरह सबक़ सिखाया जाना चाहिए जैसे इज़राइल ने ग़ज़ा को सिखाया”। उन्होंने आगे कहा कि “हमारे 100 करोड़ हिंदू और हिंदू हितों के लिए काम कर रही सरकार को उन्हें वैसे ही सबक़ सिखाना चाहिए’। ज़रा सोचिये जिस ग़ज़ा नरसंहार को लेकर दुनिया के कई प्रमुख देश इस्राईल से रिश्ते ख़त्म कर रहे हैं, जिस ग़ज़ा नरसंहार की वजह से अंतर्राष्ट्रीय अदालत ने इस्राईली प्रधानमंत्री के विरुद्ध वारण्ट जारी कर रखा है उस तरह के जनसंहार से प्रेरणा लेने वाला व्यक्ति पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के पद पर ‘सुशोभित’ हुआ है ? शुभेंदु अधिकारी के इस विवादित बयान के बाद इसपर व्यापक राजनीतिक विवाद उत्पन्न हुआ था। भाजपा विरोधियों ने इसे “नग्न नफ़रत भरा भाषण”और “सामूहिक हत्या और जातीय सफ़ाये के लिए ख़ून की प्यासी कॉल” तक क़रार दिया था। बहरहाल आज वही शुभेंदु अधिकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली पसंद के रूप में उभरे हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि सत्ता हथियाने के बाद भ्रष्ट व घोर साम्प्रदायिकतावादी सोच रखने वाले व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना देना और ऐसे भ्रष्ट व्यक्ति को सत्ता में लाने के लिये चुनाव आयोग से लेकर अन्य केंद्रीय संस्थाओं का दुरुपयोग करना यहाँ तक कि केंद्रीय सुरक्षा बलों का भी दुरुपयोग करना, मीडिया को अपने पक्ष में बोलने के लिये बाध्य करना आलोचना करने वाले मीडिया व सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर नकेल कसना देश में साम्प्रदायिक विभाजन कराने वाले लोगों को खुली छूट देना क्या यही लोकतंत्र की हक़ीक़त है या फिर हम भारतवासी लोकतंत्र का केवल भ्रम पाले हुये बैठे हैं?


