-

मोदी सरकार पर बढ़ता दबाव: राहुल गांधी की भविष्यवाणी और एसआईआर विवाद

-सचिन कुमार गौतम

राहुल गांधी ने चार महीने पहले, यानी मई में, एक ऐसा दावा किया था जिस पर उस वक्त भाजपा ने खूब हंसी उड़ाई थी। उन्होंने कहा था कि मोदी सरकार एक साल के भीतर गिर जाएगी। उस समय भाजपा के पास बंगाल और असम चुनावों में बड़ी जीत का आत्मविश्वास था, इसलिए पार्टी नेताओं ने राहुल गांधी के बयान को सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी बताकर खारिज कर दिया। भाजपा का तर्क था कि जिस पार्टी का गठबंधन चुनावी मैदान में टिक नहीं पा रहा, वह सरकार गिराने की बात कैसे कर सकता है।

लेकिन राहुल गांधी ने अपनी बात पर डटे रहने की कोशिश की। उन्होंने बार-बार कहा कि उन्हें सिस्टम के अंदर से ऐसी खबरें मिल रही हैं, जो मोदी सरकार के खिलाफ जा रही हैं। उनका इशारा सिर्फ संसद की राजनीति या गठबंधन की गणित की तरफ नहीं था। वे उस असंतोष की बात कर रहे थे, जो सत्ता के भीतर और प्रशासनिक तंत्र के अंदर पनप रहा था। फिर 30 सितंबर को उन्होंने एक बार फिर कहा कि बहुत जल्द देश में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।

भाजपा ने इस बार भी उनके बयान पर खिल्ली उड़ाई। पार्टी नेताओं ने कहा कि राहुल गांधी हर कुछ महीनों में सरकार गिरने की बात करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में मोदी सरकार मजबूत है। लेकिन दिल्ली से लेकर मुंबई तक और देश के कई हिस्सों में सरकार के खिलाफ उठ रहे विरोध, धरने और प्रदर्शनों ने राजनीतिक माहौल को बदलना शुरू कर दिया है। अब सवाल सिर्फ राहुल गांधी के बयान की सच्चाई का नहीं है, बल्कि यह है कि क्या सरकार के खिलाफ जनता का गुस्सा वाकई एक बड़े राजनीतिक बदलाव की दिशा में बढ़ रहा है।

एसआईआर विवाद और बढ़ता जन-विरोध

इस पूरे माहौल में सबसे बड़ा मुद्दा विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी एसआईआर, बन चुका है। मतदाता सूचियों की समीक्षा के नाम पर लाखों लोगों के नाम ड्राफ्ट सूचियों से बाहर निकलने के आरोपों ने एक गंभीर राजनीतिक और संवैधानिक बहस खड़ी कर दी है। सवाल यह है कि क्या यह प्रक्रिया वाकई मतदाता सूची को साफ करने के लिए है, या इसके जरिए कुछ वर्गों को मतदान के अधिकार से दूर किया जा रहा है।

इंडिया गठबंधन ने 30 सितंबर की बैठक में ऐलान किया था कि देशभर में वोट चोरी के मुद्दे पर मोर्चा खोला जाएगा। इसके बाद राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिक समाज के कई हिस्सों ने सड़क पर उतरना शुरू कर दिया। मुंबई में 2 अक्टूबर को प्रदर्शन हुआ और 10 अक्टूबर से फिर जंतर-मंतर पर धरने की चेतावनी दी गई। अभिजीत दीपके जैसे आंदोलनकारियों ने साफ कहा है कि पुलिस उन्हें जहां रोकेगी, वहीं जंतर-मंतर बन जाएगा। यह बयान दिखाता है कि आंदोलनकारी अब पुलिसी रोक-टोक से पीछे हटने की स्थिति में नहीं हैं।

गांधी जयंती के दिन दिल्ली में नेहा बोरा, योगेंद्र यादव, मनोज झा और संजय सिंह जैसे कई लोगों को पुलिस ने रोकने की कोशिश की। प्रदर्शनकारियों के साथ हुई कथित धक्का-मुक्की और रोक-टोक ने मामले को और गंभीर बना दिया। लेकिन पुलिस की कार्रवाई के बावजूद युवा प्रदर्शनकारी सड़क पर डटे रहे। अगले दिन जंतर-मंतर पर फिर बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। यह संकेत महत्वपूर्ण है कि विरोध अब सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि आम नागरिक और युवा भी इससे जुड़ रहे हैं।

चुनाव आयोग की साख पर सवाल

एसआईआर को लेकर जो विवाद पैदा हुआ है, उसने चुनाव आयोग की साख को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है और उसकी प्रतिष्ठा इस बात पर टिकी होती है कि वह सभी राजनीतिक दलों के प्रति निष्पक्ष रहे। लेकिन जब मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम हटने की बात सामने आती है और उसके बाद प्रक्रिया में बार-बार बदलाव किए जाते हैं, तो जनता का भरोसा टूटना स्वाभाविक है।

पहले चुनावों में भी गड़बड़ियों, बूथ कब्जे और दबंगई के आरोप लगते रहे हैं। विरोधी दल एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन इस बार आरोप सिर्फ किसी पार्टी या उम्मीदवार पर नहीं, बल्कि सीधे चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे हैं। यही इस मामले को पहले से अलग बनाता है। जब चुनाव आयोग पर ही भरोसा नहीं रहता, तो चुनावी प्रक्रिया की वैधता पर भी सवाल खड़े हो जाते हैं।

चुनाव आयोग ने अब निर्देश दिया है कि मतदाता सूची से छूट गए लोगों, पहली बार मतदान करने वाले युवाओं और नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए विशेष अभियान चलाया जाए। यह कदम स्वागत योग्य जरूर है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है कि जब पहले ही बड़े पैमाने पर नाम काटे गए, तो उसके बाद जोड़ने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी और निष्पक्ष होगी। जिन लोगों को नोटिस मिला, दस्तावेज मांगे गए और सुनवाई का सामना करना पड़ा, उनके लिए यह अभियान पर्याप्त राहत नहीं हो सकता।

दिल्ली में चुनाव आयोग ने ईआरओ के लिए ईसीआईनेट पोर्टल में नए विकल्प जोड़े हैं। इनके तहत कुछ मामलों में नोटिस पाने वाले मतदाता को बिना दस्तावेज जमा कराए और कुछ स्थितियों में बिना सुनवाई के भी अंतिम मतदाता सूची के लिए योग्य घोषित किया जा सकता है। यह बदलाव उस विवाद के बाद आया है, जब आरोप लगे थे कि मतदाताओं से अनावश्यक दस्तावेज मांगे जा रहे हैं और उन्हें परेशान किया जा रहा है। लेकिन नियमों में बार-बार बदलाव से भ्रम भी पैदा होता है। जनता को समझ नहीं आता कि आखिर कौन सा नियम लागू है और उसका अधिकार किस तरह सुरक्षित होगा।

नोटबंदी और जीएसटी जैसी याद

एसआईआर के दौरान नियमों में लगातार बदलाव को कई लोग नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के दौर से मिला रहे हैं। उस समय भी नियम बार-बार बदले गए थे और आम जनता को भारी परेशानी झेलनी पड़ी थी। नोटबंदी में नकदी की किल्लत, लंबी कतारें और छोटे कारोबारियों का नुकसान देश ने देखा था। जीएसटी के शुरुआती दौर में भी व्यापारियों को नियमों की उलझन और अनुपालन का बोझ झेलना पड़ा था।

आर्थिक नुकसान को शायद समय के साथ किसी हद तक पूरा किया जा सकता है, लेकिन मतदान का अधिकार छीन लेना उससे कहीं ज्यादा गंभीर मुद्दा है। वोट लोकतंत्र की सबसे बुनियादी शक्ति है। अगर करोड़ों लोग बिना किसी स्पष्ट और निष्पक्ष प्रक्रिया के मतदाता सूची से बाहर हो जाते हैं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं रह जाती। यह लोकतंत्र पर सीधा हमला बन जाता है।

कानूनी जांच और न्यायिक निराशा

इस बीच वकीलों के संगठन लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने एसआईआर की वैधता की जांच के लिए एक आयोग गठित किया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पांच पूर्व न्यायाधीश शामिल हैं। यह आयोग यह जांच करेगा कि चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया संविधान और कानून के अनुरूप है या नहीं, और इसका पात्र मतदाताओं के अधिकारों पर क्या असर पड़ा। देशभर में जनसुनवाई, मतदाता सूची से नाम जोड़ने और काटने के आंकड़ों का विश्लेषण तथा कानूनी समीक्षा की जाएगी। दिसंबर 2026 तक अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक किए जाने की बात कही गई है।

इस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एम. बी. लोकुर करेंगे। इसमें जस्टिस ए. के. पटनायक, जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बदर दुर्रेज अहमद, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रेखा शर्मा और पटना हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अंजना प्रकाश शामिल हैं। इतने स्तर के पूर्व न्यायाधीशों का इस मुद्दे से जुड़ना बताता है कि एसआईआर को लेकर चिंता सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक भी है।

लेकिन ऐसे आयोग के गठन का एक और संदेश भी है। यह दर्शाता है कि शीर्ष अदालत से तुरंत और प्रभावी हस्तक्षेप की उम्मीद को लेकर देश में निराशा बढ़ रही है। एसआईआर के तहत देशभर के 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं को ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से बाहर किए जाने का दावा किया जा रहा है। इनमें करीब 5.8 करोड़ मतदाता ऐसे हैं, जिनके नाम 10 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट सूचियों में शामिल नहीं हो पाए। यदि ये आंकड़े सही हैं, तो यह किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंताजनक स्थिति है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि अगर मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए तो वह हस्तक्षेप करेगा। लेकिन बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव से पहले, जब करीब 18,000 मतदाताओं की अपीलों को लेकर जल्द सुनवाई की मांग उठी, तो सीजेआई सूर्यकांत से जुड़े बार एंड बेंच के संदर्भ में यह कहा गया कि ये सिर्फ उपचुनाव हैं। यह जवाब उन लोगों के लिए निराशाजनक रहा होगा, जिनका नाम सूची से बाहर था और जिनका मतदान का अधिकार दांव पर था।

क्या बदलाव की घड़ी नजदीक है?

राहुल गांधी का दावा अभी एक राजनीतिक अनुमान ही है। सरकार गिरने के लिए संसद में संख्या, गठबंधन की राजनीति और सत्ता के भीतर की स्थिति जैसे कई ठोस कारक जरूरी होते हैं। लेकिन यह भी सच है कि जब सड़क पर जनता का गुस्सा, नागरिक समाज का विरोध, विपक्ष का एकजुट मोर्चा और संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल एक साथ उभरते हैं, तो राजनीतिक माहौल बदलने लगता है।

मोदी सरकार के लिए असली चुनौती अब सिर्फ विपक्ष नहीं है। चुनौती उस भरोसे की है, जो चुनाव आयोग, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ा है। अगर एसआईआर के जरिए मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा नहीं हो पाई, तो यह नुकसान सिर्फ किसी एक पार्टी का नहीं होगा। यह पूरे लोकतंत्र का नुकसान होगा। इसलिए अब जरूरी है कि मतदाता सूची की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो, प्रभावित मतदाताओं को तुरंत न्याय मिले और चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता साबित करे। तभी राहुल गांधी की बात सिर्फ एक भविष्यवाणी नहीं रहेगी, बल्कि देश के सामने एक गंभीर राजनीतिक सवाल बनेगी।

LATEST POSTS

“आई हैवन्ट डाइड येट!” लंदन की संसद के सामने गांधी की वह मूर्ति, जो इतिहास से सवाल करती है

गांधी की मूर्ति लंदन की Parliament Square में गांधी की मूर्ति Churchill की प्रतिमा के पास खड़ी है। यह सिर्फ एक स्मारक नहीं, बल्कि गांधी और ब्रिटिश साम्राज्य के बीच ऐतिहासिक संघर्ष और उनकी वैश्विक विरासत की कहानी भी है।

गांधी का पता…

गांधी का पता सिर्फ मकानों और शहरों की कहानी नहीं है। पोरबंदर से राजकोट, लंदन, दक्षिण अफ्रीका, साबरमती, सेवाग्राम और बिड़ला हाउस तक गांधी की ऐतिहासिक यात्रा जानिए।

क्या ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो सकती है?

-संजय कुमार शर्मा- चुनाव आयोग को लेकर देश में उठ रहा विवाद अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश...