-

मोएट्स से राजघाट: डर का साया और विपक्ष का संघर्ष

-सचिन कुमार गौतम

चुनाव चोरी के आरोपों के खिलाफ इंडिया गठबंधन का आंदोलन गुरुवार को और तेज हो गया। मंगलवार और बुधवार के बाद गुरुवार को भी इंडिया गठबंधन के तमाम सांसद फिर से एकत्र हुए। मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक बार फिर सभी सांसदों और कांग्रेस नेताओं को लंच पर बुलाया। इस बार कनॉट प्लेस के मोएट्स में सारा इंडिया ब्लॉक एकत्र हुआ तो अमित शाह ने पुलिस और सुरक्षा बलों का भारी जमावड़ा वहीं रेस्तरां के बाहर लगवा दिया।

निर्वाचित सांसदों का एक जगह जमा होना और साथ खाना खाना क्या किसी खतरे का संकेत है, जिससे निपटने के लिए पुलिस बुला ली गई? अभी ठंड का मौसम आते ही कोई सांसद मक्के की रोटी और साग की दावत अपने घर पर रखेगा, कोई मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा के लिए साथी सांसदों को न्यौता देगा, तो क्या इन सभी के बंगलों के बाहर पुलिस तैनात होगी? क्योंकि अब तक तो ऐसा कभी नहीं हुआ, लेकिन अब मोदी-शाह का डर इतना बढ़ चुका है कि जहां इंडिया के सांसदों को देखा वहीं पुलिस तैनात करवा दी।

यह डर स्वाभाविक भी है, क्योंकि चुनावों में धांधली करने के लिए एसआईआर का जो पूरा कुचक्र चलाया गया है, उसकी सच्चाई सामने आ रही है। विपक्ष के नेता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिलने का वक्त चाहते हैं, जो उन्हें नहीं मिल रहा और इस बात पर विरोध करने की इजाज़त भी नहीं मिल रही। गुरुवार को एक बार फिर तमाम विपक्षी नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में राजघाट की तरफ बढ़े और इन पंक्तियों के लिखे जाने तक एक बार फिर उन्हें रोकने की कोशिशें जारी हैं। राजघाट पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 लगा दी गई है, यानी भीड़ जमा होने से रोकने का ऐलान हो गया।

निर्वाचित सांसदों को जब भीड़ कहा जाने लगे तो यह समझना कठिन नहीं है कि लोकतंत्र की क्या गत बनाई जा रही है। वैसे जिस तरह से मोदी सरकार ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उठी आवाज को दबाने के लिए दमनकारी तरीके अपनाए हैं, उस पर गुरुवार को कांग्रेस ने देश भर में विरोध प्रदर्शन और तेज कर दिया। के सी वेणुगोपाल ने सात तारीख को ही राज्य, जिला और ब्लॉक/मंडल की कांग्रेस इकाइयों को पत्र लिखकर कहा था कि जो सलूक मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी समेत तमाम सांसदों के साथ किया गया, उसके विरोध के लिए आठ अक्टूबर को काला दिवस मनाया जाए।

कांग्रेस संगठन में नई चेतना

कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर पर तो लगातार हलचल देखने मिलती है, लेकिन जिला और मंडल स्तर की इकाइयों में स्थानीय नेताओं की सक्रियता से पार्टी मजबूत दिखती है। बीते 12 सालों में देश के कई हिस्सों में कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ता इसी वजह से हतोत्साहित थे कि उन्हें दिशा देने वाले नेता संगठन पर ध्यान नहीं देते थे। कई जगहों पर कांग्रेस इसी वजह से मजबूत नहीं हो पाई क्योंकि आपसी गुटबाजी रही। बीच में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस कमजोरी को दूर करने के लिए लगातार राज्य इकाइयों के साथ बैठकें की, संगठन को नए सिरे से मजबूत बनाने के लिए 2025 में काफी फैसले भी लिए गए। लेकिन उनका उतना असर नहीं हुआ, जितना अब हो रहा है। क्योंकि कार्यकर्ता भी देख रहे हैं कि राहुल गांधी के साथ-साथ समूचा विपक्ष सड़क पर उतर आया है। यह संघर्ष चुनावों में हार की निराशा को दूर करने में असरकारी साबित हो रहा है।

समानांतर आंदोलन: एक रणनीति या विभाजन?

हालांकि इस संघर्ष का नतीजा क्या निकलेगा, यह अनुमान लगाना थोड़ा मुश्किल है। क्योंकि एक ही मुद्दे यानी एसआईआर में गड़बड़ी और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर दो समानांतर आंदोलन चल रहे हैं। इंडिया गठबंधन के अलावा कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने भी 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया है। इससे पहले आठ अक्टूबर को बंगलुरु में उसने प्रदर्शन किया, जिसमें अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश राज और उनके साथ जर्मनी से आए यूट्यूबर ध्रुव राठी भी शामिल हुए। अब ये सभी लोग 10 अक्टूबर को भी जंतर-मंतर पर रहेंगे।

वामपंथी छात्र संगठन नेहा बोरा ने भी 10 अक्टूबर के आंदोलन के लिए सभी से जुटने का आह्वान किया है। अभी 2 अक्टूबर को ही योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण, कपिल सिब्बल, मनोज झा आदि के साथ भी नेहा बोरा ने वोट चोरी के खिलाफ प्रदर्शन किया था। जुलाई में पेपर लीक के खिलाफ भी ऐसे ही दो अलग-अलग मोर्चे खोले गए थे। राहुल गांधी तो छात्रों की गूंज कर ही रहे हैं, उधर सीजेपी ने भी आंदोलन किया था। हालांकि धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा हो गया तो दोनों को ही सफलता मिली। लेकिन इस आंदोलन में भी नेहा बोरा मंच के नीचे अनशनरत थीं और उन्हें राहुल गांधी ने खास तौर पर बुलाकर मुलाकात की थी, न्याय के लिए संघर्ष में साथ देने का वादा किया था। मगर अब नेहा बोरा ने वोट चोरी के खिलाफ 10 तारीख को तो एकजुट होने की बात कही, लेकिन इंडिया गठबंधन ने जो मोर्चा खोला है, जिस तरह रोज प्रदर्शन हो रहे हैं, उसमें उन्होंने साथ आने क्यों नहीं कहा, यह विचारणीय है।

छह तारीख को नेहा ने एक पोस्ट भी लिखी कि कुछ जन-प्रतिनिधि अपना काम कर रहे हैं और लोकतंत्र की रक्षा कर रहे हैं, जबकि दूसरे अपने दिन गिनने में लगे हैं…इस पोस्ट के साथ राहुल गांधी का वीडियो उन्होंने लगाया है जिसमें पुलिस उन्हें जबरन पकड़ कर ले जा रही है। नेहा अगर इसमें कुछ जनप्रतिनिधि की जगह सीधे राहुल गांधी का नाम लिखती तो उनकी पोस्ट का महत्व कुछ कम नहीं हो जाता। लेकिन ऐसा लग रहा है कि अब भी राहुल गांधी को निर्विवाद नेता मानने में कोई हिचक दिखाई जा रही है, या कोई झिझक है, जो ऐसा करने से रोक रही है।

सिविल सोसायटी की दूरी: एक गंभीर प्रश्न

राहुल गांधी या इंडिया का मौजूदा संघर्ष किसी नेहा बोरा, ध्रुव राठी, प्रकाश राज या अभिजित दीपके के प्रमाणपत्र या समर्थन का मोहताज नहीं है। इंडिया के निर्वाचित सांसदों ने जिस तरह सड़क की लड़ाई छेड़ी है, वह सराहनीय है। लेकिन सवाल यही है कि जब मंजिल एक ही है तो फिर सिविल सोसायटी खुलकर कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक के साथ क्यों नहीं आ रही। क्या उसने जो समानांतर मोर्चा खोला है, उसका उद्देश्य यही है कि आंदोलन होता तो दिखे लेकिन परिणाम वही आए जो मौजूदा सत्ता के हक में है। आखिर ये तमाम लोग इतने मासूम तो नहीं हैं कि इन्हें बंट कर लड़ने और मिल कर लड़ने का फर्क ही न पता हो।

दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर के प्रदर्शन के खिलाफ चेतावनी जारी की है और कहा है कि जंतर-मंतर पर कोई भी सभा अवैध होगी। 20,000 से अधिक सुरक्षाकर्मी दिल्ली में तैनात किए गए हैं। यह स्थिति बताती है कि सरकार विपक्षी आवाज़ को दबाने के लिए कितनी तत्पर है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या विपक्षी पार्टियां और सिविल सोसायटी एकजुट होकर इस चुनौती का सामना कर पाएंगे या फिर बंटे रहेंगे।

चुनाव चोरी के खिलाफ चल रहा आंदोलन भारत के लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। इंडिया गठबंधन और कॉकरोच जनता पार्टी दोनों ही मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। लेकिन इन दोनों के अलग-अलग मोर्चे पर लड़ने से आंदोलन की ताकत बंट सकती है। सिविल सोसायटी और छात्र संगठनों को भी इसमें शामिल होना चाहिए, लेकिन वे अभी तक पूरी तरह से इंडिया गठबंधन के साथ नहीं आए हैं।

यह स्थिति बताती है कि भारतीय राजनीति में अभी भी गुटबाजी और आपसी प्रतिद्वंद्विता बनी हुई है। लेकिन अगर लोकतंत्र की रक्षा करनी है, तो सभी विपक्षी ताकतों को एकजुट होना होगा। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन ने जो संघर्ष छेड़ा है, वह सराहनीय है, लेकिन इसकी सफलता तभी सुनिश्चित होगी जब सभी विपक्षी ताकतें एक साथ खड़ी होंगी।

LATEST POSTS

सत्ता को लोकतंत्र का जवाब: विपक्ष के प्रदर्शन से बढ़ी सरकार की चुनौती

-सचिन कुमार गौतमप्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की राजनीति पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि सत्ता का प्रभाव उनके निर्णयों...

लोकतंत्र की परीक्षा और एसआईआर पर उठते सवाल

-सचिन कुमार गौतमदेश के लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने वाली संस्थाओं की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर उठते सवाल चिंता का विषय हैं। मतदाता सूची के...

​हौसलों का सफर : वेब वार्ता के 17 वर्ष और आपकी दुआएं

​संघर्षों की तपती धूप में जलकर, अपनों की निस्वार्थ दुआओं के साये में पनपती एक आत्मीय यात्रा​सत्रह वर्ष...! ​काल के असीम महासमुद्र में सत्रह साल शायद...