-संजय कुमार शर्मा-
चुनाव आयोग को लेकर देश में उठ रहा विवाद अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों का विरोध सड़क से अदालत तक पहुंच चुका है। विशेष रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर विपक्ष गंभीर आरोप लगा रहा है। कुछ याचिकाओं में तो ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई और स्वतंत्र जांच की मांग तक की गई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हो सकती है? क्या जांच हो सकती है? क्या वे गिरफ्तार होकर जेल जा सकते हैं?
इन सवालों का जवाब भावनाओं से नहीं, कानून की किताब से तलाशना होगा। मौजूदा विवाद में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि एसआईआर से संबंधित कुछ फैसले अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। चुनाव आयोग ने इसके विपरीत कहा है कि आयोग के अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। यानी फिलहाल आरोप और आयोग का पक्ष दोनों सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं, लेकिन किसी न्यायालय ने इन आरोपों को आपराधिक अपराध के रूप में प्रमाणित नहीं किया है।
यहीं से असली कानूनी पेच शुरू होता है।
2023 का कानून ज्ञानेश कुमार के लिए कितना बड़ा कवच है?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों से संबंधित 2023 के कानून की धारा 16 बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि किसी वर्तमान या पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अथवा चुनाव आयुक्त के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन में किए गए किसी कार्य, बात या कथन को लेकर कोई अदालत आपराधिक या दीवानी कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रख सकती।
इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि किसी आरोप का संबंध चुनाव आयुक्त के आधिकारिक निर्णय से है और वह निर्णय उनके संवैधानिक या वैधानिक दायित्व के निर्वहन के दौरान लिया गया है, तो धारा 16 उनके खिलाफ अदालत में आपराधिक कार्यवाही के रास्ते में गंभीर कानूनी बाधा खड़ी करती है। लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। धारा 16 में सीधे-सीधे ‘गिरफ्तारी’, ‘पुलिस जांच’ या ‘पुलिस को एफआईआर से रोकने’ जैसे शब्द नहीं लिखे हैं। कानून मुख्य रूप से अदालत द्वारा आपराधिक या दीवानी कार्यवाही को स्वीकार करने अथवा जारी रखने पर रोक लगाता है। इसलिए यह कहना कि धारा 16 के कारण ज्ञानेश कुमार को किसी भी परिस्थिति में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, कानून की भाषा से आगे बढ़कर निष्कर्ष निकालना होगा। इस प्रावधान की वास्तविक सीमा और पुलिस जांच अथवा गिरफ्तारी पर इसका प्रभाव न्यायिक व्याख्या का विषय बन सकता है। यानी सवाल केवल यह नहीं है कि ‘अपराध हुआ या नहीं’, बल्कि यह भी है कि जिस कृत्य को अपराध बताया जा रहा है, वह आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन के दायरे में आता है या नहीं।
क्या पद छोड़ने के बाद भी सुरक्षा रहेगी?
धारा 16 की भाषा यहां भी महत्वपूर्ण है। इसमें केवल ‘वर्तमान’ पदाधिकारी नहीं, बल्कि वह व्यक्ति भी शामिल है जो ‘था’ यानी पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त या पूर्व चुनाव आयुक्त। इसलिए केवल पद छोड़ देने से आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े कृत्यों के संबंध में यह वैधानिक सुरक्षा स्वतः समाप्त नहीं होती। यही वह बिंदु है जो मौजूदा राजनीतिक बहस को और जटिल बनाता है। यदि किसी पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ बाद में कार्रवाई की मांग होती है, तो सबसे पहले यह निर्धारित करना पड़ेगा कि आरोपित कृत्य वास्तव में आधिकारिक कार्य के दायरे में था या नहीं और धारा 16 उस पर लागू होती है या नहीं।
फिर क्या ज्ञानेश कुमार पर कभी कार्रवाई नहीं हो सकती?
ऐसा निष्कर्ष भी सही नहीं होगा। एक तरफ धारा 16 है, दूसरी तरफ संविधान और कानून के तहत चुनाव आयोग की जवाबदेही तथा मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की अलग संवैधानिक प्रक्रिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी संसदीय प्रक्रिया से जुड़ी है। अर्थात राजनीतिक या प्रशासनिक असहमति और आपराधिक दायित्व दो अलग-अलग प्रश्न हैं।
यही वजह है कि किसी आयोगीय फैसले पर सवाल उठना अपने आप में आपराधिक अपराध सिद्ध नहीं करता। यदि आरोप है कि मतदाता सूची में जानबूझकर हेरफेर किया गया, अधिकारों का दुरुपयोग हुआ या किसी आपराधिक कानून का उल्लंघन हुआ, तो उसके लिए ठोस साक्ष्य, जांच और न्यायिक परीक्षण जरूरी होगा। केवल राजनीतिक आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी मान लेना लोकतांत्रिक और न्यायिक दोनों दृष्टि से उचित नहीं होगा।
लेकिन असली चिंता यहीं है
लोकतंत्र में चुनाव आयोग कोई सामान्य सरकारी विभाग नहीं है। वह उस व्यवस्था का प्रहरी है जिसके जरिए जनता अपनी सरकार चुनती है। इसलिए आयोग के फैसलों पर यदि बड़े पैमाने पर सवाल उठते हैं, आयोग के भीतर मतभेदों की खबरें आती हैं और विपक्षी दल स्वतंत्र जांच की मांग करते हैं, तो केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होना चाहिए कि सब कुछ कानून के अनुसार हुआ। हाल में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में एसआईआर से जुड़े निर्णयों की जांच और स्वतंत्र जांच एजेंसी अथवा जांच समिति की मांग की गई है। इससे साफ है कि विवाद अब राजनीतिक मंच से न्यायिक मंच तक पहुंच चुका है। इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल ज्ञानेश कुमार जेल जाएंगे या नहीं, यह नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग के किसी निर्णय की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच संभव है, यदि उस निर्णय से जुड़े पदाधिकारी को कानून एक विशेष वैधानिक सुरक्षा देता है?
कानून किसी व्यक्ति को जवाबदेही से ऊपर रखने के लिए नहीं, संस्थाओं की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए होना चाहिए। लेकिन स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन बिगड़ जाए तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास प्रभावित होता है। ज्ञानेश कुमार के मामले में भी अंतिम निष्कर्ष आरोपों या राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि दस्तावेजी साक्ष्यों, स्वतंत्र जांच और न्यायिक निर्णय से निकलना चाहिए। यदि आरोप गलत हैं तो जांच उन्हें साफ कर सकती है और यदि गंभीर अनियमितता के ठोस प्रमाण सामने आते हैं तो कानून को उसका रास्ता तलाशना होगा। लोकतंत्र में चुनाव आयोग की सबसे बड़ी शक्ति उसका संवैधानिक पद नहीं, जनता का विश्वास है। सवाल यह है कि उस विश्वास की रक्षा कौन करेगा—राजनीतिक सत्ता, विपक्ष, संसद या अंततः न्यायपालिका?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं एनसीआर टुडे समूह के संपादक हैं)

