लक्ष्मीकान्त पाठक
आज का आदमी पढ़ा-लिखा है, हाथ में स्मार्टफोन और इंटरनेट है। वह सोशल मीडिया पर हुकूमत से सवाल पूछ सकता है, लेकिन जैसे ही बात अपने खेत-खलिहान, राशन, पेंशन या कागजात की आती है, उसकी घिघ्घी बंध जाती है।
कागज अपना, समस्या अपनी, अधिकार अपना—फिर भी पहला सवाल यही उठता है, “साहब तक पैरवी कौन पहुँचाएगा?”
यहीं से ‘बिचौलिये’ (दलाल) की दुकान सजती है। वह न अफसर है, न जन-प्रतिनिधि, लेकिन दावा ठोकता है—“काहे परेशान होते हो, तुम्हारा काम हम करा देंगे।” नतीजा यह कि जो काम नागरिक का हक था, वह किसी की ‘कृपा’ बन जाता है।
1. पढ़ाई बढ़ी, पर हिचक नहीं मिटी
विडंबना यह है कि नागरिक डिग्रीधारी होकर भी तहसील, ब्लॉक या थाने जाने से झिझकता है। उसे डर रहता है कि कहीं अफसर ‘आँख न तरेर दे’ या फाइल ‘ठंडे बस्ते’ में न डाल दे। इसी ‘डर की फसल’ को बिचौलिया काटता है।
जहाँ प्रक्रिया धुँधली होती है, वहाँ ‘जानकार आदमी’ व्यवस्था की अनौपचारिक चाबी बन बैठता है। मुफ्त सेवा पर जब “थोड़ा खर्चा-पानी लगेगा” का नारा लगता है, तो यह केवल रिश्वत का मामला नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था से जनता का विश्वास उठने का प्रमाण है।
2. पोर्टल और योजना से आगे: सरकार की असली जिम्मेदारी
सरकारें ऑनलाइन पोर्टल, जनसुनवाई और हेल्पलाइन बनाकर ‘अपने हाथ खींच’ नहीं सकतीं। सफलता पोर्टल गिनने से नहीं, इस बात से मापी जाती है कि क्या आम आदमी बिना ‘अगुआ’ के उनका लाभ ले पा रहा है?
प्रशासन की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह नागरिक को डरमुक्त रास्ता दे।
जानकारी की सीधी पहुँच: किस काम में कितना शुल्क है, कौन-से कागज लगेंगे और कितने दिन में काम होगा—यह हर दफ्तर के बाहर ‘सफेद अक्षरों में’ दर्ज होना चाहिए।
जवाबदेही और समयसीमा: अगर तय समय में काम न हो, तो नागरिक को भटकने के बजाय ‘जिम्मेदार अफसर’ पर कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए।
शिकायत पर सुरक्षा: जनसुनवाई केवल खानापूर्ति न हो। शिकायत करने वाले को यह भरोसा होना चाहिए कि शिकायत के बाद उसका काम बिगड़ेगा नहीं, बल्कि बनेगा।
शिकायतकर्ता को व्यवस्था से डरना नहीं चाहिए; बल्कि नागरिक को अटकाने पर अफसर की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
3. बिचौलिया हटाने का त्रिसूत्र
केवल दो दलालों को जेल भेजने से समस्या खत्म नहीं होगी। जब तक ‘पानी का बहाव’ सीधा नहीं होगा, बिचौलिये काँटा लगाते रहेंगे। प्रशासन को तीन मोर्चों पर काम करना होगा:
सरलीकरण: कागजों की ‘फालतू जलेबी’ बनाना बंद हो।
पारदर्शिता: शुल्क और नियम पारदर्शी हों, ताकि कोई ‘अंधेरे में तीर’ न चला सके।
कड़ी जवाबदेही: बिना वजह फाइल अटकाने वाले कर्मचारियों पर सीधी गाज गिरे।
4. नागरिक का भी फर्ज है
सरकार की जवाबदेही तय है, पर नागरिक भी ‘दूध का धुला’ बनकर किनारे नहीं बैठ सकता। अपने नियम जानना, रसीद माँगना और ‘बिना रसीद एक नया पैसा न देने’ का अड़ियलपन दिखाना नागरिक का लोकतांत्रिक फर्ज है। अफसर से काम का हिसाब माँगना बदतमीजी नहीं, नागरिक का अधिकार है।
निष्कर्ष: ‘सिफारिश’ नहीं, ‘नियम’ चलेगा
लोकतंत्र ‘दरबारी व्यवस्था’ नहीं है जहाँ पूछा जाए—“तुम्हारी किससे पहचान है?” लोकतंत्र में सवाल होना चाहिए—“कानून का नियम क्या है?”
यदि किसी काम के लिए नागरिक को बार-बार ‘अपने किसी आदमी’ की तलाश करनी पड़े, तो यह जनता की बेवकूफी नहीं, प्रशासन का रिपोर्ट कार्ड खराब होना है।
मजबूत लोकतंत्र वह नहीं जहाँ नागरिक सरकार तक पहुँचने के लिए ‘बिचौलिये के पाँव पड़े’, बल्कि वह है जहाँ नागरिक और सरकार के बीच का रास्ता साफ हो—नियम स्पष्ट हों, अफसर जवाबदेह हों और नागरिक अपनी बात बिना किसी भय के सीना ठोक कर कह सके।

