-अब्दुल साजिद-
अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह भारत के नक्शे पर केवल कुछ खूबसूरत द्वीपों का समूह नहीं है, बल्कि यह देश की सामरिक सुरक्षा, समुद्री शक्ति, पर्यटन, पर्यावरण और आर्थिक संभावनाओं का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। लंबे समय से इस क्षेत्र के विकास की चर्चा होती रही है, लेकिन द्वीपों की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहां विकास की अपनी अलग चुनौतियां भी हैं। ऐसे समय में डॉ. दिनेश शर्मा का उपराज्यपाल के रूप में पदभार संभालना और पदभार ग्रहण करते ही विकास कार्यों की समीक्षा तथा जनसमस्याओं को प्राथमिकता देना निश्चित रूप से उम्मीद पैदा करने वाला कदम है।
डॉ. दिनेश शर्मा ने 15 सितंबर 2026 को अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के 14वें उपराज्यपाल के रूप में शपथ ली। इसके बाद उनके शुरुआती कार्यकाल में जिस तरह विभागों की समीक्षा, प्रमुख विकास परियोजनाओं का जायजा और केंद्र सरकार के स्तर पर द्वीपों की आवश्यकताओं को उठाने की सक्रियता दिखाई दी है, उससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासन को केवल फाइलों तक सीमित रखने के बजाय परिणामोन्मुख बनाने की कोशिश की जा रही है।
पदभार के बाद ही विकास परियोजनाओं की समीक्षा
डॉ. शर्मा के कार्यभार संभालने के तुरंत बाद अंडमान-निकोबार प्रशासन की प्रमुख विकास परियोजनाओं पर प्रस्तुतीकरण की समीक्षा की गई। मुख्य सचिव ज्ञानेश भारती, पुलिस महानिदेशक रविन्द्र सिंह यादव, प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजय कुमार सिन्हा और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में हुई इस समीक्षा का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि किसी भी नए प्रशासन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह मौजूदा योजनाओं की वास्तविक स्थिति को कितनी जल्दी समझता है।
विकास योजनाओं की समीक्षा महज औपचारिक बैठक न रह जाए, बल्कि उनकी समयबद्ध प्रगति, गुणवत्ता, बजट के उपयोग और जनता को मिलने वाले वास्तविक लाभ से जोड़ी जाए, तो इसका दूरगामी प्रभाव हो सकता है। अंडमान-निकोबार की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक मुख्य भूमि से संपर्क की लागत और उपलब्धता है। द्वीपों के लोगों के लिए हवाई यात्रा केवल सुविधा नहीं, बल्कि कई मामलों में आवश्यकता है। चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार, व्यापार और पारिवारिक जरूरतों के लिए मुख्य भूमि की यात्रा करने वाले लोगों को महंगी हवाई टिकटों का सामना करना पड़ता है।
डॉ. शर्मा ने केंद्र स्तर पर नागरिक उड्डयन से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए हवाई सेवाओं के विस्तार, किराये को अधिक किफायती बनाने, अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की संभावनाओं और अंतर-द्वीपीय सी-प्लेन सेवाओं जैसे विषयों पर पहल की है। यदि इन प्रयासों को ठोस परिणाम में बदला जाता है, तो यह द्वीपवासियों के जीवन में सीधा बदलाव ला सकता है। यहां सरकार को यह समझना होगा कि अंडमान के लिए बेहतर कनेक्टिविटी पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को भी मजबूत करती है।
स्वास्थ्य सुविधाओं को प्राथमिकता मिलना जरूरी
द्वीपों की भौगोलिक स्थिति के कारण स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता हमेशा चुनौती रही है। गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीजों को मुख्य भूमि तक ले जाना कई बार महंगा और कठिन होता है। इसलिए स्थानीय स्तर पर बेहतर अस्पताल, विशेषज्ञ चिकित्सक, आधुनिक जांच सुविधाएं और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था विकसित करना अत्यंत आवश्यक है। द्वीपों की स्वास्थ्य व्यवस्था, ANIIMS, CGHS से जुड़ी सुविधाओं और स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों से संबंधित मुद्दे भी प्रशासन के सामने रखे गए हैं। इन्हें केवल प्रशासनिक मांगों के रूप में नहीं, बल्कि नागरिकों के मौलिक जीवन-सुरक्षा से जुड़े विषय के रूप में देखा जाना चाहिए।
किसी भी क्षेत्र के विकास का वास्तविक पैमाना वहां की चमकदार परियोजनाएं नहीं, बल्कि आम आदमी को मिलने वाली बुनियादी सुविधाएं होती हैं। अंडमान-निकोबार में पेयजल, सड़क, बिजली, परिवहन और संचार से जुड़े सवाल आज भी महत्वपूर्ण हैं। जल जीवन मिशन के माध्यम से जलापूर्ति को मजबूत करने, सड़कों की स्थिति सुधारने और दूरदराज के क्षेत्रों को बेहतर ढंग से जोड़ने की जरूरत है। विशेष रूप से उत्तर एवं मध्य अंडमान में राष्ट्रीय राजमार्ग-4 की स्थिति जैसे मुद्दे सीधे जनता के दैनिक जीवन से जुड़े हैं। यदि प्रशासन इन समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर हल करता है तो इसका लाभ केवल शहरों को नहीं बल्कि दूर-दराज के गांवों और द्वीपों में रहने वाली आबादी को भी मिलेगा।
अंडमान-निकोबार की अर्थव्यवस्था को केवल पर्यटन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। मछली पालन, मत्स्य निर्यात, डेयरी, स्थानीय कृषि, छोटे कारोबार और समुद्री संसाधनों से जुड़े रोजगारों को वैज्ञानिक एवं आधुनिक तरीके से बढ़ावा देने की आवश्यकता है। द्वीपों में स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के लिए ऐसी आर्थिक नीतियां जरूरी हैं जिनमें स्थानीय लोगों की भागीदारी हो। मछली पालन और मत्स्य निर्यात को बढ़ावा देने के साथ कोल्ड-चेन, प्रसंस्करण, विपणन और निर्यात सुविधाओं का विस्तार किया जाए तो स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। डॉ. शर्मा की विकास प्राथमिकताओं में मत्स्य, डेयरी और अन्य आर्थिक क्षेत्रों को शामिल किया जाना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
अंडमान-निकोबार की सबसे बड़ी ताकत उसका प्राकृतिक सौंदर्य है। यही उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है। पर्यटन को बढ़ावा देना जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास नहीं होना चाहिए जो समुद्र, जंगल, जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाए। डॉ. शर्मा द्वारा स्वच्छता अभियान, ठोस कचरा प्रबंधन और टिकाऊ पर्यटन पर जोर देना इसलिए महत्वपूर्ण है। शहीद द्वीप में समुद्र तटों, कचरा प्रबंधन, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, विद्यालय और जेट्टी आदि से जुड़े स्वच्छता कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी इस बात का संकेत देती है कि विकास के साथ स्वच्छता और पर्यावरण को भी प्राथमिकता देने की कोशिश हो रही है। अंडमान का विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें पर्यटक भी आएं, स्थानीय लोगों की आय भी बढ़े और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक विरासत भी सुरक्षित रहे।
एक अच्छे प्रशासक की पहचान केवल बड़ी घोषणाओं से नहीं होती। उसकी असली पहचान इस बात से होती है कि आम नागरिक अपनी समस्या लेकर प्रशासन तक कितनी आसानी से पहुंच सकता है और उस समस्या पर कितनी तेजी से कार्रवाई होती है। डॉ. शर्मा ने शुरुआती दौर में अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठकों के अलावा स्थानीय जनप्रतिनिधियों और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों से संवाद की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। यह प्रक्रिया आगे भी मजबूत होनी चाहिए। द्वीपों के अलग-अलग क्षेत्रों की समस्याएं अलग हैं। इसलिए एक समान नीति के बजाय स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप योजनाएं बनाना ज्यादा प्रभावी होगा।
अंडमान-निकोबार एक केंद्रशासित प्रदेश है। इसलिए यहां विकास की गति काफी हद तक केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के साथ प्रभावी समन्वय पर निर्भर करती है। इस दृष्टि से डॉ. शर्मा द्वारा केंद्र के मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ लगातार संवाद स्थापित करना महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान भी अंडमान-निकोबार की विकास प्राथमिकताओं और चल रही परियोजनाओं पर चर्चा हुई। इसके अलावा हवाई संपर्क, शिपिंग, सड़क, जलापूर्ति, स्वास्थ्य और अन्य क्षेत्रों से जुड़े विषयों को केंद्र के समक्ष रखने की पहल की गई है। अब आवश्यकता इस बात की है कि दिल्ली में होने वाली बैठकों और द्वीपों में रहने वाले नागरिकों की वास्तविक समस्याओं के बीच सीधा संबंध स्थापित हो। यानी बैठक का परिणाम जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
अंडमान-निकोबार के युवाओं के लिए शिक्षा के बाद रोजगार सबसे बड़ी चिंता है। यदि स्थानीय युवाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते तो उन्हें मुख्य भूमि की ओर पलायन करना पड़ता है। शिक्षा, कौशल विकास, पर्यटन, आईटी, समुद्री अर्थव्यवस्था, मत्स्य, स्वास्थ्य सेवाओं और छोटे उद्योगों के क्षेत्र में रोजगार की नई संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। डॉ. शर्मा की शैक्षणिक पृष्ठभूमि को देखते हुए शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में उनसे विशेष अपेक्षाएं स्वाभाविक हैं। आधिकारिक प्रोफाइल के अनुसार वे लंबे समय तक शिक्षा और शोध के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं और उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी जैसे विभागों की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।
अंडमान-निकोबार की सामाजिक संरचना विविधतापूर्ण है। यहां अलग-अलग भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक समुदाय रहते हैं। विकास का लाभ तभी व्यापक माना जाएगा जब वह किसी वर्ग, क्षेत्र या समुदाय तक सीमित न रहे। डॉ. शर्मा ने अपने शुरुआती सार्वजनिक संबोधन में जाति, क्षेत्र और समुदाय के आधार पर विभाजन से ऊपर उठकर सामूहिक विकास की बात कही है। यह दृष्टिकोण प्रशासनिक नीतियों में भी दिखाई देना चाहिए। लोकतंत्र में प्रशासन की निष्पक्षता केवल एक विचार नहीं, बल्कि जनता का विश्वास हासिल करने की बुनियादी शर्त है।
डॉ. दिनेश शर्मा का कार्यकाल अभी शुरुआती चरण में है। इसलिए अभी से उनके पूरे कार्यकाल का मूल्यांकन करना जल्दबाजी होगी। लेकिन शुरुआती गतिविधियों से यह जरूर दिखाई देता है कि उन्होंने द्वीपों की विकास आवश्यकताओं को समझने, प्रशासनिक मशीनरी की समीक्षा करने और केंद्र सरकार के स्तर पर मुद्दे उठाने की शुरुआत तेज गति से की है। अब जनता की निगाह इस बात पर रहेगी कि समीक्षा बैठकों के बाद कितनी परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं, हवाई किराया कितना कम होता है, स्वास्थ्य सुविधाओं में कितना सुधार आता है, पानी और सड़क की समस्याएं कितनी दूर होती हैं, युवाओं के लिए रोजगार के कितने अवसर पैदा होते हैं और दूरदराज के द्वीपों तक सरकारी योजनाओं का लाभ कितनी तेजी से पहुंचता है।
अंडमान-निकोबार को विकसित भारत की यात्रा में एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाने की अपार संभावनाएं हैं। यहां पर्यटन है, समुद्री संसाधन हैं, सामरिक महत्व है, प्राकृतिक संपदा है और मेहनती जनता है। जरूरत है इन सभी क्षमताओं को एक ऐसी विकास नीति से जोड़ने की, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों के हित सर्वोच्च प्राथमिकता पर हों। डॉ. दिनेश शर्मा के सामने अवसर भी बड़ा है और चुनौती भी। यदि उनकी शुरुआती सक्रियता को स्थायी प्रशासनिक सुधार, समयबद्ध परियोजनाओं और जन-केंद्रित शासन में बदला जाता है तो उनका कार्यकाल अंडमान-निकोबार के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण अध्याय साबित हो सकता है। किसी भी उपराज्यपाल की सबसे बड़ी उपलब्धि बड़ी-बड़ी घोषणाएं नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में दिखाई देने वाला बदलाव होता है। अंडमान-निकोबार की जनता अब इसी बदलाव की प्रतीक्षा कर रही है।

