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​हौसलों का सफर : वेब वार्ता के 17 वर्ष और आपकी दुआएं

​संघर्षों की तपती धूप में जलकर, अपनों की निस्वार्थ दुआओं के साये में पनपती एक आत्मीय यात्रा

​सत्रह वर्ष…!
​काल के असीम महासमुद्र में सत्रह साल शायद पानी की एक छोटी सी बूंद जैसे हों। लेकिन उस इंसान से पूछिए जिसने इन सत्रह सालों में हर दिन एक नया जन्म लिया हो… जिसके लिए ये वर्ष केवल तारीखों का बदलना नहीं, बल्कि अनगिनत आंसुओं, ख़ामोश चीखों, बिखरते सपनों, टूटती सांसों और फिर से जी उठने के चमत्कारों की एक जलती हुई गाथा हैं।
​’वेब वार्ता’ हमारे लिए कोई महज़ कंपनी या व्यापारिक संस्थान नहीं है। यह हमारे खून-पसीने, हमारी आत्मा और उन हज़ारों आत्मीय हृदयों की धड़कन है, जिन्होंने जब-जब हमें गिरते देखा, अपना कलेजा निकालकर हमारे हाथों में रख दिया।
​आज जब ‘वेब वार्ता समाचार एजेंसी’ अपने 17 वर्ष पूरे कर (और अनौपचारिक रूप से 18वें वर्ष के आंगन में कदम रख) रही है, तो हमारा सिर किसी अभिमान से नहीं, बल्कि आपके इस असीम प्रेम के आगे अश्रुपूरित कृतज्ञता से झुक जाता है। यह जश्न किसी सफलता का ढिंढोरा पीटने का नहीं है; यह तो उस मिट्टी को चूमने का अवसर है जिसने हमें बार-बार बिखरने के बाद भी समेटा है।
​एक पवित्र संकल्प, जो आंसुओं के बीच बोया गया था
​आध्यात्मिक गुरु मौलाना वहीदुद्दीन खान, प्रख्यात चिंतक तरुण विजय और ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ व ‘विश्व प्रेस काउंसिल’ के तत्कालीन चेयरमैन चीफ जस्टिस जी. एन. रे के पावन हाथों से जब ‘वेब वार्ता’ का यह छोटा सा पौधा रोपा गया था, तब हमारे पास न कोई बड़ा नाम था, न अपार धन-दौलत और न ही कोई सुरक्षित भविष्य।
​(संकेत: प्रकाशन से पूर्व कृपया उक्त महानुभावों के तत्कालीन पद व संस्थागत संबद्धता का पुनः मिलान कर लें)
​उस दिन मन में बस एक ही ज़िद थी—सत्य और ईमानदारी की पत्रकारिता का दीप जलाना है, चाहे हवाएं कितनी ही ज़हरीली क्यों न हों। हमें नहीं मालूम था कि आगे का रास्ता कांटों से भरा है, जहां कदम-कदम पर लहू बहेगा। लेकिन मन में एक अटूट आस्था थी कि यदि नीयत पवित्र हो, तो ईश्वर स्वयं राह बनाता है।
​धीरे-धीरे इस अकेले पथिक के साथ लोग जुड़ते गए। कोई हमारी बेबसी का साथी बना, तो कोई हमारी हिम्मत। आज जब मुड़कर देखता हूं, तो समझ आता है कि इमारतें, गाड़ियां और चमचमाते दफ्तर कभी किसी संस्थान को जिंदा नहीं रखते… संस्थान को जिंदा रखती हैं वे दुआएं, जो कोई बुज़ुर्ग अंधेरे में अकेले बैठकर आपके लिए मांगता है।
​जब अंधेरा निगलने आया, तब अपनों की कांपती हथेलियों ने संभाला
​हर इंसान के जीवन में एक रात ऐसी आती है जब लगता है कि बस… अब सूरज कभी नहीं निकलेगा।
​’वेब वार्ता’ के इस 17-वर्षीय सफर में हमने ऐसे अनगिनत सन्नाटों को जिया है। जब चारों तरफ से रास्ते बंद हो गए, जब आर्थिक तंगी ने गले को इस कदर भींचा कि सांस लेना दूभर हो गया, जब अपने भी पराए बनकर दूर खड़े तमाशा देखने लगे—तब कुछ ऐसे देवदूत आए जिनकी कोई पहचान न थी, पर उनके हृदयों में बेइंतहा मोहब्बत थी।
​जिंदगी के सबसे काले दौर में किसी का करोड़ों रुपयों का चेक भी उतना काम नहीं आता, जितना किसी आत्मीय मित्र का कांपते हुए हाथों से हाथ थामकर यह कह देना—”तू अकेला नहीं है दोस्त, मैं हूं न… यह वक्त भी गुज़र जाएगा।”
​वे आधी रात को आए फोन, वे बिना किसी स्वार्थ के दी गई छोटी-छोटी मदद, वे आंखों ही आंखों में दिया गया ढांढस—इन्हीं ने हमारे टूटे हुए वजूद को फिर से जोड़ा। उन पलों का कर्ज़ हम सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते।
​वे कठिन दिन… अस्पताल की बदरंग दीवारें और मलबे में तब्दील होता दफ्तर
​वर्ष 2009 से 2026 तक की यह राह सहूलियतों की राह नहीं थी, यह तो अंगारों पर नंगे पांव चलने की दास्तान थी।
​आज जब मैं स्मृतियों के गलियारे में पीछे मुड़ता हूं, तो आत्मा सिहर उठती है। मेरी आंखों के सामने मलबे के ढेर में बदल चुका हमारा वह दफ्तर तैर जाता है, जिसे हमने अपने एक-एक तिनके से बनाया था।
​याद आते हैं अस्पताल के वे भयानक और ठंडे दिन, जहां एक तरफ ज़िंदगी और मौत की जंग चल रही थी, तो दूसरी तरफ ‘वेब वार्ता’ को खत्म होने से बचाने की तड़प। आर्थिक तंगी की वह जानलेवा तपिश, वे अंतहीन काली रातें जब शरीर बीमारी से टूट रहा होता था, लेकिन उंगलियां कीबोर्ड पर सिर्फ इसलिए चल रही होती थीं ताकि सुबह पाठकों तक सच पहुंच सके।
​वे दिन आसान नहीं थे… परिस्थितियों ने हमें हर तरफ से तोड़ दिया था। कभी जिस्म ने जवाब दिया, कभी जेब ने, तो कभी अपनों के बदले हुए व्यवहार ने।
​लेकिन उस भयानक तबाही के मलबे के नीचे भी एक दीया जल रहा था—काम को न रोकने का जूनून, सत्य के प्रति हमारी वफादारी।
​आज उन ज़ख्मों को याद करके आंखों में आंसू तो आते हैं, पर दिल में कोई गिला या शिकायत नहीं है। क्योंकि उन्हीं ज़ख्मों ने हमें सिखाया कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत बैंक अकाउंट में पड़ी रकम नहीं होती, बल्कि वे आंखें होती हैं जो आपके दुख में रोती हैं और वे हाथ होते हैं जो आपके लिए दुआ में उठते हैं।
​हमारे रिपोर्टर और सहयोगी—इस चिराग का तेल, इस दीये की बाती
​’वेब वार्ता’ की इस भावुक यात्रा को मेरी अपनी कहानी कहना उन तमाम गुमनाम नायकों के त्याग के साथ अन्याय होगा, जिन्होंने भूखे-प्यासे रहकर इस संस्था को सींचा है।
​हमारे ज़मीनी पत्रकार, देश के दूर-दराज़ इलाकों में बैठे हमारे संवाददाता—आप केवल हमारे सहकर्मी नहीं हैं, आप हमारी आत्मा हैं। सीमित साधनों, जानलेवा खतरों और अनिश्चितता के बीच भी आपने जिस निडरता से खबरों को हम तक पहुंचाया, उसी पसीने की बूंदों से आज ‘वेब वार्ता’ का नाम रोशन है।
​हम ऋणी हैं उन अखबारों, डिजिटल मीडिया साथियों और सम्मानित प्रकाशकों के, जिन्होंने हमारे कठिन से कठिन दिनों में भी हमारी खबरों पर भरोसा रखा। आपका यह विश्वास केवल एक व्यावसायिक संबंध नहीं था, यह उस डूबती कश्ती को सहारा देने जैसा था जिसे पूरी दुनिया डुबोने पर तुली थी।
​एक रुंधे हुए गले से… क्षमा याचना
​सत्रह वर्षों का यह उथल-पुथल भरा सफर जहां हमें बहुत कुछ दे गया, वहीं अपनी कमियों का अहसास भी करा गया।
​इस लंबी और थका देने वाली जंग में संभव है कि जाने-अनजाने मुझसे कोई भूल हुई हो। जब परिस्थितियां काबू से बाहर थीं, तब शायद मैं किसी अपने साथी का दर्द न सुन पाया हूं। किसी मित्र की उम्मीदों पर खरा न उतर सका हूं, या किसी शुभचिंतक को वह सम्मान और समय न दे पाया हूं जिसका वह हकदार था।
​यदि मेरी किसी बात से, किसी मजबूरी से या किसी कड़वे फैसले से किसी का भी दिल दुखा हो… तो मैं अपना सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर आपसे सहृदय क्षमा मांगता हूं।
​मैं कोई फरिश्ता नहीं हूं, बस माटी का एक आम और कमज़ोर इंसान हूं। मेरी भी सीमाएं थीं, मेरी भी लाचारियां थीं। पर ईश्वर साक्षी है, मेरी नीयत में कभी किसी के प्रति खोट या छल नहीं रहा। यदि कोई कमी रह गई हो, तो उसे मेरी बेबसी समझकर अपने बड़े दिल से माफ कर दीजिएगा।
​एक नया सवेरा, दुआओं के साये में
​17 साल बीत गए… यह सोचकर ही आंखें भर आती हैं। यह पड़ाव हमें किसी अहंकार से नहीं भरता, बल्कि हमें और अधिक विनम्र बना देता है। क्योंकि हम जानते हैं कि इस तबाही के बाद भी अगर हम जिंदा खड़े हैं, तो यह हमारी काबिलियत नहीं, बल्कि आपकी दुआओं का करिश्मा है।
​आने वाला कल कैसा होगा, हम नहीं जानते। चुनौतियां और भी कठिन हो सकती हैं, रास्ते और भी पथरीले हो सकते हैं। लेकिन अब हमें डर नहीं लगता। क्योंकि हमने सीख लिया है कि जब तक इंसानी हमदर्दी ज़िंदा है, जब तक अपनों का प्यार साथ है, तब तक कोई भी आंधी हमें मिटा नहीं सकती।
​सत्रह वर्षों के इस रुला देने वाले मोड़ पर…
​उन कांपते हाथों को प्रणाम, जिन्होंने हमें बिखरने से पहले थाम लिया।
​उन निष्पाप दिलों को नमन, जिन्होंने हमारी खामोशी के पीछे छिपे दर्द को बिना कहे पढ़ लिया।
​उन सभी आवाजों को सलाम, जिन्होंने निराशा के घने अंधेरे में हमारे कानों में फुसफुसाया—”उठो, तुम हार नहीं सकते।”
​और उन अनगिनत दुआओं को सजदा, जिन्होंने अस्पताल के आईसीयू (ICU) से लेकर मलबे में तब्दील हो चुके दफ्तर तक, हमारी उम्मीद की आखिरी सांस को उखड़ने नहीं दिया।
​यह कहानी केवल ‘वेब वार्ता’ की नहीं है… यह कहानी है टूटे हुए इंसानों के फिर से जी उठने की, आपके अटूट प्रेम की और उस ईश्वरीय शक्ति की जो हार के बाद भी जीतना सिखाती है।
​आप सभी का हृदय के उस सबसे गहरे कोने से धन्यवाद, जहां सिर्फ भाव और आंसू होते हैं!
​आपका विश्वास—हमारी सांसें हैं।
​आपका सहयोग—हमारी ढाल है।
​आपका स्नेह—हमारी जीने की वजह है।
​और आपकी दुआएं—हमारे रास्ते का चिराग हैं।
​आइए, इसी आत्मीयता, संवेदनशीलता और सत्य के संकल्प के साथ हम ‘वेब वार्ता’ के 18वें वर्ष में कदम रखें।
​ -सईद अहमद सम्पादक

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