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बार लाइसेंस, शराब और महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल

अंडमान-निकोबार में नियमों की अनदेखी, कथित भ्रष्टाचार और बढ़ती शराब की लत पर उठे सवाल

श्री विजयपुरम, (अब्दुल रहमान/ वेब वार्ता। अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के नवनियुक्त उपराज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा के कामकाज और प्रशासनिक स्तर पर दिखाई दे रही सक्रियता से आम लोगों के साथ-साथ महिलाओं में भी कई महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों के समाधान को लेकर उम्मीद जगी है। इन्हीं मुद्दों में शराब की बढ़ती उपलब्धता, बारों की संख्या, बार लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया और उससे जुड़े घरेलू हिंसा जैसे गंभीर सामाजिक विषय शामिल हैं।

द्वीप समूह के विभिन्न क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बार संचालित हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ इलाकों में बहुत कम दूरी के भीतर कई बार मौजूद हैं। इनमें कुछ प्रतिष्ठान निर्धारित नियमों और मानकों का पालन करते हुए संचालित हो रहे होंगे, लेकिन कुछ बारों के संबंध में नियमों के पालन को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।

बार लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल

सबसे बड़ा सवाल बार लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को लेकर है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ मामलों में लाइसेंस जारी करते समय निर्धारित नियमों और मानकों की कथित रूप से अनदेखी की गई।

लोगों का कहना है कि बार लाइसेंस जारी करते समय यह देखा जाना चाहिए कि संबंधित प्रतिष्ठान स्कूल, कॉलेज, मंदिर, मस्जिद, चर्च अथवा अन्य संवेदनशील स्थानों से निर्धारित दूरी के नियमों का पालन करता है या नहीं। इसके अलावा पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था, स्थल निरीक्षण, आवश्यक NOC और अन्य निर्धारित शर्तों का भी पालन होना चाहिए।

लेकिन यदि कहीं इन मानकों का पालन किए बिना लाइसेंस जारी किए गए हैं, तो यह गंभीर जांच का विषय है।

देर रात तक बार संचालन और सुविधाओं पर भी सवाल

स्थानीय लोगों के अनुसार कुछ बार देर रात तक संचालित होते हैं। ऐसे में यह भी सवाल उठता है कि देर रात तक शराब का सेवन करने वाले लोगों की सुरक्षा और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं के लिए क्या निर्धारित प्रावधानों का पालन किया जा रहा है।

यदि किसी लाइसेंस की शर्तों में विशेष व्यवस्थाएं आवश्यक हैं, तो संबंधित विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लाइसेंस जारी होने के बाद भी उन शर्तों का लगातार पालन हो रहा है।

कथित भ्रष्टाचार की भी हो जांच

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर आरोप बार लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में कथित भ्रष्टाचार को लेकर लगाए जा रहे हैं।

स्थानीय स्तर पर आरोप हैं कि अलग-अलग अधिकारियों के कार्यकाल में नियमों को दरकिनार कर कुछ बारों को लाइसेंस दिए गए। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।

ऐसे में मांग उठ रही है कि पिछले कई वर्षों में जारी किए गए सभी बार लाइसेंसों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जाए।

यह भी सामने लाया जाना चाहिए कि किस जिलाधिकारी/डिप्टी कमिश्नर और किस SDM के कार्यकाल में कितने नए बार लाइसेंस जारी किए गए। प्रत्येक लाइसेंस की फाइल की जांच होनी चाहिए और यह देखा जाना चाहिए कि आवेदन से लेकर लाइसेंस जारी करने तक सभी निर्धारित नियमों का पालन किया गया था या नहीं।

फाइलों में मौजूद स्थल निरीक्षण रिपोर्ट, NOC, स्कूल-कॉलेज और धार्मिक स्थलों से संबंधित दूरी, पार्किंग व्यवस्था, लाइसेंस की शर्तें तथा अन्य आवश्यक दस्तावेजों की भी जांच की जानी चाहिए।

यदि जांच में रिश्वत, भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग या जानबूझकर नियमों की अनदेखी के ठोस प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित अधिकारियों और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

अब सवाल सिर्फ पुरुषों का नहीं, बच्चों के भविष्य का भी है

शराब की समस्या का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि इसका प्रभाव केवल वयस्क पुरुषों तक सीमित रहने की बात नहीं कही जा रही है। समाज में यह चिंता भी सामने आ रही है कि कम उम्र के बच्चे और नाबालिग भी नशे की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

यदि नाबालिग बच्चों तक शराब या अन्य नशीले पदार्थों की पहुंच हो रही है, तो यह बेहद गंभीर मामला है। बच्चों को शराब और नशे से दूर रखना केवल परिवार की नहीं, बल्कि प्रशासन, पुलिस, आबकारी विभाग, स्कूलों और पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

यह स्थिति देश में चलाए जा रहे नशा-मुक्त भारत अभियान के उद्देश्य पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि एक तरफ देश को नशामुक्त बनाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है और दूसरी तरफ कम उम्र के बच्चों तक शराब या अन्य नशीले पदार्थ पहुंच रहे हैं, तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है।

इसे लोग प्रधानमंत्री के नशामुक्त भारत के संकल्प के सामने एक गंभीर विरोधाभास और चेतावनी के रूप में देख रहे हैं।

शराब और घरेलू हिंसा का संबंध

यह मामला केवल बार लाइसेंस या सरकारी राजस्व तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध समाज और परिवारों से भी है।

महिलाओं का कहना है कि शराब पीकर घर लौटने वाले कुछ पुरुषों के व्यवहार के कारण परिवारों में विवाद, मारपीट और घरेलू हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं। कई परिवारों में शराब के कारण आर्थिक परेशानी, मानसिक तनाव और बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।

ऐसे में महिलाओं का सवाल है कि यदि शराब की बिक्री और बार संचालन के नियमों को सख्ती से लागू किया जाए, निर्धारित समय का पालन कराया जाए और नियम तोड़ने वाले प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई हो, तो क्या घरेलू हिंसा जैसी घटनाओं को कम करने में मदद नहीं मिलेगी?

बारों के साप्ताहिक अवकाश और संचालन समय पर भी स्पष्टता जरूरी

बारों के साप्ताहिक अवकाश और सरकारी छुट्टियों में बंद रहने की व्यवस्था को लेकर भी लोगों के बीच सवाल हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले साप्ताहिक अवकाश तथा कुछ सरकारी छुट्टियों के दौरान बार बंद रहने की व्यवस्था थी, जबकि अब केवल निर्धारित राष्ट्रीय अवकाश के दौरान बंद रखने की बात सामने आती है।

इसलिए प्रशासन और आबकारी विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि वर्तमान में बारों के लिए साप्ताहिक अवकाश, सरकारी छुट्टियों और दैनिक संचालन समय से संबंधित नियम क्या हैं और क्या सभी लाइसेंसधारी उनका समान रूप से पालन कर रहे हैं।

आत्महत्या और सामाजिक स्वास्थ्य का मुद्दा

शराब से जुड़ी समस्या को मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक तनाव और आत्महत्या जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। हालांकि आत्महत्या के मामलों के लिए शराब को सीधे जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन यदि किसी क्षेत्र में शराब, घरेलू हिंसा और मानसिक तनाव से संबंधित समस्याएं सामने आ रही हैं, तो प्रशासन को उनके बीच संभावित संबंधों का अध्ययन करना चाहिए।

महिलाओं को उपराज्यपाल से उम्मीद

अंडमान एवं निकोबार की महिलाओं और आम लोगों की मांग है कि प्रशासन शराब नीति और बार लाइसेंस व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करे।

सभी बारों के लाइसेंस और संबंधित दस्तावेजों की जांच हो। नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कार्रवाई हो। जिन अधिकारियों या अन्य जिम्मेदार लोगों की भूमिका जांच में सामने आए, उनके खिलाफ कानून के अनुसार कदम उठाया जाए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह जांच किसी एक व्यक्ति या किसी एक सरकार के कार्यकाल तक सीमित न हो, बल्कि पिछले वर्षों में जारी किए गए लाइसेंसों की वर्षवार और अधिकारीवार समीक्षा की जाए।

अब लोगों की नजर प्रशासन पर है।

किस अधिकारी के कार्यकाल में कितने बार लाइसेंस जारी हुए?
क्या सभी लाइसेंस निर्धारित नियमों के अनुसार जारी किए गए?
क्या कहीं नियमों की अनदेखी हुई?
क्या लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार हुआ?
क्या नाबालिगों तक शराब पहुंच रही है?
और अगर भ्रष्टाचार या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी?

इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।

अंडमान एवं निकोबार की महिलाओं को उम्मीद है कि नवनियुक्त उपराज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा इस संवेदनशील विषय को भी गंभीरता से देखेंगे और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन अथवा अनियमितता पाई जाती है, तो दोषियों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

क्योंकि सवाल सिर्फ बार लाइसेंस का नहीं है—सवाल है महिलाओं की सुरक्षा, बच्चों के भविष्य, परिवारों की शांति और अंडमान-निकोबार के सामाजिक भविष्य का।

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