अमरोहा। बॉलीवुड में अपनी दमदार अभिनय क्षमता और कड़क आवाज के बल पर विशिष्ट पहचान बनाने वाले दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का निधन हो गया है। 1 जनवरी 1951 को जन्में नाना पाटेकर ने 75 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। वे एक महान कलाकार होने के साथ-साथ खुद भी एक समर्पित किसान थे और सदैव किसानों की मदद के लिए तत्पर रहते थे। पुणे के पास खड़कवासला गांव में स्थित अपने 27 एकड़ के फार्म हाउस पर वे अपना अधिकांश समय खेती-किसानी में बिताते थे। वे अपनी फसलों से होने वाली कमाई को किसानों में बांट देते थे तथा अपने ‘नाम’ फाउंडेशन के माध्यम से भी किसानों को निरंतर आर्थिक सहायता पहुंचाते थे। किसान युवा संसद और भारतीय किसान यूनियन संयुक्त मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने मोमबत्ती जलाकर उन्हें दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और उन्हें असली अन्नदाता करार दिया।
भारतीय किसान यूनियन संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने नाना पाटेकर के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि खेती से लेकर ‘नाम’ फाउंडेशन तक वे हमेशा किसानों के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। वे एक बड़े किसान होने के साथ-साथ धरातल से जुड़े असली अन्नदाता थे। बचपन में आर्थिक तंगी का सामना करने वाले नाना पाटेकर का सादा जीवन और सरल स्वभाव हर किसी के लिए प्रेरणादायी था।
किसान आंदोलनों और कृषि क्षेत्र की समस्याओं पर नाना पाटेकर के विचार सदैव स्पष्ट रहे। वे अक्सर कहा करते थे कि किसान के लिए पहले देश है, बाद में सब कुछ। किसानों का कर्ज माफ करना अलग बात है, लेकिन स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार फसलों का उचित मुआवजा और दाम मिलना किसानों का अधिकार है। वे अकसर इस बात पर दुख जताते थे कि लोग मॉल में जाकर जींस का मोल-भाव नहीं करते, जबकि किसान की पूरी धन-दौलत खुले आसमान के नीचे पड़ी रहती है, जिसे प्राकृतिक आपदाओं से लेकर पशु-पक्षी तक नुकसान पहुंचाते हैं।
इसके साथ ही, नरेश चौधरी ने देश की वर्तमान स्थिति और युवा वर्ग के मुद्दों पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज जेन जी और उसके बाद की पीढ़ी का गुस्सा सड़कों पर साफ दिखाई दे रहा है। गांवों में गठित ‘किसान युवा संसद’ का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार, बुनियादी सुविधाओं की कमी और रोजगार के घटते अवसरों को लेकर अब युवा चुप रहने के बजाय सरकारों और संस्थाओं से सीधे जवाब मांग रहे हैं।
उन्होंने देश की नौकरशाही और परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधारों की मांग करते हुए कहा कि पिछले 50 वर्षों में देश में साक्षरता तो बढ़ी है, लेकिन अफसरशाही में भर्ती का तरीका आज भी पुराना ही बना हुआ है। आज जहां 21 साल का आईआईटी ग्रेजुएट यूनिकॉर्न बना रहा है, वहीं दूसरी ओर युवाओं को 32 साल की उम्र तक यूपीएससी की तैयारी में उलझाकर रखा जा रहा है, जो प्रतिभा का राष्ट्रीय नुकसान है। युवाओं को सरकारी नौकरी का बंधुआ बनाने के बजाय यूपीएससी की अधिकतम आयु सीमा 28 वर्ष की जानी चाहिए, ताकि 3-4 साल के प्रयास के बाद युवा असफल होने पर निजी क्षेत्र या स्टार्टअप की ओर रुख कर सके। देश को कमरे में सालों तक बंद रहने वाला प्रत्याशी नहीं, बल्कि फील्ड का अनुभवी अफसर चाहिए।
उन्होंने कोचिंग माफिया और परीक्षा लीक जैसे मामलों पर चिंता जताते हुए कहा कि आज कोई इंजीनियर इतिहास तो कोई डॉक्टर साहित्य लेकर टॉपर बन रहा है। इस व्यवस्था को समाप्त कर सभी के लिए एक समान जीएस (सामान्य अध्ययन) आधारित परीक्षा होनी चाहिए। इसके अलावा, एनटीए, यूपीएससी और सभी राज्यों के लोक सेवा आयोगों (पीएससी) को एक ही केंद्रीय टेक्निकल बोर्ड के अधीन लाया जाना चाहिए। कर्नाटक पीएससी पेपर लीक या एनटीए की गड़बड़ियों जैसे मामलों को एक ही सुरक्षित सॉफ्टवेयर और प्रोटोकॉल लागू करके रोका जा सकता है। सरदार पटेल ने आईएएस को देश को जोड़ने वाला ‘स्टील फ्रेम’ कहा था, न कि जंग लगा हुआ ढांचा। इन प्रशासनिक और शैक्षणिक सुधारों को आंदोलन के बजाय नीतिगत आत्मचिंतन के जरिए तत्काल लागू किया जाना चाहिए।
नाना पाटेकर को असली अन्नदाता बताकर मोमबत्ती जलाकर ‘किसान युवा संसद’ ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि, शिक्षा व प्रशासनिक सुधारों पर उठाई आवाज

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