-सचिन कुमार गौतम
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की राजनीति पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि सत्ता का प्रभाव उनके निर्णयों और व्यवहार में स्पष्ट दिखाई देता है। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने यह भी दिखाया है कि विपक्ष अब केवल संसद के भीतर बयान देने तक सीमित नहीं रहना चाहता। इंडिया गठबंधन के सांसदों ने सड़कों पर उतरकर चुनाव आयोग से मिलने और अपनी आपत्तियां दर्ज कराने का सिलसिला जारी रखा है। मंगलवार को चुनाव आयोग तक निकाला गया विपक्षी सांसदों का मार्च बीच रास्ते में रोक दिया गया और कई सांसदों को हिरासत में लिया गया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भी पुलिस ने शाम तक हिरासत में रखा, हालांकि देर रात उन्हें छोड़ दिया गया।
शायद सरकार को लगा होगा कि इस कार्रवाई के बाद विपक्षी सांसद कुछ समय के लिए शांत हो जाएंगे। आखिर संसद सत्र के बाहर 250 से 300 सांसदों को बार-बार एकजुट करना आसान नहीं होता। अलग-अलग राज्यों से आने वाले सांसदों को एक मंच पर लाना, उनके कार्यक्रम तय करना और सरकार के सामने साझा विरोध दर्ज कराना अपने आप में बड़ी राजनीतिक चुनौती है। लेकिन विपक्ष ने सरकार की इसी धारणा को गलत साबित कर दिया।
बुधवार को कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इंडिया गठबंधन के सांसदों को दोपहर के भोजन के लिए दिल्ली के प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रेस्तरां सागर रत्ना में आमंत्रित किया। भाजपा ने इस आयोजन का भी उपहास उड़ाने की कोशिश की। पार्टी के कुछ नेताओं और समर्थकों ने यह सवाल उठाया कि क्या राहुल गांधी को पता नहीं कि सागर रत्ना में केवल शाकाहारी भोजन परोसा जाता है। यह टिप्पणी उस राजनीतिक माहौल में की गई, जब मंगलवार को आकाशवाणी परिसर के पास राहुल गांधी द्वारा कथित रूप से खान चाचा का चिकन रोल खाने को लेकर भाजपा समर्थकों ने सोशल मीडिया पर उन्हें निशाना बनाया था।
भाजपा ने भोजन को राजनीतिक मुद्दा बनाने में समय जरूर लगा दिया, लेकिन वह यह समझने से चूक गई कि राजनीतिक बैठकों में भोजन से ज्यादा महत्वपूर्ण बातचीत और रणनीति होती है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्षी सांसदों को अंताक्षरी खेलने या केवल औपचारिक भोज के लिए आमंत्रित नहीं किया था। इस बैठक का उद्देश्य अगले कदम पर चर्चा करना और यह तय करना था कि चुनाव आयोग तक पहुंचने के लिए विपक्ष को आगे की रणनीति क्या अपनानी चाहिए।
भोजन के बाद विपक्षी सांसद कुछ बसों में सवार हुए और चुनाव आयोग तथा जंतर-मंतर की दिशा में आगे बढ़े। यह इलाका दिल्ली के राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक रास्ता चुनाव आयोग की ओर जाता है, जबकि दूसरा जंतर-मंतर तक पहुंचता है। विपक्षी सांसदों और कार्यकर्ताओं की इस गतिविधि ने दिल्ली पुलिस के सामने एक बार फिर चुनौती खड़ी कर दी कि उन्हें कहां और किस आधार पर रोका जाए।
रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने राहुल गांधी को हिरासत में लेने की कोशिश की। युवा कांग्रेस और एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं ने पुलिस बस को घेर लिया, जिससे पुलिस के लिए उन्हें वहां से ले जाना कठिन हो गया। इससे पहले, जब पुलिस अन्य सांसदों और कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले रही थी और राहुल गांधी को पीछे हटने के लिए कहा जा रहा था, तब प्रियंका गांधी कुछ अन्य महिला नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर बैठ गईं। कई स्थानों पर पुलिस के साथ रैपिड एक्शन फोर्स की तैनाती भी की गई।
विपक्षी सांसदों, समर्थकों, कार्यकर्ताओं और पुलिस की भारी मौजूदगी से लुटियन्स दिल्ली के इस महत्वपूर्ण इलाके में बड़ी भीड़ जमा हो गई। ऐसी परिस्थितियों में तनाव बढ़ने और किसी अप्रिय घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के नाम पर अत्यधिक बल प्रयोग या अव्यवस्थित तरीके से हिरासत में लेना स्थिति को और गंभीर बना सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने राहुल गांधी की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। राहुल गांधी को जेड प्लस सुरक्षा प्राप्त है। ऐसी सुरक्षा व्यवस्था में उनके आसपास पर्याप्त संख्या में सुरक्षाकर्मियों का घेरा होना चाहिए। लेकिन जब दिल्ली पुलिस उन्हें रोकने या हिरासत में लेने की कोशिश करती है, तब उनकी सुरक्षा व्यवस्था किस तरह प्रभावित होती है, यह सवाल गंभीर है। क्या सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय बना रहता है? यदि नहीं, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इन सवालों का जवाब केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय को देना चाहिए।
राहुल गांधी लगातार यह कहते रहे हैं कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए वे सड़क पर उतरने से पीछे नहीं हटेंगे। सत्ता में बैठे लोगों के लिए यह केवल राजनीतिक विरोध हो सकता है, लेकिन विपक्ष के अनुसार चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की निष्पक्षता से जुड़े सवाल लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल आधार से जुड़े हैं। इसलिए विपक्षी सांसद चुनाव आयोग से मिलकर अपनी बात रखना चाहते हैं।
विपक्ष का कहना है कि उसे चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिलने का अधिकार है। यदि सांसद किसी संवैधानिक संस्था के प्रमुख से मिलने का अनुरोध कर रहे हैं और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना चाहते हैं, तो उन्हें रोकने का कारण स्पष्ट किया जाना चाहिए। यह भी सवाल उठ रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के कुछ प्रस्तावित दौरे क्यों रद्द हुए और वे विपक्षी नेताओं से मिलने से क्यों बच रहे हैं। किसी संवैधानिक संस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतंत्र में बेहद महत्वपूर्ण होती है।
इसी संदर्भ में पूर्व केंद्रीय गृह सचिव और मोदी सरकार में मंत्री रहे आरके सिंह की टिप्पणी भी उल्लेखनीय है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के प्रदर्शन या जुलूस निकालने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस को संविधान और कानून के अनुसार कार्य करना चाहिए, न कि किसी नेता के अवैध आदेश के अनुसार।
हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अनुच्छेद 19 के अधिकार पूर्ण नहीं हैं। सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और अन्य वैधानिक कारणों से सरकार उचित प्रतिबंध लगा सकती है। लेकिन किसी भी प्रतिबंध का आधार कानून होना चाहिए, राजनीतिक निर्देश नहीं। यदि किसी प्रदर्शन पर रोक लगाई जाती है, तो प्रशासन को उसका स्पष्ट कारण बताना चाहिए। साथ ही, पुलिस की कार्रवाई अनुपातिक, पारदर्शी और सभी पक्षों के लिए समान होनी चाहिए।
मंगलवार के प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और इंडिया गठबंधन के कुछ अन्य नेताओं के खिलाफ आकाशवाणी भवन में कथित रूप से बिना अनुमति प्रवेश करने के आरोप में एफआईआर दर्ज किए जाने की बात सामने आई है। राहुल गांधी ने इस पर कहा कि उनके खिलाफ पहले ही 45 एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं और वे 100 एफआईआर चाहते हैं। उनका यह बयान सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने और विपक्ष की आवाज दबाने के आरोपों के संदर्भ में आया है।
लोकतंत्र में मुकदमे और कानूनी कार्रवाई किसी भी व्यक्ति के खिलाफ हो सकती है, लेकिन यह सुनिश्चित करना सरकार और पुलिस की जिम्मेदारी है कि कानून का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध के तौर पर न हो। विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई हो तो उसके पीछे ठोस तथ्य और स्पष्ट कानूनी आधार होना चाहिए। इसी तरह, यदि विपक्षी सांसद कानून तोड़ते हैं, तो उन पर कार्रवाई की जा सकती है; लेकिन शांतिपूर्ण विरोध, नारेबाजी और संवैधानिक संस्थाओं से मिलने की कोशिश को अपराध की तरह पेश करना लोकतांत्रिक भावना के अनुकूल नहीं माना जा सकता।
सरकार और विपक्ष के बीच यह टकराव केवल दो राजनीतिक दलों का विवाद नहीं है। इसका असर देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और राजनीतिक संवाद की संस्कृति पर पड़ता है। यदि विपक्ष को अपनी बात रखने के लिए बार-बार हिरासत, बल प्रयोग और मुकदमों का सामना करना पड़ेगा, तो संसद के बाहर लोकतांत्रिक विरोध का स्थान सीमित होता जाएगा।
मोदी और शाह को यह समझना होगा कि विपक्ष को दबाकर राजनीतिक स्थिरता हासिल नहीं की जा सकती। लोकतंत्र में मजबूत सरकार के साथ मजबूत विपक्ष भी जरूरी होता है। सत्ता का वास्तविक सम्मान तभी होता है, जब वह आलोचना सुनने, सवालों का जवाब देने और असहमति के अधिकार की रक्षा करने का साहस दिखाए। इंडिया गठबंधन के सांसदों का लगातार प्रदर्शन यह संकेत दे रहा है कि वे पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। अब सरकार के सामने विकल्प है कि वह इस विरोध को बलपूर्वक रोकने की कोशिश करे या संवाद और संवैधानिक मर्यादा के रास्ते पर लौटे।
