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“आई हैवन्ट डाइड येट!” लंदन की संसद के सामने गांधी की वह मूर्ति, जो इतिहास से सवाल करती है

आई हैवन्ट डाइड येट!!

लंदन के Parliament Square पर टहलते हुए अचानक गांधी दिखे। आश्चर्य हुआ। गांधी की मूर्ति लंदन की संसद के सामने क्यों है?

ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे बड़े उपनिवेश—हिंदुस्तान—से आजादी का संघर्ष लड़ने वाले उस शख्स की कांस्य की सजीव मूर्ति, अंग्रेजों ने अपनी संसद के सामने, ऐसी आइकॉनिक लोकेशन पर लगाई है?

मूर्ति की जानकारी न थी, कहीं पढ़ा न था। खोजा, तो पता चला—यह मूर्ति 2015 में लगी थी। 14 मार्च 2015 को इसका अनावरण हुआ। भारतीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने प्रतिमा का अनावरण किया और ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने समारोह में भाषण दिया। यह गांधी के दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने की शताब्दी के अवसर पर स्थापित की गई थी। प्रतिमा ब्रिटिश मूर्तिकार Philip Jackson ने बनाई थी।

क्या ही विडंबना है कि जब गांधी को नकारने की बहसें भारत में उठती रही हैं, दुनिया के दूसरे हिस्सों में उनकी विरासत पर स्मारक बनते रहे हैं। लंदन के Parliament Square में गांधी की मौजूदगी इसका एक प्रतीक है।

यह गांधी सिर्फ भारत का आइकन नहीं रह गया। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में गांधी की प्रतिमाएँ और स्मारक इस बात के साक्षी हैं कि उनका विचार भारत की भौगोलिक सीमा से बाहर भी पहुँचा। 2008 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने मेक्सिको में कहा था कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में गांधी की 70 से अधिक प्रतिमाएँ स्थापित हो चुकी थीं।

गांधी की महानता का एक पक्ष यह भी है कि उनका विचार किसी एक देश की राजनीतिक स्मृति तक सीमित नहीं रहा। सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, सहिष्णुता और मनुष्यता—इन विचारों ने उन्हें एक वैश्विक नैतिक संदर्भ बना दिया। UNESCO के दस्तावेज भी सत्याग्रह को आधुनिक दुनिया में विकसित संगठित अहिंसक नागरिक प्रतिरोध की एक महत्वपूर्ण परंपरा के रूप में रेखांकित करते हैं, जिसने बाद के नागरिक अधिकार आंदोलनों को प्रभावित किया।

कहा जाता है कि गांधी की जीवनी लिखते समय रामचंद्र गुहा के साथ एक होटल में ऐसा प्रसंग हुआ, जब एक कर्मचारी ने गांधी की तस्वीर पहचान ली और बताया कि उनके देश में गांधी का सम्मान है। देश का नाम पूछा गया तो जवाब मिला—Dominican Republic।

यह प्रसंग गांधी की वैश्विक पहचान को समझने के लिए दिलचस्प है, हालांकि इसके स्वतंत्र प्राथमिक स्रोत का मुझे पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला। इसलिए इसे इतिहास का प्रमाण नहीं, बल्कि गांधी की अंतरराष्ट्रीय स्मृति से जुड़ा एक संस्मरण मानना बेहतर होगा।

गांधी ने शायद डोमिनिकन रिपब्लिक का नाम न सुना हो। लेकिन आज दुनिया के अनेक हिस्सों को गांधी का नाम पता है।

क्योंकि गांधी का संदेश किसी पॉलिटिशियन की यादगार स्पीच भर नहीं था। वह जीवन था, जीवन-शैली थी।

उस दुनिया ने दो महायुद्ध देखे। उसने देखा कि जब भाषा, धर्म, रंग और नस्ल की श्रेष्ठता का झगड़ा मानवता को विनाश के मुहाने तक ले जाता है, तब मनुष्य को फिर मनुष्यता की तरफ लौटने के रास्ते खोजने पड़ते हैं। गांधी का सत्याग्रह उसी खोज का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया।

भारत में सत्याग्रह का प्रयोग केवल भाषणों में नहीं हुआ। उसे आश्रमों में जिया गया, जेलों में भुगता गया और सड़कों पर उतारा गया। UNESCO के अनुसार गांधी के आश्रम सत्याग्रह, आत्मनिर्भरता, स्वदेशी, सामाजिक सुधार और अहिंसक प्रतिरोध के प्रयोगों के केंद्र बने।

गांधी की महानता, उनसे अभय में है।

महान वही, जिसकी विशालता आपको आतंकित न करे। जिसकी आप आलोचना कर सकें। जिसे तौल सकें।

गांधी की अहिंसा को स्त्रैण बताया गया। उनके निर्णयों पर सवाल हुए। उनके निजी जीवन और यौन व्यवहार पर भी सार्वजनिक विमर्श हुआ। गांधी पर आलोचना के लिए जगह रही—और शायद यही किसी लोकतांत्रिक समाज में किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को समझने का स्वस्थ तरीका भी है।

उन्हें मानिए, मत मानिए। लेकिन गांधी के विचारों से दूर जाने के रास्तों पर मानव इतिहास ने हिंसा, युद्ध और विनाश के कई उदाहरण देखे हैं। यही कारण है कि गांधी का विचार आज भी बहस में लौटता है।

क्योंकि गांधी आपकी ताकत की बात करते हैं।

गांधी, भीरुओं की ताकत हैं।

आम, डरपोक, शांति चाहने वाला व्यक्ति विरोध से डरता है, क्रांति से डरता है, हथियार उठाकर बढ़ने से डरता है। जो कानून, पुलिस, जेल, सरकार और मौत से डरता है—गांधी उसे वहीं से उठाते हैं।

अहिंसक रहकर, निडरता से दिल की कहने का आग्रह करते हैं। निडरता सत्य खुलने से, कर्तव्य जागने से और दूसरों का दर्द महसूस कर उसे दूर करने की जिम्मेदारी से आती है।

गांधी आपकी करुणा को जगाते हैं। चरखा कातने को कहते हैं, विदेशी कपड़ों के बहिष्कार को आंदोलन बनाते हैं, नमक को प्रतिरोध का प्रतीक बना देते हैं।

मामूली लगने वाले कामों को प्रतिरोध का प्रतीक और आंदोलन का हथियार बनाकर आम आदमी के हाथ में थमा देते हैं।

आप बंदूक उठाकर हत्या नहीं करना चाहते। बम नहीं चलाना चाहते। गांधी आपको चरखा देते हैं। लाखों लोग उसे चलाते हैं। कपड़ा, नमक, बहिष्कार, मार्च और जेल—साधारण नागरिक के रोजमर्रा के जीवन को राजनीतिक प्रतिरोध में बदल देते हैं।

यह काम अपराध नहीं। इसके लिए जेल भी जाना पड़े, तो भीतर अपराध-बोध नहीं, बल्कि अपने विश्वास पर खड़े होने का गर्व हो सकता है।

और जब जेल जाना गर्व की बात बन जाए, तो किसी साम्राज्य के लिए उस जनता को हमेशा दबाए रखना आसान नहीं रहता।

बूंद-बूंद प्रतिरोध का यही सागर अंततः उस साम्राज्य की सत्ता को चुनौती देता है, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसके साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता।

उसी Parliament Square में चर्चिल की भी मूर्ति है। वह चर्चिल जिसने युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा की और गांधी तथा भारतीय स्वतंत्रता की मांग का विरोध किया। गांधी की मूर्ति उसी सार्वजनिक स्थान पर उनके सामने एक ऐतिहासिक विडंबना की तरह खड़ी है। 2015 में प्रतिमा के अनावरण के समय ब्रिटिश और भारतीय नेताओं ने भी इस ऐतिहासिक संदर्भ को रेखांकित किया था।

और यहीं आता है वह वाक्य, जिसे वर्षों से गांधी और बंगाल के अकाल की कहानी के साथ दोहराया जाता है—

“Why hasn’t Gandhi died yet?”

लेकिन इतिहास के साथ यहाँ थोड़ी सावधानी जरूरी है। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार 4 जुलाई 1944 की अपनी डायरी में तत्कालीन वायसराय Archibald Wavell ने लिखा कि Winston Churchill ने उन्हें गांधी के अभी तक न मरने पर एक नाराजगी भरा तार भेजा था। लोकप्रिय रूप में इसे अक्सर Churchill का सीधा उद्धरण और 1943 के बंगाल अकाल से जोड़कर पेश किया जाता है। लेकिन Churchill के वास्तविक तार में अकाल के संदर्भ में यह वाक्य दर्ज नहीं है; उसमें गांधी के स्वास्थ्य से उबरने और फिर सक्रिय राजनीति में लौटने पर टिप्पणी थी।

इसलिए “Why hasn’t Gandhi died yet?” को Churchill का शाब्दिक उद्धरण मानना ऐतिहासिक रूप से सावधानी की मांग करता है। लेकिन यह भी तथ्य है कि Churchill और गांधी के बीच गहरा राजनीतिक मतभेद था और Churchill भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन तथा गांधी की रणनीति के मुखर आलोचक थे। 2015 में Parliament Square में गांधी की प्रतिमा के अनावरण के समय ब्रिटिश मीडिया ने भी Churchill और गांधी की उसी ऐतिहासिक राजनीतिक टकराहट को रेखांकित किया था।

बंगाल का 1943 का अकाल भी इतिहास का एक बेहद गंभीर अध्याय है। उसके कारणों और ब्रिटिश नीतियों की भूमिका पर इतिहासकारों के बीच विस्तृत बहस है; इसलिए गांधी से जुड़े इस लोकप्रिय उद्धरण को अकाल के लिए किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी का सरल प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।

लेकिन गांधी मरे नहीं।

वे फैल गए।

दुनिया के अलग-अलग कोनों में।

उनकी प्रतिमाओं में, उनके नाम पर बने संस्थानों में, मानवाधिकार और नागरिक प्रतिरोध के विमर्श में और उन आंदोलनों में, जिन्होंने अहिंसक प्रतिरोध को राजनीतिक शक्ति के रूप में इस्तेमाल किया। UNESCO भी सत्याग्रह की विरासत को दुनिया भर के नागरिक प्रतिरोध आंदोलनों पर पड़े प्रभाव के संदर्भ में दर्ज करता है।

आज भारत में गांधी को लेकर बहस है। उनकी आलोचना भी होती है, उनके विचारों को चुनौती भी दी जाती है और उनकी विरासत पर राजनीतिक मतभेद भी हैं। लेकिन Parliament Square की वह मूर्ति एक अलग सवाल पूछती हुई दिखाई देती है—जिस व्यक्ति ने ब्रिटिश साम्राज्य की सत्ता को चुनौती दी, उसकी प्रतिमा आज उसी संसद के सामने क्यों खड़ी है?

शायद इसलिए कि इतिहास केवल विजेताओं की संपत्ति नहीं होता। कभी-कभी जिनसे सत्ता लड़ती है, वही समय के साथ उसकी स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं।

गांधी आज भी वहीं खड़े हैं।

लंदन की संसद के सामने।

चर्चिल की मूर्ति के पास।

अपने हाथ में कोई बंदूक नहीं। कोई तलवार नहीं।

बस एक साधारण धोती, एक लाठी और वह विचार—कि सत्य और अहिंसा भी सत्ता से टकराने की शक्ति हो सकते हैं।

भारत में उन्हें हटाने की कोशिशें हों या उन्हें नकारने की आवाजें उठें—इतिहास में दर्ज गांधी को इतनी आसानी से हटाया नहीं जा सकता।

वह अपने कातिल से निगाहें मिला रहा है।

वह हिंदुस्तान में भी मौजूद है।

और मैं कल्पना करता हूँ—लंदन की संसद को देखकर भी वह मुस्कुरा रहा होगा।

अगर आप सहसा सुन सकें, तो शायद धीमी, गंभीर-सी आवाज आएगी…

“No. I haven’t died yet!”

 

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