-

गांधी का पता…

गांधी का पता…

अगर आप मोहनदास करमचंद गांधी को उनकी जिंदगी के अलग-अलग पड़ावों पर चिट्ठी लिखते, तो हर कुछ वर्षों में आपको उनका पता बदलता मिलता। लेकिन ये सिर्फ घरों के बदलते पते नहीं थे। इन पतों के साथ गांधी का जीवन, उनका विचार और अंततः उनका पूरा व्यक्तित्व बदलता गया।

1869 में पोरबंदर में जन्मे मोहनदास का बचपन राजकोट में भी बीता। उनके पिता करमचंद गांधी राजकोट के दीवान बने और परिवार का जीवन वहीं केंद्रित हुआ। आज भी काबा गांधी नो डेलो गांधी परिवार के राजकोट प्रवास की स्मृति से जुड़ा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है।

अगर उन दिनों मोहन को चिट्ठी लिखनी होती, तो पता पोरबंदर या राजकोट के उनके पारिवारिक निवास से जुड़ा होता। लेकिन 1887 में मैट्रिक पास करने और जनवरी 1888 में भावनगर के सामलदास कॉलेज में दाखिला लेने के बाद उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया। कॉलेज में वे लंबे समय तक नहीं टिक सके। इंग्लैंड जाकर कानून पढ़ने का फैसला हुआ और 10 अगस्त 1888 को वे राजकोट से मुंबई के लिए रवाना हुए। 4 सितंबर 1888 को उनका जहाज इंग्लैंड के लिए रवाना हुआ।

लंदन पहुँचने के बाद गांधी का जीवन बिल्कुल अलग दुनिया में प्रवेश कर चुका था। वे कानून पढ़ने आए थे और 6 नवंबर 1888 को Inner Temple में दाखिल हुए। लंदन पहुँचने के शुरुआती दिनों में उन्होंने एक महंगे होटल में ठहरने के बाद रहने की जगह बदली। उनके सबसे प्रमाणित लंदन पतों में से एक था—

20, Baron’s Court Road,
West Kensington, London

गांधी यहाँ लगभग आठ महीने रहे। आज इस मकान पर English Heritage की blue plaque लगी है। बाद में वे मितव्ययिता की ओर बढ़े और लंदन में उनके अन्य पते भी रहे। उपलब्ध स्रोतों में 15 St Charles Square और 52 St Stephen’s Gardens जैसे पते भी दर्ज हैं। इसलिए इंटरनेट पर मिलने वाले हर पुराने पते को गांधी का निश्चित और क्रमबद्ध निवास मानना सुरक्षित नहीं है।

27/29 सितंबर 1888 को इंग्लैंड पहुँचने की तारीख को लेकर पुराने दस्तावेजों में कुछ अंतर मिलता है, लेकिन गांधी के अपने लेखन में Victoria Hotel पहुँचने का उल्लेख 27 अक्टूबर 1888 के रूप में मिलता है।

भारत लौटे तो सामने एक और परीक्षा थी। जुलाई 1891 में बैरिस्टर बनकर लौटे गांधी ने मुंबई में वकालत शुरू की, लेकिन अदालत में जिरह करने में उन्हें अपनी कमजोरी का अनुभव हुआ। कुछ समय बाद वे राजकोट लौट गए।

1893 में दादा अब्दुल्ला एंड कंपनी से जुड़े एक कानूनी मामले के सिलसिले में वे दक्षिण अफ्रीका गए। यही यात्रा उनके जीवन की दिशा बदलने वाली साबित हुई। वहां वकालत के साथ-साथ भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए उनका सार्वजनिक संघर्ष शुरू हुआ।

दक्षिण अफ्रीका में गांधी की जिंदगी का अर्थ ही बदल गया। जिस व्यक्ति को भारत में अदालत की बहस को लेकर संकोच था, वही व्यक्ति वहाँ भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए सार्वजनिक संघर्ष का नेतृत्व करने लगा। वकालत अब सिर्फ रोजी-रोटी नहीं थी; वह सामाजिक और राजनीतिक काम के साथ जुड़ती चली गई।

दक्षिण अफ्रीका में उनके कई निवास रहे। जोहान्सबर्ग का 11 Albemarle Street ऐसा ही एक प्रमाणित निवास था, जहाँ वे 1904 से 1906 के बीच रहे। इसी दौर में उनका सामाजिक जीवन तेजी से बदल रहा था।

1904 में उन्होंने डरबन के पास Phoenix Settlement की स्थापना की। यह केवल रहने की जगह नहीं थी। यहाँ सामुदायिक जीवन, श्रम, सादगी और Indian Opinion के प्रकाशन से जुड़ा प्रयोग चल रहा था। गांधी के विचारों को व्यवहार में उतारने की यह उनकी शुरुआती प्रयोगशालाओं में से एक थी।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण सुधार जरूरी है। जिस जगह को मूल लेख में बाद के दौर के गांधी के पते के रूप में लिखा गया है, वह Tolstoy Farm और Phoenix Settlement को आपस में मिला देती है। दोनों अलग स्थान और अलग प्रयोग थे।

1910 में जोहान्सबर्ग के पास Tolstoy Farm स्थापित हुआ। गांधी के मित्र Hermann Kallenbach ने लगभग 1,100 एकड़ की जमीन सत्याग्रहियों और उनके परिवारों के लिए उपलब्ध कराई। यहाँ सामुदायिक जीवन, श्रम, शिक्षा, आत्मनिर्भरता, भोजन और अनुशासन के प्रयोग हुए। गोपाल कृष्ण गोखले ने 1912 में Tolstoy Farm में गांधी से मुलाकात भी की।

यानी दक्षिण अफ्रीका में गांधी के पते बदल रहे थे और उन्हीं के साथ उनका जीवन भी। बैरिस्टर गांधी धीरे-धीरे सत्याग्रही गांधी में बदल रहे थे। वकालत उनका पेशा था, लेकिन सार्वजनिक जीवन उनका मिशन बनता जा रहा था।

जनवरी 1915 में गांधी भारत लौटे। 17 जनवरी को वे राजकोट पहुँचे, लेकिन अब उनकी जिंदगी पहले जैसी नहीं थी। मई 1915 में अहमदाबाद के कोचरब में उन्होंने अपना पहला आश्रम स्थापित किया। यह गांधी के भारत लौटने के बाद का पहला बड़ा आश्रम-निवास था।

फिर 1917 में आश्रम साबरमती ले जाया गया। साबरमती नदी के किनारे की जमीन पर शुरुआत में सुविधाएँ बहुत सीमित थीं। गांधी ने खुद लिखा कि वहाँ शुरू में न भवन था, न पेड़; आश्रमवासियों ने तंबुओं और अस्थायी व्यवस्था से शुरुआत की।

अब गांधी का पता था—

सत्याग्रह आश्रम,
साबरमती, अहमदाबाद

यही वह पता था जहाँ से गांधी का सार्वजनिक जीवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में बदल गया। चंपारण, खेड़ा, अहमदाबाद, असहयोग, स्वदेशी, हिंदू-मुस्लिम एकता और रचनात्मक कार्यक्रम—इन सबके बीच साबरमती आश्रम एक केंद्र बना रहा।

फिर आया 12 मार्च 1930। गांधी 78 साथियों के साथ साबरमती से दांडी के लिए निकले। नमक कानून तोड़ने के लिए निकली यह यात्रा केवल एक मार्च नहीं थी; यह ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती थी। गांधी ने संकल्प लिया कि स्वतंत्रता प्राप्त हुए बिना वे साबरमती आश्रम वापस नहीं लौटेंगे।

वे सचमुच फिर साबरमती नहीं लौटे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अगले वर्षों में उनका जीवन लगातार जेल में ही बीता। वे जेल गए, रिहा हुए, देशभर में घूमे, हरिजन-उद्धार और सामाजिक सुधार के लिए यात्राएँ कीं और फिर 1931 में दूसरे गोलमेज सम्मेलन के लिए इंग्लैंड गए।

इस बार उनका पता फिर लंदन था। उन्होंने वहाँ Kingsley Hall में निवास किया और 5 नवंबर 1931 को सम्राट जॉर्ज पंचम के निमंत्रण पर Buckingham Palace के राजकीय स्वागत में शामिल हुए। वे अपने परिचित साधारण वस्त्रों—धोती और शॉल—में ही वहाँ पहुँचे।

इसे अक्सर इस अंदाज में सुनाया जाता है कि गांधी ने राजा को “ठेंगा दिखा दिया” और कुछ ही महीनों बाद जेल पहुँच गए। इतिहास थोड़ा अधिक जटिल है। वे दिसंबर 1931 के अंत में भारत लौटे और जनवरी 1932 में फिर गिरफ्तार होकर यरवदा जेल भेजे गए। यानी लोकप्रिय किस्सा जिस तरह समय और घटनाओं को जोड़ता है, वह वास्तविक क्रम का सरल किया हुआ संस्करण है।

और फिर गांधी के पते की सूची में जेलों की लंबी कतार जुड़ती गई—यरवदा, साबरमती, आगा खां पैलेस और देश के अलग-अलग हिस्सों में नजरबंदी और कारावास के स्थान।

लेकिन गांधी का एक और पता था—एक ऐसा पता जो जेल से बाहर निकलने के बाद उनके जीवन की अगली दिशा तय करने वाला था।

वर्धा।

जमनालाल बजाज लगातार चाहते थे कि गांधी वर्धा के आसपास रहें। गांधी शहर के बजाय गाँव में रहकर काम करना चाहते थे। अंततः 1936 में उन्होंने वर्धा के पास सेगाँव को अपना निवास बनाया।

गांधी ने साफ कहा था कि उनकी कुटिया बनाने में बहुत कम खर्च होना चाहिए। उन्होंने खर्च की सीमा 100 रुपये से अधिक न रखने की बात कही थी। स्थानीय सामग्री और स्थानीय श्रम से बनी साधारण कुटिया ही उनकी जीवन-शैली के अनुकूल थी।

30 अप्रैल 1936 को गांधी सेगाँव पहुँचे। तब यह एक छोटा-सा गाँव था—न ठीक सड़क, न डाकघर, न टेलीग्राफ की सुविधा। चिट्ठियाँ वार्धा से आती थीं। आसपास शेगाँव नाम का एक दूसरा प्रसिद्ध स्थान भी था, जिसके कारण गांधी के पत्र अक्सर गलत जगह पहुँच जाते थे। अंततः 1940 में गाँव का नाम बदलकर सेवाग्राम कर दिया गया।

यहीं से गांधी के जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ। बापू कुटी उनका निवास थी और आश्रम धीरे-धीरे राष्ट्रीय गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। उनकी चिट्ठियाँ यहीं से देश-दुनिया में जाती थीं। सहयोगी उनके साथ काम करते थे और राष्ट्रीय आंदोलनों की योजनाएँ भी इसी वातावरण में बनती थीं।

ब्रिटिश सरकार के लिए यह छोटा-सा गाँव भी महत्वहीन नहीं रह गया था। सेवाग्राम में गांधी से संपर्क बनाए रखने के लिए टेलीफोन की सुविधा उपलब्ध कराई गई। आज भी गांधी के सचिवालय से जुड़ी उस व्यवस्था की स्मृति वहाँ सुरक्षित है।

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की दिशा तय हुई। गांधी और उनके सहयोगी बंबई गए। 9 अगस्त 1942 को गांधी गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें आगा खां पैलेस में नजरबंद रखा गया। वहीं 22 फरवरी 1944 को कस्तूरबा गांधी का निधन हुआ।

जब गांधी आगा खां पैलेस से बाहर आए, तब उनके जीवन का एक स्थायी साथी उनसे विदा हो चुका था। उम्र बढ़ चुकी थी, स्वास्थ्य कमजोर था, लेकिन यात्राएँ बंद नहीं हुई थीं।

1946 में वे नोआखाली पहुँचे। देश सांप्रदायिक हिंसा से गुजर रहा था और गांधी गाँव-गाँव पैदल चलते रहे। फिर वे बिहार, कलकत्ता और दिल्ली जाते रहे। स्वतंत्रता आ चुकी थी, लेकिन गांधी की चिंता सत्ता हासिल करने से ज्यादा समाज को टूटने से बचाने की थी।

9 सितंबर 1947 से गांधी दिल्ली के बिड़ला हाउस में रहने लगे। यह वही स्थान था जहाँ उनके जीवन के अंतिम 144 दिन बीते।

और फिर 30 जनवरी 1948 को उनकी जिंदगी का आखिरी पता बदल गया। शाम की प्रार्थना के लिए जाते हुए गांधी की हत्या कर दी गई।

उनका अंतिम भौतिक पता आज 5, तीस जनवरी मार्ग, नई दिल्ली के रूप में गांधी स्मृति है। लेकिन गांधी की कहानी शायद यहीं खत्म नहीं होती।

गांधी के पते गिनिए तो एक अजीब यात्रा दिखाई देती है—पोरबंदर से राजकोट, राजकोट से भावनगर, मुंबई से लंदन, लंदन से दक्षिण अफ्रीका, Phoenix से Tolstoy Farm, फिर Kochrab, Sabarmati, जेलें, Wardha, Sevagram और अंततः Birla House।

हर पता एक गांधी को पीछे छोड़ता गया और एक नया गांधी सामने आता गया। पहले वह एक दीवान का बेटा था। फिर विद्यार्थी हुआ। फिर बैरिस्टर। फिर प्रवासी भारतीयों का वकील। फिर सत्याग्रही। फिर स्वतंत्रता आंदोलन का नेता। और अंततः वह आदमी, जिसकी पहचान किसी एक पद या सरकारी पते से नहीं होती।

शायद इसीलिए गांधी का आखिरी पता किसी नक्शे पर नहीं मिलता। उनका शरीर बिड़ला हाउस से विदा हुआ, लेकिन उनके विचारों का पता कहीं अधिक कठिन है।

वह शायद किसी आश्रम की मिट्टी में है। किसी जेल की कोठरी में है। किसी भूखे आदमी के सवाल में है। किसी ऐसे नागरिक की आवाज में है जो सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार अपने पास रखना चाहता है।

आज जब गांधी को लेकर समाज में तीखी बहस होती है, उनके विचारों की आलोचना भी होती है और प्रशंसा भी, तब उनके जीवन का यह सफर एक सवाल छोड़ता है—गांधी का असली पता आखिर था कहाँ?

शायद जवाब किसी शहर, मकान या सड़क का नाम नहीं है।

शायद उनका पता उस साधारण आदमी के बीच था, जिसके लिए वे बार-बार सत्ता और सुविधा से दूर जाते रहे।

और शायद इसीलिए, जब हम अपने समय में असहमति, हिंसा, भेदभाव और नफरत के बीच किसी मानवीय रास्ते की तलाश करते हैं, तो हमें गांधी का पता फिर याद आता है।

शायद हमें गांधी को ढूँढ़ने से पहले, गांधी के भीतर की इंसानियत, सत्य और हिम्मत को ढूँढ़ना होगा।

हैप्पी बर्थडे, गांधी जी। ❤️

LATEST POSTS

“आई हैवन्ट डाइड येट!” लंदन की संसद के सामने गांधी की वह मूर्ति, जो इतिहास से सवाल करती है

गांधी की मूर्ति लंदन की Parliament Square में गांधी की मूर्ति Churchill की प्रतिमा के पास खड़ी है। यह सिर्फ एक स्मारक नहीं, बल्कि गांधी और ब्रिटिश साम्राज्य के बीच ऐतिहासिक संघर्ष और उनकी वैश्विक विरासत की कहानी भी है।

क्या ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो सकती है?

-संजय कुमार शर्मा- चुनाव आयोग को लेकर देश में उठ रहा विवाद अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश...

हक अपना, पैरवी दूसरे की: जब दलाल ही बन बैठा व्यवस्था की चाबी

जब नागरिक अपने ही हक के लिए बिचौलिये की तलाश करे, तो सवाल सिर्फ दलाली का नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही का भी है।