लखनऊ, 22 जुलाई (वेब वार्ता)। उच्चतम न्यायालय द्वारा प्राथमिक स्तर के शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा अनिवार्य किए जाने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश के कार्यरत शिक्षकों को बड़ी राहत देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। शासन ने कार्यरत शिक्षकों के लिए विशेष शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित कराने का निर्णय लिया है तथा उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग को इसकी विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर शीघ्र उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।
बेसिक शिक्षा विभाग के विशेष सचिव अवधेश कुमार तिवारी की ओर से जारी पत्र के अनुसार उच्चतम न्यायालय के आदेश से प्रदेश के 64,062 प्राथमिक शिक्षक, 76,256 उच्च प्राथमिक शिक्षक तथा 2,500 विशेष शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं। इस प्रकार कुल 1,42,818 शिक्षकों के लिए विशेष शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित करने की तैयारी की जा रही है।
शासन की ओर से आयोग के सचिव को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि सरकार के निर्णय के अनुरूप विशेष शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित करने के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर जल्द उपलब्ध कराई जाए, ताकि परीक्षा की प्रक्रिया समयबद्ध ढंग से आगे बढ़ाई जा सके। उल्लेखनीय है कि इस विषय को लेकर प्रभावित शिक्षक लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं और संसद के मानसून सत्र के दौरान भी इस मुद्दे पर राहत की मांग उठाई जा रही है।
दंपती शिक्षकों को आवेदन के लिए मिला अतिरिक्त समय
इस बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के निर्देशों के अनुपालन में बेसिक शिक्षा विभाग ने अंतर्जनपदीय तबादलों के लिए दंपती शिक्षकों को राहत प्रदान की है। शासन ने आवेदन की अंतिम तिथि बढ़ाकर 5 अगस्त कर दी है।
बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने महानिदेशक स्कूल शिक्षा को निर्देश दिया है कि न्यायालय के आदेश के अनुरूप पात्र शिक्षक-शिक्षिकाओं को आवेदन के लिए अतिरिक्त समय उपलब्ध कराया जाए। साथ ही विभागीय पोर्टल पर सूचना जारी कर सभी जिलों के शिक्षकों को इसकी जानकारी देने के निर्देश भी दिए गए हैं। विभाग के अनुसार, प्रक्रिया को लेकर उत्पन्न भ्रम के कारण कई शिक्षक समय पर आवेदन नहीं कर सके थे।
69 हजार शिक्षक भर्ती मामले में सरकार की सूची पर न्यायालय के सवाल
उधर, उत्तर प्रदेश की 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती में आरक्षण संबंधी विवाद पर उच्चतम न्यायालय में भी सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत लगभग 8,270 अभ्यर्थियों की सूची को अंतिम मानने से इनकार कर दिया।
न्यायालय ने सभी पक्षों को वर्ष 2020 से अब तक इस मामले में हुई समस्त कार्यवाही का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को निर्धारित की गई है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने संशोधित चयन सूची के आधार पर नई कटऑफ भी न्यायालय के समक्ष रखी। सरकार के अनुसार पुनर्गणना के बाद अनारक्षित वर्ग की कटऑफ 69.42, अन्य पिछड़ा वर्ग की 65.92, अनुसूचित जाति की 60.14 तथा अनुसूचित जनजाति की 56.09 निर्धारित हुई है।
हालांकि, आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने सरकार के हलफनामे और सूची पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराईं। उनका कहना था कि जब तक पूरी मूल चयन सूची अभ्यर्थियों के प्राप्तांक, श्रेणी और उपश्रेणी सहित सार्वजनिक नहीं की जाती, तब तक आरक्षण संबंधी गड़बड़ियों का सही आकलन संभव नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार द्वारा प्रस्तुत सूची में ऐसे अभ्यर्थियों के नाम शामिल हैं, जिन्होंने बाद की परामर्श प्रक्रिया में भाग ही नहीं लिया था, जबकि कुछ ऐसे अभ्यर्थियों को भी सूची में रखा गया है जिन्हें उत्तर कुंजी विवाद के कारण अतिरिक्त अंक प्राप्त हुए थे। इन सभी बिंदुओं पर अब आगामी सुनवाई में विस्तृत बहस होने की संभावना है।




