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सुरक्षित विकल्पों के दौर में निर्माता निखिल द्विवेदी ने किया ‘बंदर’ जैसी साहसी फिल्म का समर्थन

-क्यों निर्माता निखिल द्विवेदी की ‘बंदर’ इस साल की सबसे साहसी फिल्मों में से एक है

मुंबई, 11 जून (वेब वार्ता)। ऐसी फिल्म का समर्थन करने के लिए बेहद साहस चाहिए, जो असहज कर देने वाले सच को सामने लाने की हिम्मत रखती हो। ऐसे दौर में, जब फिल्म इंडस्ट्री में अक्सर सुरक्षित और फॉर्मूला आधारित विषयों को प्राथमिकता दी जाती है, एक कच्ची, सशक्त और झकझोर देने वाली कहानी को पर्दे पर लाने के लिए दृढ़ विश्वास, दूरदृष्टि और निडरता की आवश्यकता होती है। यही साहस निर्माता निखिल द्विवेदी ने इस साल की सबसे चर्चित और सराही गई फिल्मों में से एक ‘बंदर’ के साथ दिखाया है।

बॉबी देओल अभिनीत और अनुराग कश्यप द्वारा निर्देशित ‘बंदर’ कोई आसान जवाब देने वाली या पारंपरिक मनोरंजन पर आधारित फिल्म नहीं है। इसके बजाय, यह उन वास्तविकताओं पर बेबाक नजर डालती है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। फिल्म की कहानी समर नाम के एक कभी मशहूर अभिनेता के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी घटती लोकप्रियता और निजी संघर्षों से जूझ रहा है। उसकी जिंदगी तब पूरी तरह बदल जाती है, जब वह एक झूठे मामले में फंस जाता है। इसके बाद शुरू होता है एक दर्दनाक सफर, जो ऐसे तंत्र की परतें खोलता है, जिसे पार करना लगातार कठिन होता जा रहा है, और जो संस्थागत विफलताओं की मानवीय और भावनात्मक कीमत को उजागर करता है।

जहां बॉबी देओल ने अपने करियर के सबसे प्रभावशाली प्रदर्शनों में से एक दिया है और अनुराग कश्यप ने अपनी विशिष्ट रॉ और यथार्थवादी कहानी कहने की शैली से फिल्म को सशक्त बनाया है, वहीं यह सब दर्शकों तक कभी नहीं पहुंच पाता यदि कोई निर्माता इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार न होता। वह निर्माता हैं निखिल द्विवेदी। वर्षों से द्विवेदी ने अलग, महत्वाकांक्षी और सार्थक कहानियों को समर्थन देने की पहचान बनाई है। ‘बंदर’ के साथ उन्होंने एक बार फिर साबित किया है कि वे ऐसे सिनेमा के पक्षधर हैं, जो सवाल उठाता है, सोचने पर मजबूर करता है और चर्चा को जन्म देता है।

फिल्म में झूठे मामलों, न्याय व्यवस्था की कार्यप्रणाली और जेल जीवन की कठोर वास्तविकताओं को बेहद तीव्र और बिना किसी समझौते के प्रस्तुत किया गया है। ये ऐसे विषय हैं जो कई लोगों को असहज कर सकते हैं, लेकिन ये महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन पर चर्चा होना जरूरी है। ऐसे प्रोजेक्ट का समर्थन करना केवल एक रचनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि साहस का परिचायक भी है।

ऐसे समय में जब फॉर्मूला आधारित कंटेंट का बोलबाला है, ‘बंदर’ निडर फिल्म निर्माण की ताकत की याद दिलाती है। उन कहानियों का साथ देने के लिए दृढ़ विश्वास चाहिए, जो व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं, सामाजिक सच्चाइयों को सामने लाती हैं और दर्शकों को आत्ममंथन के लिए मजबूर करती हैं। निखिल द्विवेदी का ‘बंदर’ को साकार करने का फैसला इसी विश्वास का प्रमाण है। ऐसा करके उन्होंने सिर्फ एक फिल्म का समर्थन नहीं किया, बल्कि ऐसे सिनेमा का साथ दिया है जो कठिन सच्चाइयों का सामना करने का साहस रखता है और खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक दर्शकों के मन में अपनी छाप छोड़ता है।

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