Blogमीडिया सरकार और लोगों के बीच एक ब्रिज...

मीडिया सरकार और लोगों के बीच एक ब्रिज का काम करता है : विजेंद्र गुप्ता

दिल्ली विधान सभा स्पीकर विजेंद्र गुप्ता जी ने – बिल्कुल सटीक कहा की मीडिया एक पूल है सरकार और जनता के बीच लेकिन देखने को यह मिल रहा है की नेता उस पूल के ज़रिये लोगों तक तो पहुँच रहे है लेकिन  – कुछ गिने चुने लोग ही उस ब्रिज पर चलने में सक्षम हैं।

मौजूदा हालात पर यह ब्लॉग ज़रूर पढ़े….

यह ब्लॉग एक हिंदुस्तानी पत्रकार द्वारा लिखा गया है – जो की न हिंदू है और न मुसलमान न ईसाई है और न सिख – उसका सिर्फ़ एक धर्म है – राष्ट्र धर्म!

“हिंदी पत्रकारिता दिवस” — इन तीन शब्दों में मैं आज “हिंदी” और “दिवस” को थोड़ी देर के लिए अलग रख देता हूँ। क्योंकि असल में हिंदी पत्रकारिता दिवस तो कल है। लेकिन हमने इस कार्यक्रम के लिए आज का दिन क्यों चुना?

क्योंकि हमारे लिए, और शायद आपके लिए भी, आज का दिन सबसे महत्वपूर्ण है। हमारे दादा-परदादा, माता-पिता, हमारे परिवार के जन्मदिनों से भी बड़ा दिन। जी हाँ, आज जुमे का दिन है — और इसी दिन हिंदुस्तान को आज़ादी मिली थी।

एक हिंदुस्तानी के लिये  15 August 1947 से बड़ा कोई दिन हो सकता है क्या?

ज़रा सोचिए…

हज़ारों नहीं, लाखों लोगों ने इस मिट्टी की आज़ादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। अगर यह देश आज़ाद न हुआ होता, तो न जाने कितने और जलियाँवाला बाग होते। शायद आज न आप होते, न हम होते। यहाँ सिर्फ अंग्रेज़ होते और उनकी औलादें राज कर रही होतीं। इसलिए शुक्र है उस खुदा का, उस कुदरत का, जिसने हिंदुस्तान को आज़ादी का यह तोहफ़ा जुमे के दिन दिया। गौर कीजिए, यह सौभाग्य पाकिस्तान को भी नसीब नहीं हुआ। आज इंटरनेट और एआई के दौर में भाषा की सीमाएँ टूट चुकी हैं। भाषा आपको एक दायरे में बाँध सकती है, लेकिन जज़्बा आपको पूरी दुनिया से जोड़ देता है।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की हिंदी बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन आज वे हर हिंदुस्तानी के दिल में बसे हुए हैं। क्योंकि इंसान की ताकत उसकी भाषा नहीं, उसका विज़न और उसका चरित्र होता है। उदंत मार्तण्ड — पहला हिंदी अख़बार — कोलकाता से निकला। इसकी जड़ें बंगाल में थीं। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत की आत्मा किसी एक भाषा या एक प्रदेश में सीमित नहीं है।

आज सबसे बड़ी ज़रूरत है — युवाओं से जुड़ने की।

आज के युवा को कुछ लोग मज़ाक में “कॉकरोच” कहते हैं। लेकिन सच यह है कि वही हर घर में मौजूद हैं। वही हमारे बच्चे हैं। उन्हें “हिट” से मारने की नहीं, समझने की ज़रूरत है। वे पाकिस्तानी नहीं हैं। वे इसी मिट्टी के बच्चे हैं। वे सवाल पूछते हैं, बहस करते हैं, सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हैं — क्योंकि वे जाग चुके हैं।

हमें पूरी उम्मीद है कि हमारे हर दिल अज़ीज़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अभिजीत और मिस लिंग जैसे युवाओं से बात करना पसंद करेंगे। लेकिन किसी भी बड़े व्यक्ति को सिर्फ दूर से देखकर या यूट्यूब क्लिप्स देखकर पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।

मोदी जी कौन हैं? यह जानना है तो उन लोगों से पूछिए जो उनके करीब रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने लेक्स फ्रिडमैन जैसे अंतरराष्ट्रीय पॉडकास्टर से लंबी बातचीत की। उन्होंने अंकित ब्यानपुरिया जैसे साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले युवा से भी संवाद किया। यह दिखाता है कि भारत का लोकतंत्र आज संवाद के नए दौर में प्रवेश कर चुका है।

लेकिन इसके साथ एक ज़िम्मेदारी भी आती है।

अपना किरदार इतना बड़ा बनाइए कि प्रधानमंत्री खुद आपको बुलाकर आपसे बात करें। आखिर वे इस देश के प्रधानमंत्री हैं, कोई सड़क पर खड़े फेरीवाले नहीं कि आप दूर से आवाज़ लगाएँ — “ओ मिस्टर प्राइम मिनिस्टर!”

अदब, तहज़ीब और सम्मान — यही भारतीय संस्कृति की पहचान है।

आज कुछ विदेशी संस्थाएँ हमें “प्रेस फ्रीडम इंडेक्स” का पाठ पढ़ाती हैं। लेकिन क्या वे हमारी सभ्यता को जानते हैं? क्या वे समझते हैं कि भारत हजारों वर्षों पुरानी संस्कृति वाला देश है, जहाँ संवाद और बहस की परंपरा वेदों से चली आ रही है?

हाँ, गलतियाँ हमसे भी होती हैं।

कुछ नेताओं ने अभिजीत के फॉलोअर्स को “पाकिस्तानी” कहा। युवा भारत को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया। कुछ लोगों ने एक बेटी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया — यह भी गलत है।मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसी हरकतें प्रधानमंत्री मोदी को भी पसंद नहीं होंगी। वे युवा भारत से संवाद करना चाहते हैं। लेकिन युवा भी ऐसा हो — जो साफ स्लेट की तरह हो। किसी एजेंडे का हिस्सा नहीं, किसी का प्लांटेड एजेंट नहीं।

भारत का भविष्य नफरत में नहीं, संवाद में है।

आज हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर हमें यह तय करना होगा कि पत्रकारिता सिर्फ सत्ता से सवाल पूछने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का दायित्व भी है।

यह देश बहस से चलेगा, बंटवारे से नहीं।

यह देश संवाद से आगे बढ़ेगा, गालियों से नहीं।

और यह देश युवाओं के सपनों से बनेगा — डर और नफ़रत से नहीं।

बंगाल की जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे गए।

वहाँ प्रेस की आज़ादी पर सवाल उठे।

और ठीक उसी समय भारत में युवा — कॉकरोच बनकर सवाल दाग रहे थे।

सवाल यह है कि क्या भारत का मीडिया अब भी नहीं जागेगा?

हम चाहते हैं कि हमारा प्रधानमंत्री पच्चीस साल और  देश का नेतृत्व करे।

लेकिन क्या देश चलाने की जिम्मेदारी सिर्फ एक व्यक्ति की है? क्या हमारा काम केवल तालियाँ बजाना है? क्या हमारा फर्ज नहीं कि हम सुझाव दें, गलतियों की ओर इशारा करें, व्यवस्था को आईना दिखाएँ? लोकतंत्र में समर्थन का मतलब अंधभक्ति नहीं होता। देशभक्ति का मतलब सिर्फ नारे नहीं होते। सच्चा साथ वही है जहाँ सवाल भी हों, सुझाव भी हों और सुधार की गुंजाइश भी हो। लेकिन आज माहौल ऐसा बना दिया गया है कि हर तरफ सिर्फ एक ही आवाज सुनाई देती है —

“इस्तीफा दो!”

अरे भाई, दे देंगे इस्तीफा भी।

लेकिन यह तो बताओ — अगर हम नहीं, तो कौन?

किसके भरोसे छोड़ दें देश?

उन लोगों के भरोसे जो सिर्फ कुर्सी चाहते हैं, जिम्मेदारी नहीं?

उनके भरोसे जिनके पास आलोचना तो है, लेकिन कोई स्पष्ट दिशा नहीं?

देश केवल सरकार से नहीं चलता।

देश चलता है जनता की जागरूकता से, मीडिया की ईमानदारी से, युवाओं के सवालों से और समाज की भागीदारी से। अगर युवा सवाल पूछ रहे हैं, तो उन्हें देशद्रोही मत कहिए। अगर पत्रकार जवाब मांग रहे हैं, तो उन्हें दुश्मन मत बनाइए। क्योंकि जब सवाल खत्म हो जाते हैं, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। आज जरूरत किसी के पतन की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के जागने की है।

कोविड के दौरान चीन ने प्रेस का मुंह बंद कर दिया था। सवाल पूछने वालों को चुप कराया गया। डॉक्टरों की चेतावनियों को दबाया गया। सच्चाई को पर्दों के पीछे कैद कर दिया गया। और नतीजा क्या हुआ? एक वायरस पूरी दुनिया में फैल गया।लाखों जानें चली गईं।  पूरी मानवता ने उसकी कीमत चुकाई। यही वजह है कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है।

मीडिया सिर्फ खबर नहीं देता, वह खतरे की घंटी भी बजाता है।मीडिया उस प्रेशर कुकर की सीटी है, जो समय रहते चेतावनी देती है कि अंदर दबाव बढ़ रहा है। अगर सीटी ही बंद कर दी जाए, तो एक दिन कुकर फटेगा ही।

और जब विस्फोट होगा,

तो उसका अंजाम सिर्फ सरकार नहीं भुगतेगी।

न विपक्ष अकेला भुगतेगा।

न कोई एक नेता।

उसका दर्द हम सब झेलेंगे।

पूरा देश भुगतेगा।

समाज भुगतेगा।

आने वाली पीढ़ियाँ भुगतेंगी।

इसलिए सवालों से डरना नहीं चाहिए। आलोचना को दुश्मनी नहीं समझना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल ही सुरक्षा कवच होते हैं।  जहाँ प्रेस आज़ाद होता है, वहाँ गलतियाँ समय रहते सामने आ जाती हैं।  लेकिन जहाँ आवाज़ें दबा दी जाती हैं,

वहाँ सन्नाटा सबसे बड़ा खतरा बन जाता है।

Please note in foreign countries stories of social media reaches faster than main stream media – In Europe – America – Australia – Canada – France – Germany very few watch Indian mainstream media and the negative stories about the government through social and digital media gets viral and creates a distorted image of India – fake news has to be busted – our concern must be India First politics later!

IMG 20260530 WA0010

Webvarta team is filled with gratitude to welcome Vijender Gupta as the Chief Guest his words motivated the journalist community at large – the true voices of India are with him.

Delhi Vidhan Sabha speaker Vijender Gupta said that media has played a very important role to save democracy and the work done by Webvarta news agency is really praise worthy.

दिल्ली विधानसभा के स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने हिंदी पत्रकारिता दिवस पर कहा, “पत्रकारिता और समाचार पत्र का एक लंबा इतिहास है। एक समय ऐसा था जब हम देखते थे। अखबार के दफ्तरों में जाते थे तो अखबार छापने के लिए हाथ से वो पेज बनते थे। पेन से पत्रकार खबर लिख रहे होते थे। हमारे समय में भी जब हम कॉलेज के विद्यार्थी थे उसके बाद भी काफी समय तक चला है कि प्रेस रिलीज पहुंचती थी, हमारी प्रेस रिलीज से हाथ से कॉपी लिखी जाती थी और हाथ के अक्षर से पेज तैयार होते थे। तो आप सोचिए कि पिछले चार दशक में कितना बड़ा बदलाव आया है और वो पत्रकार आज भी हैं जिन्होंने वो समय भी देखा है और आज का समय भी है अब तो AI का जमाना आ गया। अब तो ट्रांसलेशन कोई इशू नहीं रहे हैं, मुझे लगता है। कोई भाषा में आप ट्रांसलेशन कर लीजिए।

Delhi Vidhan Sabha speaker said that journalism has new challenges in this digital age where the needs of the readers have changed. Newspaper can never be replaced. Hindi journalism is here to stay as they have the maximum readers. Editor in Chief of Webvarta said that we face lot of challenge and the Delhi government should look into it and provide pension for journalist in Delhi. He mentioned an incident where a senior journalist committed suicide due to lack of funds for survival.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_img
- Advertisement -spot_img

Latest

- Advertisement -spot_img
- Advertisement -

More articles

- Advertisement -
- Advertisement -