विश्व थैलेसीमिया दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम, विशेषज्ञों ने बचाव के बताए उपाय

-262 मरीज बाल रोग में पंजीकृत

-थैलेसिमिया एक आनुवंशिक बीमारी, बच्चों में हुई बढ़ोत्तरी

-10-15 बच्चों को प्रतिदिन चढ़ता है खून

-हरी शंकर शर्मा

ब्यूरो कानपुर, वेब वार्ता। विश्व थैलेसिमिया दिवस पर जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग में एक जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में थैलेसिमिया से किस तरह बचाव किया जाए इस पर जोर दिया गया। बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ शैलेंद्र कुमार गौतम ने बताया कि 6 माह से 18 वर्ष की उम्र वाले बच्चों में अधिकांश ये बीमारी देखने को मिल रही है। उन्होंने बताया कि थैलेसिमिया बीमारी में देखा गया है कि मरीज के खून में आयरन की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। ये बीमारी आनुवांशिक है, जो बच्चे को गर्भ में मिल जाती है।

इस बीमारी में मरीज को बार बार खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है, जो कि बहुत ही जटिल होता है। वर्तमान में लगभग 262 मरीज विभाग में पंजीकृत है। सरकार ने इस बीमारी की दवा को महंगी दवाओं की श्रेणी से बाहर रखा है। उन्होंने बताता की बाल रोग विभाग में प्रतिदिन 10-15 बच्चे खून चढ़ाने आते है। 6-18 माह के बीच जन्मजात बच्चों में थैलेसिमिया होने से उनकी ग्रोथ कम हो जाती है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए जरूरी टेस्ट करवाना बहुत जरूरी होता है,ताकि उसे रोका जा सके। कार्यक्रम के दौरान मुख्य रूप से पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ ए के आर्या व डॉ अमितेश यादव समेत बाल रोग विभाग के संकाय सदस्य मौजूद रहे।

एचपीसीएल टेस्ट है जरूरी
डॉ शैलेन्द्र कुमार गौतम ने बताया कि जब बच्चा मां के गर्भ में होता है तो मां को एचपीसीएल टेस्ट करना अनिवार्य होता है। इस टेस्ट के माध्यम से पता चल जाता है कि पेट में पलने वाला बच्चा थैलेसिमिया का शिकार तो नहीं हुआ है। जांच में पता चलने पर बीमारी की रोकथाम की जा सकती है।

थैलेसीमिया कैसे होता है?
​हमारे शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं (आरबीसी) के अंदर हीमोग्लोबिन नाम का एक प्रोटीन होता है। हीमोग्लोबिन का काम फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर पूरे शरीर के अंगों तक पहुँचाना है। ​हीमोग्लोबिन दो तरह की प्रोटीन श्रृंखलाओं से बना होता है: अल्फा और बीटा। जब शरीर के जीन में गड़बड़ी के कारण इन दोनों में से किसी भी प्रोटीन का निर्माण पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पाता, तो लाल रक्त कोशिकाएं सही ढंग से नहीं बन पातीं और जल्दी नष्ट होने लगती हैं। इससे शरीर में खून की भारी कमी हो जाती है, जिसे एनीमिया कहते हैं।

थैलेसीमिया ​बीमारी के प्रमुख कारण
​थैलेसीमिया बीमारी अनुवांशिक बीमारी है। हीमोग्लोबिन बनाने के लिए जिम्मेदार जीन में गड़बड़ी (Mutation) हो जाती है। यह गड़बड़ी माता-पिता से विरासत में मिलती है। यदि माता या पिता में से केवल एक व्यक्ति के जीन में गड़बड़ी है, तो बच्चा ‘थैलेसीमिया माइनर’ हो सकता है। ऐसे बच्चे आमतौर पर स्वस्थ दिखते हैं, लेकिन वे इस बीमारी के वाहक होते हैं। और अगर ​थैलेसीमिया मेजर है तो माता और पिता दोनों थैलेसीमिया माइनर हैं, तो उनके बच्चे को ‘थैलेसीमिया मेजर’ होने की 25% संभावना होती है। यह स्थिति गंभीर होती है और इसमें बच्चे को जीवित रहने के लिए नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन (खून चढ़ाने) की जरूरत पड़ती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_img
- Advertisement -spot_img

Latest

- Advertisement -spot_img

More articles