Sunday, February 1, 2026
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प्रधानमंत्री मोदी रामनवमी पर देश के पहले वर्टिकल लिफ्ट पंबन रेलवे ब्रिज का उद्घाटन करेंगे

नई दिल्ली, (वेब वार्ता)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 6 अप्रैल को रामनवमी के अवसर पर देश के पहले वर्टिकल लिफ्ट पंबन रेलवे ब्रिज का उद्घाटन करेंगे। यह वर्टिकल लिफ्ट रेलवे सी ब्रिज समुद्र के ऊपर से गुजरते हुए रामेश्वरम द्वीप को तमिलनाडु के मंडपम से जोड़ता है। यह पुल केवल दो स्थानों को जोड़ने का माध्यम ही नहीं, बल्कि नई तकनीक, आत्मनिर्भर भारत और तेज गति परिवहन का प्रतीक है।

रेल मंत्रालय ने शनिवार को एक बयान में कहा कि तमिलनाडु के विशाल नीले समंदर पर निर्मित 2.08 किलोमीटर लम्बा ये ब्रिज पुराने पंबन ब्रिज से 3 मीटर अधिक ऊंचा है, ताकि छोटे जहाज आसानी से इसके नीचे से होकर गुजर सकें। इस पूरे ब्रिज को बनाने में 18.3 मीटर के 99 स्पैन का प्रयोग किया गया है। ब्रिज के मध्य में 72.5 मीटर का एक वर्टिकल लिफ्ट स्पैन है, जिसे जरूरत पड़ने पर बड़े जहाजों के लिए 17 मीटर तक ऊपर उठाया जा सकता है।

नए पंबन ब्रिज की अनूठी लिफ्ट प्रणाली बड़े जहाजों को भी आसानी से गुजरने की अनुमति देती है। मन्नार की खाड़ी पर स्थित यह पुल यातायात को सुगम बनाने के साथ अपने आप में एक ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व भी रखता है। आधुनिक तकनीक से निर्मित यह पुल भारतीय रेलवे के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है जिससे आने वाले समय में समुद्री मार्गों पर निर्भर पर्यटन और व्यापार को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा।

इस ब्रिज में 333 पाइल्स और 101 पाइल कैप्स का इस्तेमाल कर मजबूत आधार के साथ दोहरी रेल लाइनों के लिए डिज़ाइन किया गया है। जिसपर भारी-भरकम मालगाड़ियों के साथ वंदेभारत जैसी तेज गति से चलने वाली अत्याधुनिक सेमी हाई-स्पीड ट्रेनें भी बड़ी आसानी से गुजर सकती हैं। साथ ही इसकी सतह को 58 वर्षों तक सुरक्षित रखने के लिए उत्कृष्ट सुरक्षा प्रणाली अपनाई गई है।

इस ब्रिज के निर्माण के दौरान समुद्री तूफानों, तेज हवाओं और ज्वार-भाटा जैसी परिस्थितियों का भी खास ध्यान रखा गया है। पॉलिसिलोक्सेन पेंट, स्टेनलेस स्टील और फाइबर रिइंफोर्स्ड प्लास्टिक (एफआरपी) के प्रयोग ने समुद्र के खारा पानी के बीच होते हुए भी इसे लंबे समय तक मजबूत और टिकाऊ बनाए रखेगा।

भारत का पहला समुद्री पुल पंबन ब्रिज का निर्माण 1911 में शुरू और 1914 में इसे यातायात के लिए खोल दिया गया था। तब यह भारत का एकमात्र समुद्री पुल था जो सन् 2010 में बान्द्रा-वर्ली समुद्रसेतु के खुलने तक भारत का सबसे लम्बा समुद्री सेतु रहा। अपनी सेवा समय के दौरान इस ब्रिज ने कई विकट परिस्थितियां देखी और उनका डटकर सामना किया। 1964 में आए चक्रवाती तूफान ने इस पुल को बहुत नुकसान पहुंचाया था, बावजूद इसके ये समुद्र की लहरों के बीच अडिग खड़ा रहा और लगभग 106 साल तक देशहित में समर्पित रहा।

21वीं सदी और बदलते भारत की परिवहन आवश्यकताओं ने पुराने पंबन ब्रिज के समक्ष कई तरह की नई चुनौतियां रख दी थीं। जिसे देखते हुए आधुनिक ट्रेनों और बड़े समुद्री जहाजों की आवश्यकताओं के अनुरूप एक नई संरचना की जरूरत महसूस की गई। इस जरूरत को पूरा करने के लिए 2019 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में इस नए ब्रिज के निर्माण की आधारशिला रखी गई। नवाचार का जूनून और विकास की अभूतपूर्व गति के कारण मात्र 4 साल में समुद्र पर इस अद्भुत निर्माण को पूरा कर लिया गया।

उल्लेखनीय है कि पंबन ब्रिज का भगवान राम और भगवान शिव के साथ संबंध है। ये ब्रिज जिस द्वीप रामेश्वरम को मुख्य भूमि से जोड़ता है, उसे हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। यहां स्थित रामेश्वरम मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान श्रीराम लंका पर चढ़ाई करने जा रहे थे, तब उन्होंने इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी और यहां भगवान शिव की पूजा-अर्चना की थी।

पंबन ब्रिज से होकर गुजरने वाला मार्ग भगवान राम की लंका यात्रा का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है, जिससे यह धार्मिक रूप से और भी विशेष हो जाता है। रामायण के अनुसार, भगवान राम और उनकी वानर सेना ने लंका जाने के लिए रामसेतु का निर्माण किया था, जो वर्तमान पंबन ब्रिज के पास स्थित है। ऐसे में नया पंबन ब्रिज श्रद्धालुओं के लिए रामेश्वरम की यात्रा को आसान और सुरक्षित बनाएगा। यह पुल आधुनिक तकनीक से निर्मित है, जिससे श्रद्धालु बिना किसी बाधा के भगवान शिव और भगवान राम से जुड़े स्थलों के दर्शन कर सकते हैं।

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