पत्रकार से अभद्रता और सही जवाब
इंदौर का जल संकट:
पुराने साल के विदा होने और नए साल के आगमन के बीच मध्यप्रदेश से एक साथ दो तस्वीरें सामने आईं—एक बेहद चिंताजनक और दूसरी उम्मीद जगाने वाली। चिंताजनक तस्वीर इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र की है, जहां दूषित पानी की आपूर्ति के कारण फैला संक्रमण गंभीर रूप ले चुका है।
मुख्य जल आपूर्ति लाइन में लीकेज के कारण सीवरेज का पानी मिल गया, जिससे सैकड़ों लोग उल्टी-दस्त से पीड़ित हुए। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस हादसे में कम से कम 13 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोग अब भी अस्पतालों में भर्ती हैं।
घटना की पृष्ठभूमि
इंदौर को देश के स्वच्छतम शहरों में गिना जाता है, लेकिन इस घटना ने नगर प्रशासन और सरकार के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में लंबे समय से भाजपा की सरकार है।
इंदौर की सभी नौ विधानसभा सीटें, सांसद, महापौर और शहरी विकास मंत्री—सभी भाजपा से हैं। ऐसे में जब दूषित जल से जनहानि होती है, तो नैतिक जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करने की अपेक्षा स्वाभाविक है।
हालांकि मौजूदा राजनीतिक दौर में इस्तीफे और जिम्मेदारी लेना लगभग अपवाद बनता जा रहा है। सत्ता पक्ष इसे ‘नया भारत’ कहकर सामान्य व्यवहार के रूप में प्रस्तुत करता रहा है।
पत्रकार से सवाल और सत्ता की प्रतिक्रिया
इसी प्रकरण में एनडीटीवी के पत्रकार अनुराग द्वारी ने शहरी विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से दूषित जल संकट को लेकर सवाल किया। सवाल के जवाब में मंत्री की झल्लाहट और आपत्तिजनक भाषा ने एक नई बहस को जन्म दे दिया।
सार्वजनिक मंच पर “फोकट के प्रश्न” और अशोभनीय शब्दों का प्रयोग न केवल एक पत्रकार, बल्कि पूरी पत्रकारिता के सम्मान पर हमला था।
इस पूरे घटनाक्रम में सकारात्मक पक्ष यह रहा कि अनुराग द्वारी ने संयम और मर्यादा में रहते हुए मंत्री की भाषा का प्रतिवाद किया। यह क्षण याद दिलाता है कि सत्ता चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, पत्रकारिता का मूल धर्म सवाल पूछना और जवाबदेही तय करना है।
मीडिया स्वतंत्रता पर बढ़ता दबाव
यह कोई पहला मामला नहीं है। हाल के वर्षों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जहां नेताओं ने पत्रकारों को डांटा, धमकाया या नीचा दिखाने की कोशिश की।
कभी “आपके मालिक से बात करूंगा” तो कभी “हमारी पार्टी की चिंता मत करो” जैसे बयान सत्ता के बढ़ते अहंकार को दर्शाते हैं।
मीडिया घरानों और सत्ता के बीच बढ़ती नजदीकियां भी इसका एक बड़ा कारण मानी जाती हैं। जब संस्थान समझौते करते हैं, तो ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकार सबसे पहले निशाने पर आते हैं।
सरकार की प्रतिक्रिया और मुआवजा
इंदौर जल संकट के बाद राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे की घोषणा की है। शहरी विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने सोशल मीडिया पर खेद प्रकट करते हुए कहा कि मीडिया के एक प्रश्न पर उनके शब्द गलत निकल गए।
उन्होंने यह भी दावा किया कि वे और उनकी टीम लगातार प्रभावित इलाकों में काम कर रही है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल खेद और मुआवजा पर्याप्त है? इससे पहले भी राज्य में कफ सिरप कांड जैसे मामलों में कई जानें गईं, लेकिन कार्रवाई अफसोस और मुआवजे से आगे नहीं बढ़ सकी।
निष्कर्ष
इंदौर का दूषित जल संकट प्रशासनिक विफलता का प्रतीक है, जबकि पत्रकार से अभद्रता लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार।
ऐसे दौर में अनुराग द्वारी जैसे पत्रकारों का संयमित विरोध उम्मीद की किरण पैदा करता है। असली सवाल यही है कि क्या भविष्य में सत्ता पत्रकारों के सवालों का सम्मान करेगी, या फिर अभद्रता और माफीनामे ही नया सामान्य बनते जाएंगे।









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