Thursday, February 19, 2026
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भारत-चीन ने द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने की प्रतिबद्धता जताई: SCO शिखर सम्मेलन, तियांजिन

तियांजिन/नई दिल्ली, (वेब वार्ता)। SCO शिखर सम्मेलन (शंघाई सहयोग संगठन) के दौरान 31 अगस्त 2025 को चीन के तियांजिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक हुई। इस बैठक पर वैश्विक नजरें टिकी थीं, विशेष रूप से अमेरिका इस मुलाकात को गहरी रुचि से देख रहा था। बैठक ने भारत-चीन संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत की है, जिसमें सीमा विवादों को सुलझाने, द्विपक्षीय व्यापार, और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ाने पर जोर दिया गया। इस कद कूटनीतिक कदम को अमेरिका के लिए रणनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है।

बैठक के प्रमुख बिंदु

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शी जिनपिंग के साथ बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने कहा:

“पिछले वर्ष कजान में हमारी सार्थक चर्चा ने हमारे संबंधों को सकारात्मक दिशा दी। सीमा पर सैनिकों की वापसी के बाद शांति और स्थिरता का माहौल बना है। कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू हुई है, और दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें जल्द शुरू होंगी।”

  • सीमा प्रबंधन: दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने की प्रतिबद्धता जताई। 2024 में कजान में हुई पिछली बैठक के बाद सीमा पर तनाव कम हुआ है, और सैनिकों की वापसी से सकारात्मक माहौल बना है।

  • लोगों के बीच संपर्क: कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली और सीधी उड़ानों की शुरुआत जैसे कदमों से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और व्यावसायिक संबंध मजबूत होंगे।

  • आर्थिक सहयोग: पीएम मोदी ने कहा कि भारत और चीन के सहयोग से 2.8 अरब लोगों के हित जुड़े हैं, जो वैश्विक कल्याण के लिए महत्वपूर्ण है। दोनों देश परस्पर विश्वास, सम्मान, और संवेदनशीलता के आधार पर संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

मोदी ने चीन की एससीओ अध्यक्षता की सराहना की और 2026 में भारत में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग को आमंत्रित किया। शी ने इस निमंत्रण का स्वागत करते हुए भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता को समर्थन देने का वादा किया।

अमेरिका के लिए रणनीतिक झटका

अमेरिका ने भारत को क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान, और ऑस्ट्रेलिया) के माध्यम से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार के रूप में देखा था। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 50% टैरिफ (25% सामान्य और 25% रूस से तेल आयात के लिए) लगाने के बाद भारत ने कूटनीतिक जवाब देना शुरू किया।

  • ट्रेड वॉर का प्रभाव: अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ युद्ध ने वैश्विक व्यापार को प्रभावित किया है। भारत ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए चीन के साथ संबंधों को बेहतर करने की दिशा में कदम बढ़ाया।

  • रणनीतिक स्वायत्तता: भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए अमेरिका के दबाव के सामने झुकने से इनकार किया। चीन के साथ संबंधों में सुधार भारत की इस नीति का हिस्सा है, जो अमेरिका की ताइवान नीति और क्षेत्रीय प्रभाव को चुनौती दे सकता है।

“भारत और चीन के बीच कूटनीतिक दोस्ती से एशिया में अमेरिका की रणनीतिक पकड़ कमजोर हो सकती है।” – विश्लेषक

भारत और चीन की नजदीकी के कारण

भारत और चीन के बीच संबंधों में सुधार के पीछे कई कारण हैं:

  1. आर्थिक सहयोग: दोनों देश ग्लोबल साउथ के प्रमुख देश हैं और मल्टीलेटरल ट्रेडिंग ऑर्डर को समर्थन देने के लिए एकजुट हैं।

  2. सीमा पर शांति: 2024 में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर हुए समझौते ने तनाव को कम किया, जिससे द्विपक्षीय संबंधों में सुधार की राह खुली।

  3. वैश्विक चुनौतियां: जलवायु परिवर्तन, डिजिटल गवर्नेंस, और ग्लोबल साउथ के हितों जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच समान दृष्टिकोण है।

शी जिनपिंग ने कहा:

“भारत और चीन को एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि विकास साझेदार के रूप में देखना चाहिए। ‘ड्रैगन और हाथी का नृत्य’ दोनों देशों के लिए सही विकल्प है।”

भविष्य की राह

भारत और चीन ने मल्टीलेटरल मंचों जैसे एससीओ और ब्रिक्स में सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया है। दोनों देशों ने सीमा विवाद को समग्र संबंधों को परिभाषित करने से रोकने और आर्थिक सहयोग को प्राथमिकता देने पर सहमति जताई है।

“स्थिर और मैत्रीपूर्ण भारत-चीन संबंध आर्थिक विकास, सुधारित मल्टीलेटरलिज्म, और मल्टीपोलर विश्व के लिए महत्वपूर्ण हैं।” – विदेश मंत्रालय, भारत

इस बैठक ने न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा दी है, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति में भारत की स्थिति को और मजबूत किया है।

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