पटाखों से कितने अलग होते हैं ग्रीन पटाखे? जानें कैसे होते हैं तैयार, सेफ कैसे?


नई दिल्ली, 15 अक्टूबर (वेब वार्ता)। दीपावली के दौरान पटाखों के ज्यादा इस्तेमाल से पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ता है. तेज आवाज वाले पटाखे न सिर्फ प्रदूषण फैलाते हैं, बल्कि दिल के मरीजों और पक्षियों के लिए भी खतरनाक साबित हो सकते हैं. इसीलिए कई राज्य सरकारें पटाखों पर सख्त पाबंदियां लगाती हैं. दिल्ली सरकार ने इस बार ग्रीन पटाखे जलाने की मंजूरी दे दी है.

पटाखों में सल्फर, ऑक्सीडाइजर, स्टेबलाइजर, रिड्यूसिंग एजेंट और कई तरह के रंग मिलाए जाते हैं. इनमें एंटीमोनी सल्फाइड, बेरियम नाइट्रेट, लिथियम, तांबा, एल्यूमिनियम और स्ट्रांशियम जैसे रसायन शामिल होते हैं, जो जलने पर जहरीली गैसें छोड़ते हैं. इन गैसों के कारण हवा की गुणवत्ता (Air Quality Index) तेजी से गिरती है और दीपावली के दिनों में आसमान काला पड़ जाता है. खासकर ठंड के मौसम में जब कोहरा भी होता है तो प्रदूषण और ज्यादा बढ़ जाता है.

ग्रीन पटाखे पर्यावरण के लिए सुरक्षित

ग्रीन पटाखों को पर्यावरण के लिए सुरक्षित और इको-फ्रेंडली माना जाता है. इन पटाखों के निर्माण में वे हानिकारक रसायन शामिल नहीं किए जाते जो सामान्य पटाखों में होते हैं, जैसे एल्युमिनियम, बैरियम, पोटेशियम नाइट्रेट और कार्बन. इनकी जगह कम हानिकारक तत्वों का उपयोग किया जाता है जिससे प्रदूषण काफी हद तक कम होता है. ग्रीन पटाखे आकार में छोटे और आवाज में हल्के होते हैं, इसलिए ये ध्वनि प्रदूषण भी नहीं फैलाते. हालांकि, ये सामान्य पटाखों की तुलना में थोड़े महंगे जरूर होते हैं, लेकिन पर्यावरण की दृष्टि से ये एक बेहतर और जिम्मेदार विकल्प माने जाते हैं.

 

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