इस्लामाबाद/वॉशिंगटन, अंतरराष्ट्रीय डेस्क | वेब वार्ता
स्विट्जरलैंड के डावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई अंतरराष्ट्रीय पहल ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) पर हस्ताक्षर करके पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भारी राजनीतिक विवाद में घिर गए हैं। पाकिस्तान लौटने के बाद इस कदम को विपक्षी दलों ने “गैर-पारदर्शी, जल्दबाजी में लिया गया और नैतिक रूप से अस्वीकार्य” बताया है।
गाजा संघर्ष के लिए ट्रंप की नई पहल
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा पट्टी में चल रहे युद्ध को समाप्त करने के लिए अपने 20 सूत्रीय शांति प्रस्ताव के दूसरे चरण के रूप में “बोर्ड ऑफ पीस” का गठन किया है। यह बोर्ड न केवल गाजा बल्कि भविष्य में वैश्विक संघर्षों के समाधान में भी भूमिका निभाएगा। इसका दायरा पुनर्निर्माण, निवेश आकर्षित करने और शासन सुधार जैसे मुद्दों तक फैला हुआ है। कई विशेषज्ञ इसे संयुक्त राष्ट्र के समानांतर एक नया अंतरराष्ट्रीय तंत्र मान रहे हैं।
डावोस में ट्रंप संग मंच साझा करने के बाद बवाल
डावोस में शहबाज शरीफ द्वारा ट्रंप के साथ “बोर्ड ऑफ पीस चार्टर” पर हस्ताक्षर करना पाकिस्तान में राजनीतिक विस्फोट का कारण बन गया। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने इस कदम को “राष्ट्रीय हितों के खिलाफ” बताया। पार्टी ने कहा कि ऐसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौते बिना संसदीय बहस और विपक्ष से परामर्श के नहीं किए जा सकते।
पीटीआई नेताओं ने अपने बयान में कहा कि “शांति का कोई भी नया मंच संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए, न कि उसके समानांतर नई संरचना खड़ी करनी चाहिए।” पार्टी ने मांग की कि जब तक संसद में राष्ट्रीय परामर्श और जनमत संग्रह नहीं होता, तब तक पाकिस्तान को इस पहल से वापस हट जाना चाहिए।
सीनेट में भी गूंजा विरोध
विपक्षी दलों का विरोध यहीं नहीं रुका। मजलिस वहदत-ए-मुस्लिमीन (MWM) के प्रमुख और सीनेट में विपक्ष के नेता अल्लामा राजा नासिर अब्बास ने भी सरकार के इस फैसले को “नैतिक रूप से अस्वीकार्य” करार दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने “फिलिस्तीनी जनता की वास्तविक इच्छा” के खिलाफ जाकर यह कदम उठाया है। साथ ही उन्होंने ट्रंप द्वारा दिए गए विवादास्पद बयान — “हमास को हथियार डालने होंगे, नहीं तो उसे समाप्त कर दिया जाएगा” — को भी इस्लामी देशों के अपमान के रूप में देखा।
‘बोर्ड ऑफ पीस’ पर उठे सवाल
खुद “बोर्ड ऑफ पीस” की वैधता और पारदर्शिता पर भी कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने सवाल उठाए हैं। ट्रंप प्रशासन ने भारत और चीन समेत करीब 60 देशों को इसमें शामिल होने का निमंत्रण दिया था, लेकिन डावोस में आयोजित उद्घाटन समारोह में 20 से भी कम देश मौजूद थे। सूत्रों के अनुसार, इस बोर्ड की स्थायी सदस्यता के लिए एक अरब डॉलर की फीस रखी गई है, जिससे इसे “धनवान राष्ट्रों का मंच” कहा जा रहा है।
कौन-कौन देश हुए शामिल?
अब तक इस पहल को स्वीकार करने वाले देशों में अर्जेंटीना, अल्बानिया, आर्मेनिया, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस, बुल्गारिया, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कजाखस्तान, कोसोवो, मोरक्को, मंगोलिया, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्किये, संयुक्त अरब अमीरात, उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं। वहीं भारत, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे प्रमुख देशों ने इससे दूरी बनाए रखी है।
पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ीं
शहबाज शरीफ के इस कदम से पाकिस्तान में सरकार और सेना पर विदेशी दबाव में झुकने के आरोप लग रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि ट्रंप को खुश करने की कोशिश में पाकिस्तान ने अपनी कूटनीतिक स्वतंत्रता दांव पर लगा दी है। विश्लेषकों के मुताबिक, यह कदम पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक और घरेलू दोनों मोर्चों पर नुकसानदेह साबित हो सकता है।
- शहबाज शरीफ ने ट्रंप के “बोर्ड ऑफ पीस” चार्टर पर हस्ताक्षर किए।
- विपक्ष ने इसे बिना परामर्श का “नैतिक रूप से गलत” कदम बताया।
- PTI ने जनमत संग्रह और संसद में बहस की मांग की।
- ट्रंप के विवादास्पद बयानों ने स्थिति को और बिगाड़ा।
पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में “बोर्ड ऑफ पीस” अब एक कूटनीतिक गलती के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पाकिस्तान न तो अमेरिका का भरोसा जीत पाएगा और न ही अरब देशों का समर्थन बरकरार रख सकेगा।
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