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युवाओं और बेरोजगारों में बढ़ती आत्महत्या : विकास के दावों के बीच गहराता मानसिक और आर्थिक संकट

-कांतिलाल मांडोत- Kantilal Mandot

देश लगातार विकास, डिजिटल क्रांति और आर्थिक प्रगति की नई ऊंचाइयों की बात कर रहा है, लेकिन इसी चमक के पीछे एक ऐसा दर्दनाक सच भी छिपा है जो समाज और सरकार दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट ने इस सच्चाई को सामने ला दिया है कि देश में कुल आत्महत्या के मामलों में भले मामूली गिरावट आई हो, लेकिन छात्रों और बेरोजगार युवाओं के बीच आत्महत्या की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। यह केवल आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि यह उस टूटते विश्वास, बढ़ते तनाव और असुरक्षित भविष्य की कहानी है जिससे देश का युवा वर्ग गुजर रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में देश में कुल 1,70,746 आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में थोड़ा कम हैं। लेकिन छात्रों की आत्महत्या का प्रतिशत 8.1 प्रतिशत से बढ़कर 8.5 प्रतिशत हो गया। संख्या के रूप में देखें तो 2023 में 13,892 छात्रों ने आत्महत्या की थी, जबकि 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 14,488 पहुंच गया। इसी तरह बेरोजगारों में आत्महत्या की दर भी बढ़ी है। वर्ष 2023 में जहां 14,234 बेरोजगारों ने आत्महत्या की थी, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 14,778 हो गई। यह स्थिति बताती है कि देश का युवा मानसिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर कठिन दौर से गुजर रहा है।
आज का छात्र सिर्फ पढ़ाई नहीं कर रहा, बल्कि वह लगातार प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाओं और असफलता के डर से भी लड़ रहा है। स्कूलों और कॉलेजों में अंक और रैंक को सफलता का पैमाना बना दिया गया है। माता-पिता, समाज और शिक्षा व्यवस्था की अपेक्षाएं इतनी बढ़ चुकी हैं कि कई छात्र खुद को लगातार दबाव में महसूस करते हैं। मेडिकल, इंजीनियरिंग और सरकारी नौकरी जैसी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों युवा दिन-रात संघर्ष करते हैं, लेकिन सीमित सीटों और बढ़ती प्रतियोगिता के कारण बहुत बड़ी संख्या में उन्हें असफलता का सामना करना पड़ता है। यह असफलता धीरे-धीरे मानसिक तनाव, अवसाद और निराशा में बदल जाती है।
कोटा, दिल्ली, पटना, हैदराबाद और देश के कई शिक्षा केंद्रों से लगातार छात्रों की आत्महत्या की खबरें सामने आती रही हैं। यह केवल व्यक्तिगत कमजोरी का मामला नहीं है, बल्कि यह उस शिक्षा व्यवस्था की विफलता है जिसने शिक्षा को सीखने की प्रक्रिया के बजाय एक अंतहीन दौड़ बना दिया है। विद्यार्थियों के पास मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने का माहौल नहीं है। अधिकतर संस्थानों में काउंसलिंग व्यवस्था केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। कई छात्र अकेलेपन, डर और असफलता के बोझ को भीतर ही भीतर झेलते रहते हैं।
बेरोजगारी की समस्या भी युवाओं को गहरे संकट में धकेल रही है। पढ़ाई पूरी करने के बाद जब युवाओं को रोजगार नहीं मिलता, तब उनके भीतर भविष्य को लेकर असुरक्षा बढ़ने लगती है। लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, पेपर लीक, सीमित अवसर और बढ़ती उम्र उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बना देती है। कई युवाओं को परिवार और समाज की उम्मीदों का दबाव भी झेलना पड़ता है। आर्थिक तंगी और लगातार असफलता का अनुभव उन्हें निराशा की ओर ले जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और अधिक गंभीर है। खेती-किसानी पर निर्भर परिवारों के युवाओं के सामने रोजगार के सीमित अवसर हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट में कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों की आत्महत्या का आंकड़ा भी चिंताजनक है। वर्ष 2024 में 10,546 लोगों ने कृषि क्षेत्र में आत्महत्या की, जिनमें 4,633 किसान और 5,913 खेतिहर मजदूर शामिल हैं। यह बताता है कि आर्थिक अस्थिरता केवल शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों में भी गहरा संकट मौजूद है। खेती की बढ़ती लागत, कर्ज, प्राकृतिक आपदाएं और कम आय किसानों और मजदूरों को लगातार परेशान कर रही हैं।
समाज में तेजी से बढ़ता अकेलापन भी इस समस्या का एक बड़ा कारण बन रहा है। आधुनिक जीवनशैली में परिवारों के बीच संवाद कम हुआ है। मोबाइल और सोशल मीडिया के दौर में लोग एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। कई युवा अपनी परेशानियां किसी से साझा नहीं कर पाते। उन्हें डर रहता है कि लोग उनका मजाक उड़ाएंगे या उन्हें कमजोर समझेंगे। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आज भी समाज में जागरूकता की कमी है। अवसाद, चिंता और तनाव जैसी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
महिलाओं की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध के 2,84,530 मामले दर्ज किए गए। महिलाओं के खिलाफ अपराधों में सबसे अधिक मामले पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के हैं। घरेलू हिंसा, आर्थिक निर्भरता और सामाजिक दबाव महिलाओं को मानसिक रूप से तोड़ते हैं। कई महिलाएं अपने संघर्षों को चुपचाप सहती रहती हैं, जिससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है।
इस समस्या का समाधान केवल संवेदना व्यक्त करने से नहीं होगा। केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो युवाओं को मानसिक और आर्थिक सुरक्षा दे सकें। सबसे पहले शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। परीक्षा आधारित दबाव को कम करना होगा और विद्यार्थियों के लिए काउंसलिंग तथा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना होगा। स्कूलों और कॉलेजों में ऐसे वातावरण का निर्माण जरूरी है जहां छात्र बिना डर अपनी समस्याएं साझा कर सकें।
रोजगार के क्षेत्र में भी सरकारों को गंभीरता से काम करना होगा। युवाओं के लिए नए रोजगार अवसर पैदा करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। भर्ती प्रक्रियाओं को पारदर्शी और समयबद्ध बनाना होगा ताकि युवाओं का विश्वास बना रहे। स्वरोजगार और कौशल विकास योजनाओं को केवल घोषणाओं तक सीमित रखने के बजाय जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे उद्योगों और कृषि आधारित रोजगार को बढ़ावा देना भी जरूरी है।
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाना भी आवश्यक है। जिला स्तर पर काउंसलिंग केंद्र, हेल्पलाइन और मनोवैज्ञानिक सहायता सेवाएं उपलब्ध करानी चाहिए। स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर नियमित मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। परिवारों को भी अपने बच्चों और युवाओं के साथ संवाद बढ़ाना होगा। केवल सफलता की उम्मीद करने के बजाय उनकी भावनाओं और संघर्षों को समझना जरूरी है।
समाज को यह समझना होगा कि असफलता जीवन का अंत नहीं है। हर व्यक्ति की क्षमता और परिस्थिति अलग होती है। बच्चों और युवाओं पर अत्यधिक अपेक्षाओं का बोझ डालना उन्हें भीतर से कमजोर बना सकता है। जरूरत इस बात की है कि हम एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहां मानसिक स्वास्थ्य को उतनी ही गंभीरता से लिया जाए जितनी शारीरिक स्वास्थ्य को दी जाती है।
एनसीआरबी की यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यदि समय रहते सरकार, समाज और परिवार इस दिशा में गंभीर कदम नहीं उठाते, तो देश का युवा वर्ग निराशा और असुरक्षा के अंधेरे में और गहराई तक डूबता चला जाएगा। विकास तभी सार्थक होगा जब देश का युवा सुरक्षित, आत्मविश्वासी और आशावान महसूस करेगा। युवाओं को केवल सपने दिखाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन्हें जीने और आगे बढ़ने के लिए मजबूत आधार भी देना होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं स्तम्भकार है)

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