-

दक्षिण से पूर्व तक बदलता राजनीतिक भूगोल: 2026 के नतीजों से नए युग की शुरुआत?

-कांतिलाल मांडोत-

भारत के 2026 के विधानसभा चुनावों के ताजा परिणामो ने देश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ लाने के संकेत दे दिए हैं। तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे अहम राज्यों में जो तस्वीर उभर रही,वह पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती देती दिख रही है। इन चुनावों में न केवल सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं बनी, बल्कि नए चेहरों और नए गठबंधनों ने राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह बदल दिया है।
तमिलनाडु में इस बार का चुनाव सबसे ज्यादा दिलचस्प बन गया है। यहां द्रविड़ राजनीति का दशकों पुराना ढांचा पहली बार गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम डीएमके जहां सत्ता बचाने की कोशिश में थी, वहीं अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम ने राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। शुरुआती दौर में टीवीके का सबसे आगे होना और पार्टी पूर्ण बहुमत को हासिल कर चुकी यह दिखाता है कि जनता अब पारंपरिक दलों के विकल्प तलाश रही है।
तमिलनाडु की 234 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 117-118 है।अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम और डीएमके दोनों ही स्पष्ट बहुमत से दूर दिखे। ऐसे में विजय का “किंगमेकर” के रूप में उभरना स्वाभाविक है। उनकी लोकप्रियता, खासकर युवाओं में, और साफ-सुथरी छवि उन्हें एक निर्णायक भूमिका में ला खड़ा करती है।
इस पूरे घटनाक्रम में नरेंद्र मोदी के साथ विजय की पुरानी तस्वीर ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी है। यह तस्वीर भले ही पुरानी हो, लेकिन इसके समय पर सामने आने से यह अटकलें तेज हो गई हैं कि क्या भारतीय जनता पार्टी और टीवीके के बीच चुनाव बाद गठबंधन संभव है। यदि ऐसा होता है और एएएडी भी इसमें शामिल होती है, तो तमिलनाडु में पहली बार एक नया राजनीतिक समीकरण बन सकता है, जो द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक ढांचे को तोड़ देगा।
दूसरी ओर केरल में जो तस्वीर सामने आ रही है, वह पूरी तरह अलग लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण है। यहां पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा को बड़ा झटका लगता दिख रहा है। शुरुआती रुझानों में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा स्पष्ट बढ़त के साथ सत्ता में वापसी करता नजर आया।कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ अगर बहुमत हासिल करता है, तो यह केरल की राजनीति में बड़ा बदलाव होगा, क्योंकि राज्य में आमतौर पर सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड तो रहा है, लेकिन इस बार मुकाबला बेहद करीबी माना जा रहा था।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि खुद पिनाराई विजयन अपनी सीट पर पीछे चलने से उयह केवल एक सीट की हार नहीं, बल्कि उनके शासन मॉडल पर सवाल के रूप में भी देखा जा रहा है। उनके कार्यकाल में कल्याणकारी योजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर जोर दिया गया, लेकिन लगता है कि विपक्ष ने सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने में सफलता पाई है।
केरल में भारतीय जनता पार्टी का खाता खुलना भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है। भले ही सीटें कम हों, लेकिन यह पार्टी के लिए दक्षिण भारत में धीरे-धीरे बढ़ती स्वीकार्यता का संकेत देता है। राजीव चंद्रशेखर जैसे नेताओं का आगे रहना यह दर्शाता है कि भाजपा अब केवल उत्तर और पश्चिम भारत तक सीमित नहीं रहना चाहती।
अगर पश्चिम बंगाल की बात करें, तो यहां तस्वीर और भी नाटकीय है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को इस बार कड़ी चुनौती मिल गई है। शुरुआती रुझानों में भाजपा भारी बढ़त बनाती दिखाई दी।॥यह रुझान नतीजों में बदलता है, तो यह राज्य की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा।
पश्चिम बंगाल में भाजपा की बढ़त को केवल चुनावी जीत के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का संकेत भी है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य में कानून-व्यवस्था, राजनीतिक हिंसा और ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने इन मुद्दों को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ा और लगता है कि मतदाताओं ने इस पर प्रतिक्रिया दी है।
हालांकि ममता बनर्जी अब भी अपनी सीट पर बढ़त बनाए हुए हैं और उन्होंने अंतिम परिणाम तक इंतजार करने की बात कही है, लेकिन राज्य के समग्र रुझान उनके लिए चिंता का विषय जरूर हैं।
इन तीनों राज्यों के रुझानों को एक साथ देखें तो एक बड़ा राष्ट्रीय राजनीतिक संदेश उभरकर सामने आता है। पहला, क्षेत्रीय दलों की पकड़ कमजोर हो रही है या उन्हें नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरा, नए चेहरे और नए दल तेजी से उभर रहे हैं, जैसे तमिलनाडु में विजय की टीवीकेतीसरा, भाजपा का विस्तार अब उन राज्यों तक पहुंच रहा है जहां वह पहले कमजोर मानी जाती थी।
इन चुनावों में “मोदी फैक्टर” की भी चर्चा हो रही है। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि का असर कई राज्यों में देखने को मिल रहा है। खासकर पश्चिम बंगाल और संभावित रूप से तमिलनाडु में यह असर निर्णायक साबित हो सकता है।
लेकिन यह भी सच है कि हर राज्य की अपनी अलग राजनीतिक संस्कृति और मुद्दे होते हैं। तमिलनाडु में द्रविड़ पहचान, केरल में वैचारिक राजनीति और बंगाल में क्षेत्रीय अस्मिता हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में किसी एक राष्ट्रीय ट्रेंड को पूरे देश पर लागू करना जल्दबाजी होगी।
फिर भी, 2026 के ये चुनाव यह जरूर संकेत दे रहे हैं कि भारतीय राजनीति एक संक्रमण काल से गुजर रही है। पुराने समीकरण टूट रहे हैं, नए गठबंधन बन रहे हैं और मतदाता पहले से ज्यादा जागरूक और निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।
तमिलनाडु में अगर टीवीके “किंगमेकर” बनती है, केरल में यूडीएफ सत्ता में लौटता है और पश्चिम बंगाल में भाजपा ऐतिहासिक जीत दर्ज करती है, तो यह केवल राज्यों के स्तर पर बदलाव नहीं होगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी बदल सकता है।
आने वाले दिनों में अंतिम नतीजे इन रुझानों को कितनी मजबूती देते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन इतना तय है कि 2026 के चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र को एक नई ऊर्जा, नई बहस और नए विकल्प दिए हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार-स्तम्भकार है)

LATEST POSTS

“आई हैवन्ट डाइड येट!” लंदन की संसद के सामने गांधी की वह मूर्ति, जो इतिहास से सवाल करती है

गांधी की मूर्ति लंदन की Parliament Square में गांधी की मूर्ति Churchill की प्रतिमा के पास खड़ी है। यह सिर्फ एक स्मारक नहीं, बल्कि गांधी और ब्रिटिश साम्राज्य के बीच ऐतिहासिक संघर्ष और उनकी वैश्विक विरासत की कहानी भी है।

गांधी का पता…

गांधी का पता सिर्फ मकानों और शहरों की कहानी नहीं है। पोरबंदर से राजकोट, लंदन, दक्षिण अफ्रीका, साबरमती, सेवाग्राम और बिड़ला हाउस तक गांधी की ऐतिहासिक यात्रा जानिए।

क्या ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो सकती है?

-संजय कुमार शर्मा- चुनाव आयोग को लेकर देश में उठ रहा विवाद अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश...