Saturday, March 2, 2024
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भारत रत्न सम्मान के साथ-साथ सियासी दाँव?

-प्रभुनाथ शुक्ल-

भारत रत्न देश का सर्वोच्च सम्मान है। विशिष्ट क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान और राष्ट्रसेवा के लिए कार्य करने के लिए जाता है। यह साहित्य, कला, विज्ञान और सार्वजनिक क्षेत्र के लिए दिया जाता है। साल 2024 के लिए पांच लोगों को भारत रत्न देने की घोषणा की गई है। जिसमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर, उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव, पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, क़ृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन शामिल हैं। भारत रत्न की शुरुआत देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद तरफ की से गई। देश का पहला भारत रत्न शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को दिया गया। अब तक 53 महान व्यक्तियों को इस सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें हाल में घोषित विभूतियां भी हैं। सभी राजनीति दलों ने भारत रत्न दिए जाने का स्वागत किया है। लेकिन लोकसभा चुनाव को देखते हुए यह राजनीति का विषय भी बन गया है।

भारत रत्न को लेकर सवाल और राजनीति भी होती रहीं है। देश का सर्वोच्च सम्मान भी राजनीति से अछूता नहीं है। सत्ता में रहे राजनितिक दल अपने सियासत साधने के लिए ऐसा करते रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों उसी राह पर हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अगड़े-पिछड़े और किसानों को साधने के लिए भारत रत्न का मास्टर स्ट्रोक डाला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से जिन लोगों को भारत रत्न देने की घोषणा की गई है सभी लोगों ने अपने-अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। लेकिन लोकसभा चुनाव के करीब होने के कारण ऐसे पुरस्कारों की घोषणा पर सवाल उठना लाजिमी है। इन पुरस्कारों के जरिए उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम को साधने की राजनीति है। निश्चित रूप से भारत रत्न देश सेवा में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तित्व को मिलना चाहिए। लेकिन भारत रत्न को लेकर राजनीति भी नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस की सरकार में भी यहीं राजनीति हुईं थीं। क्योंकि कभी-कभी राजनीति को साधने के लिए भी ऐसे पुरस्कार दिए जाते हैं।

लोकसभा चुनाव को लेकर जल्द ही आचार संहिता की घोषणा होने वाली है। सवाल उठाना भी लाजमी है कि जब लोकसभा के आम चुनाव नजदीक हैं फिर भारत रत्न देने की क्या आवश्यकता थी। लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद भारत रत्न दिया जाता तो क्या बुरा हो जाता। हालांकि जिन हस्तियों को भारत रत्न देने की घोषणा की गई है वे निश्चित रूप से देश के लिए सम्माननीय हैं और अपने-अपने क्षेत्र में विशिष्ट कार्य किया है। मोदी सरकार ने अगर उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा की है तो हम भी उस निर्णय की तारीफ करते हैं। लेकिन जब चुनाव नजदीक हों और सर्वोच्च सम्मान को राजनीति के दायरे में खींचा जाए उस हालत में इतने बड़े विशिष्ट सम्मान की गरिमा का भी ख्याल रखना चाहिए।

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को देश की आर्थिक स्थिति संभालने और उदारीकरण के लिए यह सम्मान दिया जाएगा। निश्चित रूप से उन्होंने देश की आर्थिक स्थिति को संभालने में अहम भूमिका निभाई। राव दक्षिण भारत के एक ब्राह्मण परिवार से आते हैं। नरसिम्हा राव को भारत रत्न देने के पीछे एक सोची समझी रणनीति हो सकती है। क्योंकि दक्षिण भारत में भाजपा की स्थिति इतनी मजबूत नहीं है। नरसिम्हा राव को भारत रत्न देकर भाजपा एक मजबूत संदेश देना चाहती है। जहां आंध्रप्रदेश, तेलंगाना के साथ वह दक्षिण के ब्राह्मणों को साधना चाहती है। भाजपा कांग्रेस को कटघरे में भी खड़ा करना चाहती है। वह कांग्रेस से सवाल पूछना चाहेगी कि अब तक नरसिम्हा राव के योगदान के लिए भारत रत्न क्यों नहीं दिया गया। अब यह एक ऐसा मसाला है जिस पर कांग्रेस खुल कर बोल भी नहीं सकती है। इस लिए इस निर्णय का सकारात्मक संदेश जाएगा। क़ृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन भी दक्षिण से रहे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को भारत रत्न का सम्मान दिया है तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी यह सम्मान क्यों नहीं दिया जा सकता है। मनमोहन सिंह हाल ही में राज्यसभा से अपना कार्यकाल पूरा किया है। पीएम मोदी ने उनकी प्रशंसा भी किया। जबकी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, नरसिम्हा राव से बेहतर आर्थिक सुधारों पर काम किया है। मनमोहन सिंह के 10 वर्षों के कार्यकाल में भारत ने वैश्विक स्तर पर अपनी अर्थव्यवस्था को बेहतर किया। शिक्षा का अधिकार, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा गारंटी, भूमि अधिग्रहण और मनरेगा के तहत 100 दिन रोजगार की गारंटी जैसी योजनाएं मील का पत्थर साबित हुई।

राजनीति के गलियारे में राव को भाजपा का करीबी माना जाता रहा। यह दीगर बात है की वह अंतिम सांस तक कांग्रेस में रहे। लेकिन 1992 में जब बाबरी ढाँचा गिराया गया उस समय राव देश के प्रधानमंत्री रहे लेकिन विवादित ढाँचे की सुरक्षा करने में नाकाम रहे। उस समय उत्तर प्रदेश में कल्याण की सरकार रहीं उन्होंने सुप्रीमकोर्ट में ढाचे की सुरक्षा के लिए शपथ पत्र दिया था लेकिन उन्होंने भी कुछ नहीं किया। राव इसी गलती की वजह से गांधी परिवार की निगाह में अविश्वसनीय हो गए और इस घटना के बाद हमेशा हासिए पर रहे। कांग्रेस को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ा और मुसलमानों से वह दूर होती गयी।

उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले किसान नेता और पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने की घोषणा के पीछे भी राजनीतिक दिखती है। दिल्ली की सत्ता के लिहाज से उत्तर प्रदेश विशेष अहमियत रखता है। विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश जाट बाहुल्य है। जाटलैंड में चौधरी चरण सिंह के पोते जयंत चौधरी का खासा दबदबा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के कुछ हिस्सों में जाट समुदाय का अपना प्रभाव। चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देकर जाट समुदाय को खुश करने की कोशिश भी हो सकती है। हम यह नहीं कहते हैं कि चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न नहीं मिलना चाहिए। निश्चित रूप से उन्होंने किसानों के लिए बड़ा कार्य किया और किसान नेता के रूप में पहचान बनायीं। जयंत चौधरी ने भारत रत्न दिए जाने की घोषणा का भी स्वागत किया है। अखिलेश यादव ने भी स्वागत किया है। क्योंकि यह एक ऐसा मसला है जिस पर कोई खुलकर नहीं बोल सकता।

चौधरी को भारत रत्न देकर भाजपा ने जाटलैंड और किसानों में अपनी राजनीति फिट कर लिया है। अब जयंत चौधरी उत्तर प्रदेश में आखिलेश यादव और इण्डिया गठबंधन का साथ छोड़ एनडीए का हिस्सा होंगे। बिहार में भी ऐसा कुछ देखा गया। जैसे ही पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत देने की घोषणा हुई। दलित और पिछड़े की आड़ में बिहार की राजनीति बदल गई। नीतीश कुमार आरजेडी का साथ छोड़ भाजपा के साथ मिलकर नई सरकार बना लिया। फिर जयंत चौधरी भी इसी कदम पर तो आगे नहीं बढ़ रहे? पूर्व प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न देने में विलंब किया गया। आज भाजपा जिस स्थान पर है वह लालकृष्ण आडवाणी और दूसरे भाजपा नेताओं की वजह से है। राममंदिर आंदोलन को तेज गति देने के लिए लालकृष्ण आडवाणी ने ही रथ यात्रा निकाली थी। लेकिन प्रधानमंत्री वह नहीं बन पाए। अयोध्या श्रीराम की प्राण प्रतिष्ठा में आमंत्रण को लेकर भी तमाम सियासी उठा पटक हुई। निश्चित रूप से आडवानी इस सम्मान के हकदार हैं।

कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन को भारत रत्न देना गौरव की बात है। स्वामीनाथन ने कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। हरित क्रांति के लिए उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। हालांकि किसान नेता राकेश टिकैत ने भी स्वामीनाथन को भारत रत्न देने पर ख़ुशी जाहिर की है लेकिन स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट न लागू करने पर केंद्र सरकार पर सवाल भी उठाया है। उन्होंने अपने बयान में कहा है कि स्वामीनाथन को भारत रत्न देने के साथ-साथ अगर आयोग की रिपोर्ट को शत प्रतिशत लागू कर दिया जाता तो किसानों के हित के लिए बड़ी बात होती। वैसे भारत के इन प्रधानमंत्रियों को भी भारत रत्न से सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और मोरारजी देसाई के साथ गुलजारीलाल नंदा भी शामिल हैं। ऐसी स्थिति में भारत रत्न सम्मान को लेकर सवाल उठते रहे हैं और इस पर राजनीति होती रही है। लेकिन हमें इस विशिष्ट सम्मान को लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से इस सम्मान की गरिमा को चोट पहुँचती है।

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