-सुरेश सिंह बैस शाश्वत-
भारतीय त्योहार होली: भारत की सांस्कृतिक विरासत में यदि कोई ऐसा पर्व है जो समूचे समाज को रंग, उमंग और अनंत उल्लास से सराबोर कर देता है, तो वह है होली रंग रंगीली मस्ती और पारंपरिक त्योहार। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह उत्सव केवल रंग खेलने का दिन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, आध्यात्मिक संदेश, कृषि-चक्र की पूर्णता और लोकजीवन की मस्ती का विराट उत्सव है।
होली भारतीय जीवन-दर्शन की उस सहजता का प्रतीक है, जहाँ जीवन के सारे भेदभाव रंगों में घुलकर एकाकार हो जाते हैं। होली का मूल आधार होली के साथ जुड़ी प्रह्लाद- होलिका कथा है। असुर राज हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को ईश्वर-भक्ति से रोकने के लिए अनेक यातनाएँ दीं। अंततः बहन होलिका को अग्नि में बैठाकर उसे जलाने का प्रयास किया गया, किंतु दैवी कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका भस्म हो गई। यह प्रसंग अधर्म पर धर्म की विजय तथा अहंकार पर भक्ति की जीत का शाश्वत संदेश देता है।
राधा-कृष्ण और ब्रज की रसपूर्ण होली
होली का एक अत्यंत रसमय स्वरूप श्रीकृष्ण और राधा रानी से भी जुड़ा है। वृंदावन और बरसाना की लट्ठमार होली विश्वप्रसिद्ध है। यहाँ की फाग, रसिया और रंगोत्सव में प्रेम, चंचलता और भक्ति का अनोखा संगम दिखाई देता है। ब्रज की फाग में गूंजते रहते हैं गीत, जैसे –
“आज बिरज में होली रे रसिया…” और
बरसाने बंसी बाजे, “रंग डालूँ?”
श्याम पुकारे, राधा हँसि कहे
“आओ कान्हा, आज न कोई हारे।”
छनन-छनन पायल बोले,
छन-छन रंग की धारा,
गुलाबी गालों पर लिख दे
प्रेम का मधुर इशारा।
ठुमुक-ठुमुक कुंजों में रास रचे रसधारा,
होली में राधा-श्याम हँसे- झूमे
बस झूम झूम उठे जग सारा।।
यह गीत सदियों से लोक-हृदय को आंदोलित करते रहे हैं।
होलिका दहन और ग्रामीण परंपराएँ
पूर्णिमा की रात्रि में होलिका दहन किया जाता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक शुद्धि और नकारात्मक प्रवृत्तियों के दहन का प्रतीक है। ग्रामीण अंचलों में नई फसल की बालियों (जौ, गेहूँ) को अग्नि में सेंककर समृद्धि की कामना की जाती है।
अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। गुलाल, अबीर, प्राकृतिक रंग, पिचकारी, ढोल-मांदर की थाप यह सब मिलकर वातावरण को उत्साहपूर्ण बना देते हैं। छत्तीसगढ़ और विशेषतः बिलासपुर अंचल में होली लोकगीतों, फाग और ढोलक-हारमोनियम की थाप के साथ अत्यंत जीवंत रूप में मनाई जाती है। फागुनी गीतों में श्रृंगार, हास्य और लोक चेतना का अद्भुत मिश्रण होता है।
साहित्य और संस्कृति में होली
भारतीय साहित्य में होली का वर्णन अत्यंत समृद्ध है। सूरदास ने ब्रज की होली को भक्ति-रस में पिरोया। कबीर ने रंग को आत्मिक अनुभूति से जोड़ा – “मन लागो मेरो यार फकीरी में…”!! रामधारी सिंह दिनकर ने भारतीय संस्कृति की ऊर्जा को अपने काव्य में प्रखर रूप दिया। होली का रंग केवल बाहरी नहीं, बल्कि मन के भीतर छिपी उदासी को भी धो देता है।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
होली का संबंध केवल परंपरा से नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी है। रंग और पिचकारी का व्यापार, मिठाई (गुझिया, मालपुआ) की बिक्री, वस्त्र बाजार में चहल-पहल, पर्यटन स्थलों पर भीड़ यह पर्व छोटे व्यापारियों के लिए विशेष अवसर लेकर आता है। ग्रामीण बाजारों में भी उत्सव से पूर्व आर्थिक सक्रियता बढ़ जाती है।
प्रकृति और लोकजीवन में फागुन
फाल्गुन की मादक बयार, आम्र-मंजरियों की सुगंध और कोयल की कूक के साथ होली का उल्लास प्रकृति में भी दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ी फाग में अक्सर ऐसे बोल सुनाई देते हैं— “फागुन आय रे, रंग बरसाए रे…” ढोलक, झांझ, मंजीरा और लोकनृत्य ये सब मिलकर जीवन को रसपूर्ण बना देते हैं।
आधुनिक संदर्भ में होली
आज के समय में होली का स्वरूप कुछ बदला है। रासायनिक रंगों का उपयोग, जल की अत्यधिक बर्बादी, शोर-प्रदूषण। इसलिए आवश्यकता है कि हम पर्यावरण-संरक्षण को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक रंगों से, सीमित जल प्रयोग के साथ और सौहार्दपूर्ण वातावरण में होली मनाएँ।
होली का जीवन-दर्शन
होली हमें सिखाती है — मन के वैर-भाव को जलाना, रिश्तों में रंग भरना, समाज में समरसता बढ़ाना, जीवन को उत्सव की तरह जीना।
यह पर्व बताता है कि जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए उसे प्रेम, हँसी और अपनत्व से सजाना ही सच्चा उत्सव का एक अभिन्न परिचायक है। होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। इसमें धर्म, दर्शन, लोकजीवन, कृषि, अर्थव्यवस्था और साहित्य सभी का समन्वय है।
जब फागुन की हवा में रंग उड़ते हैं और ढोलक की थाप पर कदम थिरकते हैं, तब प्रतीत होता है कि समूचा भारत एक ही रंग में रंग गया है — प्रेम और उल्लास के रंग में।
आइए, इस होली पर हम बाहरी रंगों के साथ-साथ अपने अंतर्मन को भी प्रेम, सद्भाव और भाईचारे के रंग से रंग दें। रंगों के इस महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।
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