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पाणिनि से एआई स्टैक तक: दिल्ली का एआई गौरव और राष्ट्रीय क्षमता का लक्ष्य

— हरदीप एस पुरी, केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री

नई दिल्ली, विशेष लेख | वेब वार्ता

जब पाणिनि ने बोली जाने वाली भाषा की अव्यवस्था को एक संक्षिप्त, गणनीय व्याकरण में रूपांतरित किया, तब उन्होंने एक मूल सत्य स्थापित किया—बुद्धिमत्ता सबसे शक्तिशाली तब होती है, जब वह संरचना में व्यक्त हो। नालंदा ने इस प्रवृत्ति को संस्थागत स्वरूप दिया, जहाँ ज्ञान का संरक्षण, विमर्श और सीमाओं के पार उसका प्रसार एक संगठित परंपरा बना। आज, भारत एआई इम्पैक्ट समिट 2026 की मेजबानी का निर्णय उसी सभ्यतागत दृष्टि का विस्तार है। तकनीकी छलांग अब केवल उपकरणों की नहीं, बल्कि उन प्रणालियों की है जो सीख सकें, तर्क कर सकें और बड़े पैमाने पर कार्य कर सकें—और यह भविष्य केवल कुछ देशों के हाथों में सीमित नहीं रह सकता।

भारत मण्डपम से वैश्विक दक्षिण की आवाज

पिछले सप्ताह भारत मण्डपम में आयोजित यह शिखर सम्मेलन किसी वैश्विक दक्षिण राष्ट्र द्वारा आयोजित पहला वैश्विक एआई शिखर सम्मेलन था। इसमें 20 से अधिक राष्ट्राध्यक्ष, 60 मंत्री, 100 से अधिक देशों के 500 से अधिक एआई विशेषज्ञ और 300 प्रदर्शक शामिल हुए। यह भागीदारी बताती है कि एआई अब केवल तकनीकी विमर्श नहीं, बल्कि वैश्विक शासन और विकास की धुरी बन चुका है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने एक स्पष्ट संगठनात्मक दृष्टि प्रस्तुत की—डेटा पर संप्रभुता, डिज़ाइन के अनुसार समावेश और स्वाभाविक जवाबदेही। यह मॉडल वैश्विक पूंजी को आमंत्रित करता है, किंतु भारतीय शर्तों पर।

एम.ए.एन.ए.वी विजन: नैतिकता से वैधता तक

प्रधानमंत्री के एम.ए.एन.ए.वी विजन में नैतिक पाबंदी, जवाबदेह शासन, डेटा संप्रभुता, व्यापक पहुंच और कानूनी वैधता को केंद्रीय स्थान दिया गया है। इसका उद्देश्य एआई को खुला आकाश देना है, परंतु नियंत्रण मानव हाथों में रखना। यह दृष्टिकोण कई उन्नत अर्थव्यवस्थाओं की हिचकिचाहट के विपरीत एक स्पष्ट रेखा खींचता है।

दिल्ली घोषणा: विकास-उन्मुख एआई शासन

शिखर सम्मेलन में अपनाई गई दिल्ली घोषणा को वैश्विक दक्षिण की पहली व्यापक एआई शासन रूपरेखा माना जा रहा है। इसका ढांचा ‘लोग, पृथ्वी और प्रगति’ पर आधारित है। भारतजेन जैसे समाधान 22 भारतीय भाषाओं में समर्थन देकर उस वास्तविकता को संबोधित करते हैं कि दुनिया का अधिकांश भाग अंग्रेज़ी में संचालित नहीं होता।

सब्सिडी वाले जीपीयू एक्सेस (₹65 प्रति घंटा) और प्रस्तावित वैश्विक कंप्यूट बैंक प्रवेश बाधाओं को कम करते हैं। घोषणा डेटा निष्कर्षणवाद की उस प्रवृत्ति को चुनौती देती है, जिसमें विकासशील देशों से डेटा लेकर उन्हीं देशों को मॉडल सेवाओं के लिए भुगतान करना पड़ता है।

डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना से एआई आधारशिला

भारत का एआई मॉडल किसी श्वेत पत्र पर नहीं, बल्कि मजबूत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना पर आधारित है। यूपीआई ने 2025 में 228 अरब से अधिक लेन-देन संसाधित किए, जिनका मूल्य 3.4 ट्रिलियन डॉलर था। यह वैश्विक रीयल-टाइम डिजिटल भुगतान का लगभग आधा है। जेएएम त्रय ने 2015 से ₹3.48 लाख करोड़ की बचत सुनिश्चित की।

आज भारत विश्व के लगभग 20% डेटा का उत्पादन करता है, पर वैश्विक डेटा-सेंटर क्षमता में उसका हिस्सा लगभग 3% है। इस अंतर को तेजी से पाटा जा रहा है।

निवेश प्रतिबद्धताएँ: क्षमता का विस्तार

शिखर सम्मेलन में अनेक बड़ी घोषणाएँ हुईं—

  • माइक्रोसॉफ्ट: 50 बिलियन डॉलर (17.5 बिलियन भारत के लिए)
  • गूगल: 15 बिलियन डॉलर की संपर्क पहल
  • एडब्ल्यूएस: महाराष्ट्र में 8.3 बिलियन डॉलर
  • अदानी समूह: 100 बिलियन डॉलर एआई डेटा केंद्रों हेतु
  • इंडियाएआई मिशन: 38,000 जीपीयू से 58,000 तक विस्तार

सरकार का लक्ष्य अगले दो वर्षों में 200 अरब डॉलर का एआई निवेश आकर्षित करना है।

मानव संसाधन और संप्रभु मॉडल

2.5 लाख छात्रों ने जिम्मेदार एआई नवाचार की शपथ ली। 30 डेटा-एआई लैब्स कार्यरत हैं और 570 का लक्ष्य है। एआईकोश 7,500 से अधिक डेटासेट साझा अवसंरचना के रूप में उपलब्ध कराता है।

शिखर सम्मेलन में तीन संप्रभु मॉडल प्रस्तुत किए गए—सर्वम एआई का 105-बिलियन-पैरामीटर मॉडल और भारतजेन परम2 17-बिलियन-पैरामीटर बहुभाषी मॉडल। ये विदेशी मॉडल के अनुकूलन नहीं, बल्कि संप्रभु अवसंरचना पर निर्मित स्वदेशी समाधान हैं।

वैश्विक साझेदारी और आपूर्ति श्रृंखला

भारत ने पैक्स सिलीका घोषणा पर हस्ताक्षर कर एआई, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा में अपनी भूमिका मजबूत की है। टाटा-ओपनएआई साझेदारी और भारत-अमेरिका एआई अवसर पहल भविष्य के सह-निर्माण की दिशा दिखाती है।

संरचना ही बुद्धिमत्ता है

भारत केवल एआई शिखर सम्मेलन की मेजबानी नहीं कर रहा, बल्कि नियमों को पुनर्परिभाषित कर रहा है—एक ऐसी संरचना के साथ, जो लोकतांत्रिक, संप्रभु और समावेशी है। पाणिनि का सिद्धांत सरल था—संरचना ही बुद्धिमत्ता है। आज भारत उसी संरचना का आधुनिक संस्करण गढ़ रहा है।

(लेखक केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हैं)


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