विशेष लेख, कपिल बर्मन | वेब वार्ता
होलिका दहन और स्त्री गरिमा: “नारी पूज्यते यत्र, रमन्ते तत्र देवताः” यह सूत्र हमारे ऋषियों ने दिया। पर क्या यह मात्र एक आदर्श वाक्य बनकर रह गया है? क्या हमने सदियों से इस सत्य को केवल दोहराया है, जिया नहीं? आज प्रश्न यह नहीं कि हम नारी को क्या कहते हैं, प्रश्न यह है कि हम उसके साथ क्या करते हैं।
होलिका : पुनर्पाठ की माँग करती एक कथा
होलिका दहन की कथा को जितनी बार सुना, उतनी बार एक प्रश्न मन में कौंधता रहा – यदि होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती, तो वह जल कैसे गई? यदि वह बुआ थी, तो क्या कभी किसी बुआ ने अपने भतीजे को जलाने की सोची? बुआ तो अपने भतीजे से अपने पुत्र से भी अधिक स्नेह करती है – यह हमारे समाज का सनातन सत्य है।
तो फिर यह कथा क्या कहती है? क्या यह हमें कोई और सत्य बताने का प्रयास कर रही है?
वैकल्पिक इतिहास : होलिका की बुद्धिमत्ता का अपमान
विचार करें – होलिका एक तार्किक, बुद्धिमान और स्वतंत्र चेतना वाली स्त्री थी। उसने उस बाहरी संस्कृति का प्रतिरोध किया जो शोषण और अन्याय पर आधारित थी। जो संस्कृति समानता का दिखावा करते हुए वर्चस्व स्थापित करना चाहती थी। होलिका ने उस सभ्यता के झूठे आदर्शों को उजागर किया।
परिणाम? उसे जला दिया गया — प्रतीकात्मक रूप से नहीं, शाब्दिक रूप से। और आज हम प्रतिवर्ष उसी स्त्री के दहन का उत्सव मनाते हैं, उसे ‘राक्षसी’ कहते हैं, उसके प्रतिरोध को ‘बुराई’ का नाम देते हैं।
स्त्री-दहन की परंपरा : सती से होलिका तक
हमारे समाज ने सदियों से स्त्री को जलाने की परंपरा निभाई है:
- सती प्रथा : पति की मृत्यु पर पत्नी को चिता में जलना अनिवार्य
- देवदासी प्रथा : मंदिरों में स्त्रियों को देवता के नाम पर समर्पित कर उनका शोषण
- दहेज प्रथा : पर्याप्त दहेज न मिलने पर विवाहिता को जलाना
- होलिका दहन : एक स्त्री के प्रतिरोध को प्रतिवर्ष जलाने का उत्सव
यह कोई संयोग नहीं है। यह एक पैटर्न है — स्त्री की स्वतंत्र चेतना को, उसके तर्क को, उसके प्रतिरोध को जलाने का पैटर्न।
होलिका की आवाज़ : आज की आवश्यकता
होलिका मरती नहीं, वह प्रतिवर्ष जलती है — हमारी आस्था की आग में। वह चिल्लाती है, पर हम सुनना नहीं चाहते। वह प्रश्न करती है, पर हम उसे ‘राक्षसी’ कहकर खारिज कर देते हैं।
आज आवश्यकता है — होलिका की आवाज़ सुनने की। उसके प्रश्नों का सामना करने की। उसके तर्क को समझने की।
- यदि होलिका राक्षसी थी, तो उसके पिता हिरण्यकश्यप को राक्षस क्यों नहीं कहा जाता?
- यदि वह बुरी थी, to उसे वरदान क्यों मिला?
- यदि वह अग्नि में नहीं जल सकती थी, तो वह जल कैसे गई?
ये प्रश्न हमारी कथाओं के पुनर्पाठ की माँग करते हैं।
नारी गरिमा : पुनर्विचार का आह्वान
हम सदियों से रूढ़ियाँ ढो रहे हैं। परंपरा के नाम पर अन्याय स्वीकार कर रहे हैं। आस्था की आड़ में अपमान सही ठहरा रहे हैं।
समय है — हम होलिका दहन का नहीं, होलिका के अपमान का दहन करें।
- उस सोच को जलाएँ जो स्त्री को जलाने का उत्सव मनाती है
- उस परंपरा को जलाएँ जो स्त्री के प्रतिरोध को ‘बुराई’ कहती है
- उस व्यवस्था को जलाएँ जो स्त्री के तर्क को दबा देती है
निष्कर्ष : नारी, तू जलने के लिए नहीं, जलाने के लिए है
होलिका की असली कहानी यह है — एक स्त्री ने प्रश्न किया। एक स्त्री ने प्रतिरोध किया। एक स्त्री ने अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाई। और उसे जला दिया गया।
आज, उसी स्त्री के दहन के उत्सव में, हमें निर्णय लेना है — क्या हम उसे फिर जलाएँगे, या उसकी आवाज़ बनेंगे?
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः” — यह सूत्र तभी सार्थक होगा, जब हम नारी को जलाने की परंपरा को जलाकर, उसे जीने का अधिकार देंगे।
होलिका की जलती चिता से उठी चिंगारी आज हमारे विवेक को जला रही है। क्या हम बुझाएँगे या स्वयं जलेंगे?
सर्वे भवन्तु सुखिन:, होलिका दहन और स्त्री गरिमा
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