-

भारत की वैश्विक कूटनीति का नया अध्याय ऊर्जा सुरक्षा रक्षा साझेदारी और तकनीकी सहयोग की मजबूत उड़ान

-कांतिलाल मांडोत- Kantilal Mandot
भारत की विदेश नीति पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ी है, उसने दुनिया की बड़ी शक्तियों को भी भारत की ओर नए नजरिए से देखने के लिए मजबूर किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया संयुक्त अरब अमीरात और नीदरलैंड यात्रा इसी बदलते भारत की तस्वीर पेश करती है। यह केवल औपचारिक विदेश दौरा नहीं था, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, निवेश, तकनीक, व्यापार और वैश्विक रणनीति को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। खास बात यह रही कि यूएई की यात्रा भले ही ढाई से तीन घंटे की रही, लेकिन उसके परिणाम बेहद व्यापक और दूरगामी दिखाई दे रहे हैं।
संयुक्त अरब अमीरात यानी यूनाइटेड अरब अमीरात आज भारत का सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार बनकर उभरा है। प्रधानमंत्री मोदी का अबू धाबी पहुंचना और वहां राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायज अल नाहयान द्वारा उनका गर्मजोशी से स्वागत करना दोनों देशों के मजबूत रिश्तों का संकेत था। यूएई एयरफोर्स के एफ-16 लड़ाकू विमानों द्वारा प्रधानमंत्री के विमान को एयर एस्कॉर्ट दिया जाना केवल सुरक्षा व्यवस्था नहीं, बल्कि भारत के प्रति सम्मान और विश्वास का प्रतीक माना गया। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इसे भारत के 140 करोड़ लोगों का सम्मान बताया।
इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ऊर्जा क्षेत्र में हुए समझौते रहे। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के कारण उसकी ऊर्जा आवश्यकताएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में यूएई के साथ एलपीजी आपूर्ति को लेकर हुआ दीर्घकालीन समझौता भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भारत को भविष्य में गैस आपूर्ति की स्थिरता मिलेगी और वैश्विक संकटों के समय भी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होगी। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान-इजराइल संघर्ष के बीच यह समझौता और अधिक अहम हो जाता है।
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को लेकर दोनों देशों के बीच हुआ समझौता भी भारत की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। यूएई की राष्ट्रीय तेल कंपनी द्वारा भारत के रणनीतिक तेल भंडार में भागीदारी बढ़ाने का निर्णय इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल ऊर्जा खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा के वैश्विक ढांचे में महत्वपूर्ण भागीदार बन रहा है। संकट के समय तेल भंडार किसी भी देश की आर्थिक स्थिरता और सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी होते हैं। ऐसे में भारत का यह कदम भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयारी माना जा रहा है।
इस यात्रा का दूसरा बड़ा पहलू रक्षा और सामरिक सहयोग रहा। भारत और यूएई ने रक्षा उद्योग, साइबर सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियानों और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का फैसला किया। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह भविष्य में बड़ी रक्षा साझेदारी की शुरुआत हो सकती है। पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत, यूएई और इजराइल के बीच उभरती रणनीतिक तिकड़ी दुनिया की नई शक्ति संरचना की ओर इशारा कर रही है। हाल के संघर्षों में यूएई पर हुए हमलों ने उसकी सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाया है और ऐसे समय में भारत का समर्थन यूएई के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यूएई द्वारा भारत में लगभग 48 हजार करोड़ रुपए निवेश की घोषणा भी इस दौरे की बड़ी उपलब्धि रही। बैंकिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, शिपिंग और तकनीक जैसे क्षेत्रों में यह निवेश भारत की आर्थिक प्रगति को गति देगा। गुजरात के वाडिनार में शिप रिपेयर क्लस्टर स्थापित करने का समझौता समुद्री व्यापार और जहाज निर्माण क्षेत्र में भारत की क्षमता को मजबूत करेगा। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे और भारत वैश्विक समुद्री लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकेगा।
तकनीकी क्षेत्र में हुए समझौते भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। भारत में 8-एक्साफ्लॉप सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टर स्थापित करने के लिए हुए करार से कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग के क्षेत्र में भारत को नई शक्ति मिलेगी। आज दुनिया एआई आधारित तकनीक की ओर तेजी से बढ़ रही है और भारत इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहता। ऐसे समझौते भारत को तकनीकी महाशक्ति बनाने की दिशा में अहम साबित हो सकते हैं।
यूएई यात्रा के बाद प्रधानमंत्री मोदी का नीदरलैंड दौरा भी रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नीदरलैंड यूरोप का प्रमुख व्यापारिक और तकनीकी केंद्र है। प्रधानमंत्री मोदी ने वहां भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए भारत को दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप हब बताया और कहा कि भारत अब वैश्विक विकास का इंजन बनना चाहता है। यह बयान केवल राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि भारत की बदलती आर्थिक वास्तविकता को दर्शाता है।
नीदरलैंड के साथ भारत के संबंध व्यापार, तकनीक, सेमीकंडक्टर, ग्रीन एनर्जी और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में तेजी से मजबूत हो रहे हैं। भारत इस समय सेमीकंडक्टर निर्माण क्षमता विकसित करने पर विशेष जोर दे रहा है और इसी कारण डच तकनीकी कंपनियों के साथ साझेदारी पर ध्यान दिया जा रहा है। विशेष रूप से एएसएमएल जैसी कंपनियां अत्याधुनिक चिप निर्माण तकनीक में विश्व अग्रणी हैं। भारत यदि इस क्षेत्र में मजबूत साझेदारी स्थापित कर लेता है तो वह वैश्विक तकनीकी सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
नीदरलैंड द्वारा 11वीं सदी की ऐतिहासिक चोलकालीन तांबे की पट्टिकाएं भारत को लौटाना भी दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों का महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह केवल पुरातात्विक वस्तुओं की वापसी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति बढ़ते वैश्विक सम्मान का प्रतीक है। औपनिवेशिक दौर में बाहर ले जाई गई धरोहरों की वापसी भारत के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ी हुई है।
आज भारत की विदेश नीति केवल कूटनीतिक मुलाकातों तक सीमित नहीं रह गई है। यह अब ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक साझेदारी, रक्षा सहयोग, तकनीकी विकास और सांस्कृतिक सम्मान जैसे बहुआयामी लक्ष्यों पर आधारित हो चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी की यूएई और नीदरलैंड यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब वैश्विक राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने की तैयारी कर चुका है। पश्चिम एशिया से लेकर यूरोप तक भारत की बढ़ती स्वीकार्यता इस बात का प्रमाण है कि दुनिया भारत को केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रही है।
इन यात्राओं ने यह भी दिखाया है कि भारत की विदेश नीति अब केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं बल्कि सक्रिय और दूरदर्शी बन चुकी है। ऊर्जा से तकनीक तक, रक्षा से व्यापार तक और संस्कृति से कूटनीति तक भारत हर क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है। आने वाले वर्षों में यही रणनीति भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में और अधिक मजबूत बनाएगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं स्तम्भकार है)

LATEST POSTS

हमारे शहरों के असली हीरो : सफाई कर्मचारी

-डॉ. सत्यवान सौरभ-किसी भी शहर की पहचान उसकी ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों या चमकती रोशनियों से नहीं, बल्कि उसकी स्वच्छता और व्यवस्था से होती है।...

ट्रम्प जिनपिंग मुलाकात से बदलती विश्व राजनीति और 9 लाख करोड़ की बोइंग डील का वैश्विक असर

-कांतिलाल मांडोत-अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का चीन दौरा केवल एक औपचारिक कूटनीतिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह बदलती विश्व व्यवस्था का बड़ा संकेत है।...

संकट के समय राजनीति नहीं, राष्ट्र सर्वोपरि होना चाहिए

-लक्ष्मीकान्त पाठक-लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों आवश्यक हैं। असहमति लोकतंत्र की आत्मा है और आलोचना उसकी शक्ति। किंतु इतिहास गवाह है कि जब-जब राष्ट्र...