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संकट के समय राजनीति नहीं, राष्ट्र सर्वोपरि होना चाहिए

-लक्ष्मीकान्त पाठक-

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लक्ष्मीकांत पाठक

लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों आवश्यक हैं। असहमति लोकतंत्र की आत्मा है और आलोचना उसकी शक्ति। किंतु इतिहास गवाह है कि जब-जब राष्ट्र किसी बड़े संकट के मुहाने पर खड़ा हुआ है, तब-तब राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता ने ही देश को संभाला है। आज भारत एक ऐसे ही दौर से गुजर रहा है, जहाँ वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, पश्चिमी एशिया में बढ़ता युद्ध संकट और विश्व राजनीति में महाशक्तियों की सनक ने आम आदमी की रसोई से लेकर देश की अर्थव्यवस्था तक को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

दुनिया का सबसे संवेदनशील क्षेत्र माने जाने वाले पश्चिमी एशिया में युद्ध की आग लगातार फैल रही है। तेल उत्पादक देशों के बीच तनाव, सैन्य हमले, और अमेरिका की आक्रामक नीतियों ने स्थिति को विस्फोटक बना दिया है। विशेषकर अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रम्प जैसी आक्रामक सोच ने वैश्विक संतुलन को बार-बार झकझोरा है। उनकी “अमेरिका फर्स्ट” नीति ने दुनिया के अनेक देशों को अस्थिरता के गर्त में धकेला। पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव का सबसे बड़ा प्रभाव तेल की कीमतों पर पड़ता है और भारत जैसा विशाल उपभोक्ता देश इससे सीधे प्रभावित होता है।

भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से प्राप्त करता है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, परिवहन, खेती और रोजमर्रा की वस्तुओं पर पड़ेगा। महंगाई की मार सबसे अधिक गरीब और मध्यम वर्ग झेलेगा। पहले से रोजगार, व्यापार और महंगाई की चुनौतियों से जूझ रही जनता के लिए यह संकट और भयावह हो सकता है।

विडंबना यह है कि ऐसे समय में भी देश के भीतर राजनीतिक दल केवल आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में व्यस्त दिखाई देते हैं। कोई सरकार को हर समस्या का दोषी ठहरा रहा है, तो कोई विपक्ष को राष्ट्रविरोधी बताने में जुटा है। जबकि सच्चाई यह है कि वैश्विक युद्ध और आर्थिक संकट किसी एक सरकार या दल के नियंत्रण में नहीं होते। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए राजनीतिक परिपक्वता, धैर्य और राष्ट्रीय एकजुटता की आवश्यकता होती है।

यह वह समय नहीं है जब सत्ता पक्ष अपनी पीठ थपथपाए और विपक्ष केवल विरोध के लिए विरोध करे। यह वह समय है जब संसद से लेकर सड़क तक राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा जाए। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन संकट काल में देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता को कमजोर करने वाली राजनीति अंततः राष्ट्र को ही नुकसान पहुंचाती है। भारत ने अनेक कठिन दौर देखे हैं — युद्ध, महामारी, आर्थिक मंदी और आतंकवाद। हर बार देश तब मजबूत हुआ जब जनता और राजनीतिक दलों ने मिलकर चुनौतियों का सामना किया। कोरोना महामारी के दौरान भी हमने देखा कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद समाज के हर वर्ग ने एक-दूसरे का साथ दिया। आज फिर वैसी ही समझदारी की आवश्यकता है।

सरकार को भी चाहिए कि वह विपक्ष को विश्वास में लेकर आर्थिक और कूटनीतिक रणनीति तैयार करे। केवल भाषणों और प्रचार से संकट नहीं टलते। जनता को राहत, रोजगार की सुरक्षा, महंगाई नियंत्रण और विदेश नीति में संतुलन जैसे मुद्दों पर गंभीरता से काम करना होगा। वहीं विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह आलोचना के साथ रचनात्मक सुझाव भी दे, ताकि लोकतंत्र केवल शोर का मंच बनकर न रह जाए। राष्ट्र केवल सरकार से नहीं चलता, बल्कि सामूहिक विश्वास से चलता है। जब सीमाओं पर संकट हो, वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगा रही हो और दुनिया युद्ध के भय में जी रही हो, तब राजनीति की तलवारें म्यान में रखकर देशहित में साथ खड़ा होना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है। क्योंकि सत्ता बदलती रहती है, लेकिन राष्ट्र हमेशा स्थायी रहता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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