अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का चीन दौरा केवल एक औपचारिक कूटनीतिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह बदलती विश्व व्यवस्था का बड़ा संकेत है। नौ वर्षों बाद कोई अमेरिकी राष्ट्रपति चीन पहुंच रहा है और इस बार परिस्थितियां पहले से कहीं अधिक जटिल हैं। दुनिया यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, ताइवान तनाव, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रतिस्पर्धा और वैश्विक आर्थिक मंदी जैसी चुनौतियों से गुजर रही है। ऐसे समय में ट्रम्प और चीनी राष्ट्रपति एक्स जिनपिंग की मुलाकात पूरी दुनिया की नजरों में है। इस यात्रा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ट्रम्प अकेले नहीं आए हैं, बल्कि उनके साथ अमेरिका की सबसे बड़ी कंपनियों के 17 शीर्ष सीईओ भी मौजूद हैं। इसमें एलन मस्क ,टीम कुक लेरी फिंक और डेविड सोलोमन जैसे बड़े नाम शामिल हैं। यह साफ संकेत है कि अमेरिका अब केवल टकराव की नीति नहीं बल्कि व्यापार और आर्थिक साझेदारी के रास्ते भी खोलना चाहता है।
कुछ वर्षों पहले तक अमेरिका लगातार चीन को वैश्विक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बताता था। व्यापार युद्ध शुरू हुआ, भारी टैरिफ लगाए गए, चीनी तकनीकी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए गए और ताइवान मुद्दे पर चीन को खुली चुनौती दी गई। अमेरिकी नेताओं ने चीन पर तकनीक चोरी, साइबर जासूसी और बाजार में अनुचित प्रतिस्पर्धा जैसे आरोप लगाए। लेकिन अब वही अमेरिका चीन के साथ बड़े कारोबारी समझौते करने की कोशिश कर रहा है। यह बदलाव बताता है कि विश्व राजनीति में केवल वैचारिक संघर्ष नहीं चलता, अंततः आर्थिक हित ही सबसे निर्णायक साबित होते हैं।
इस यात्रा का सबसे चर्चित पहलू संभावित बोइंग डील है। रिपोर्टों के अनुसार चीन करीब 500 बोइंग 737 मैक्स, 100 बोइंग 787 ड्रीमलाइनर और बड़ी संख्या में अन्य विमान खरीद सकता है। कुल सौदा लगभग 9 लाख करोड़ रुपए का माना जा रहा है। यदि यह समझौता होता है तो यह विमानन इतिहास की सबसे बड़ी डीलों में शामिल होगा। इसका असर केवल अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा। अमेरिका में हजारों नई नौकरियां पैदा होंगी, बोइंग को लंबे समय बाद बड़ी राहत मिलेगी और अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती मिलेगी। दूसरी तरफ चीन अपनी तेजी से बढ़ती विमानन जरूरतों को पूरा कर पाएगा। चीन दुनिया का सबसे बड़ा एविएशन बाजार बनने की ओर बढ़ रहा है और उसे आने वाले वर्षों में हजारों नए विमानों की जरूरत होगी।
यह डील इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में बोइंग लगातार संकटों से जूझ रही थी। 737 मैक्स दुर्घटनाओं के बाद उसकी साख को बड़ा नुकसान पहुंचा था। कोविड महामारी के दौरान वैश्विक विमानन उद्योग भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। ऐसे समय में चीन का इतना बड़ा ऑर्डर बोइंग के लिए जीवनदान जैसा साबित हो सकता है। इसके साथ ही यह संदेश भी जाएगा कि चीन और अमेरिका अपने आर्थिक रिश्तों को पूरी तरह टूटने नहीं देना चाहते।
ट्रम्प के साथ इतने बड़े कारोबारी प्रतिनिधिमंडल का जाना यह साबित करता है कि अमेरिका की बड़ी कंपनियां चीन से दूरी बनाने के पक्ष में नहीं हैं। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार होने के कारण चीन आज भी अमेरिकी कंपनियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। टेसला की शंघाई फैक्ट्री उसकी वैश्विक उत्पादन क्षमता का बड़ा हिस्सा संभालती है। एपल की सप्लाई चेन चीन पर काफी हद तक निर्भर है। अमेरिकी निवेश कंपनियों और बैंकों के लिए भी चीन विशाल अवसरों का बाजार है। इसलिए ट्रम्प के साथ सीईओ का यह काफिला केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूरी और रणनीति दोनों को दिखाता है।
इस मुलाकात में ताइवान का मुद्दा सबसे संवेदनशील रहने वाला है। अमेरिका लगातार ताइवान को हथियार उपलब्ध करा रहा है, जबकि चीन इसे अपनी संप्रभुता के खिलाफ मानता है। यदि दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर तनाव कम करने की कोई समझ बनती है तो एशिया में स्थिरता बढ़ सकती है। हालांकि पूरी संभावना यही है कि दोनों देश अपने-अपने रुख पर कायम रहेंगे, लेकिन संवाद जारी रहना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों के बीच सीधा टकराव पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को संकट में डाल सकता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई की लड़ाई भी इस बैठक का बड़ा विषय है। अमेरिका चीन पर एआई तकनीक चोरी करने और अमेरिकी चिप्स का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगाता रहा है। दूसरी ओर चीन अपनी घरेलू तकनीकी कंपनियों को मजबूत बनाकर अमेरिकी निर्भरता कम करना चाहता है। एआई आने वाले समय में आर्थिक और सैन्य शक्ति का सबसे बड़ा आधार बनने जा रही है। इसलिए ट्रम्प और जिनपिंग की बातचीत केवल व्यापार तक सीमित नहीं बल्कि भविष्य की तकनीकी सत्ता के संघर्ष से भी जुड़ी है।
फेंटेनाइल और क्रिप्टो भुगतान का मुद्दा भी अमेरिका के लिए अहम है। अमेरिका में नशीली दवाओं से होने वाली मौतों में फेंटेनाइल बड़ी समस्या बन चुका है। अमेरिका का आरोप है कि इसके उत्पादन में उपयोग होने वाले रसायन चीन से आते हैं और भुगतान क्रिप्टोकरेंसी के जरिए होता है। यदि इस दिशा में दोनों देश सहयोग बढ़ाते हैं तो अमेरिका के भीतर ट्रम्प को राजनीतिक फायदा भी मिल सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि कभी चीन के खिलाफ बेहद आक्रामक बयान देने वाले ट्रम्प अब अपेक्षाकृत नरम दिखाई दे रहे हैं। इसकी वजह केवल कूटनीति नहीं बल्कि आर्थिक वास्तविकता है। अमेरिका जानता है कि चीन को पूरी तरह अलग-थलग करना संभव नहीं है। वैश्विक सप्लाई चेन, व्यापार, तकनीक और निवेश की संरचना इतनी गहराई से जुड़ी हुई है कि दोनों देशों को अंततः संवाद करना ही पड़ता है। ट्रम्प भी यह समझते हैं कि यदि अमेरिकी कंपनियों को मजबूत रखना है तो चीन के साथ संबंधों को पूरी तरह खराब नहीं किया जा सकता।
इस मुलाकात से सबसे बड़ा फायदा संभवतः वैश्विक अर्थव्यवस्था को होगा। यदि व्यापार युद्ध कम होता है, टैरिफ घटते हैं और सप्लाई चेन स्थिर होती है तो दुनिया भर के बाजारों में भरोसा बढ़ेगा। एशियाई देशों को राहत मिलेगी, तेल बाजार स्थिर हो सकते हैं और निवेशकों का विश्वास लौट सकता है। यूरोप भी चाहेगा कि अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम हो क्योंकि दोनों महाशक्तियों का संघर्ष वैश्विक व्यापार को प्रभावित करता है।
रूस भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। खबर है कि व्लदीमिर पुतिन भी जल्द चीन का दौरा कर सकते हैं। इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में विश्व राजनीति में नई धुरी बनती दिखाई दे सकती है। चीन एक तरफ अमेरिका से व्यापारिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है तो दूसरी तरफ रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी भी बनाए रखना चाहता है। यही कारण है कि बीजिंग आज विश्व राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बनता जा रहा है।
ट्रम्प और जिनपिंग की यह मुलाकात केवल दो नेताओं की बैठक नहीं बल्कि बदलती वैश्विक शक्ति संतुलन की तस्वीर है। इसमें व्यापार है, तकनीक है, सुरक्षा है और भविष्य की विश्व व्यवस्था का संघर्ष भी छिपा है। 9 लाख करोड़ की संभावित बोइंग डील और अमेरिकी सीईओ की मौजूदगी यह साबित करती है कि अंततः आर्थिक हित ही देशों को एक-दूसरे के करीब लाते हैं। दुनिया अब यह देख रही है कि यह मुलाकात केवल अस्थायी समझौता साबित होती है या आने वाले वर्षों की नई वैश्विक राजनीति की शुरुआत।
(वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं स्तम्भकार है)


