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कट्टरता की बारूद पर ठहाके लगाता गजवा-ए-दुनिया


Dr. Ravindra Arzariya

विश्व में चल रही युद्ध विभीषिका ने शक्ति की दम पर राज्य करने की नई परिभाषायें एक बार फिर से गढना शुरू कर दीं हैं। अतीत के दुखःद कथानकों की दस्तक तेज होती जा रही है। संवेदनाओँ और सिद्धान्तों की खुले आम होली जल रही है। सर्वाधिक चर्चित अमेरिका-ईरान-इजरायल युद्ध ने रूस-यूक्रेन जैसी जंगों बहुत पीछे छोड दिया है। समूची दुनिया का जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है। जबरन कब्जे के प्रयासों ने अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों के चीथडे उडा दिये हैं। टोल, टैक्स और शुल्क लेने की होड लगी है। तेल, गैस सहित अन्य जरुरत सामानों का अकाल पड रहा है। आवश्यकता से कम आपूर्ति के कारण मंहगाई आसमान छूने लगी है। आग्नेय शस्त्रों से केवल जीवन, भौतिक निर्माण और पर्यावरण ही नस्तनाबूद नहीं हो रहा है बल्कि आदर्शों, मर्यादाओं और संस्कृतियों के समाप्त होने का खतरा भी तेज होता जा रहा है। बल के मद में चूर अमेरिका का पाला कट्टरता का जहर पिलाने वाले ईरान के साथ पडा है। अमेरिका ने अपने वैभव और हथियारों की दम पर जहां अनेक राष्ट्रों को अघोषित गुलाम बनाया है वहीं ईरान ने अपनी कट्टरता की पाठशाला से हूती, हिजबुल्लाह और हमास जैसे अनगिनत आतंकी निकाले हैं। अमेरिका ने वर्तमान जीवन की विलासता परोसी तो ईरान ने मरने के बाद की हूरें दिखाईं। एक ने साम्राज्यवाद को विस्तारवाद के साथ काकटेल बनाया तो दूसरे ने गजवा-ए-दुनिया का ऐलान कर दिया। संसार मूक दर्शक बना तमाशा देख रहा है। कोई निंदा प्रस्ताव पारित कर रहा है तो कोई शान्ति का पक्षधर बनाकर अपने कर्तव्यों की इति मान बैठा है। कोई कूटनैतिक समाधान की बात करता है तो कोई मानवीय दृष्टिकोण अपने की वकालत कर रहा है। आतंकियों की गैर मानवीय कृत्यों को नजरंदाज करने वालों की भी कमी नहीं है। वर्तमान में हालात तो यहां तक पहुंच गये हैं कि अनेक देशों में रहने वाले कट्टरपंथी अब ईरान, हमास, हिजबुल्लाह, हूती जैसों को मजहब के नाम पर सहायता, सहयोग और संसाधन मुहैया करा रहे हैं। चंदे से जमा की गई भारी भरकम धनराशियां चुपके के नाम पर आतंकियों तक पहुंचाई जा रही है। कट्टरता के नाम पर चौधरी बनकर उभरा छोटा सा देश ईरान, आज संसार के ठेकेदार बने अमेरिका और इजरायल को नाकों चने चबवा रहा है। टाप लीडरशिप समाप्त होने के बाद भी वह रक्तबीज की तरह नित नये पैतरे बदल कर सामने आ जाता है। सुरंगों में छुपा हथियारों का जखीरा अन्तहीन सिद्ध हो रहा है। कभी घातक मिसाइलें सामने आतीं है तो कभी करामाती ड्रोन। कभी वह खुद हमले करता है तो कभी उसके पाले हुए आतंकी संगठनों की ओर से विध्वंसक पहल होती है। चारों ओर से घिर चुके अमेरिका और इजरायल अब मुखौटा ओढे कट्टरपंथियों के मध्य युद्ध विराम की गणित बैठाने में लगे है। उनका लक्ष्य अब सम्मान के साथ युद्ध समाप्ति का रह गया है। दौनों देश अब अपने सम्मान को बचाते हुए युद्ध के दावानल से निकलने हेतु झटपटा रहे है। ऐसे में अमेरिका गुलाम बन चुके पाकिस्तान के कन्धे का उपयोग करके अपने दुश्मन का शिकार करना चाहता है। वहीं पाकिस्तान भी डबल क्रास करके अपनी दरिद्रता दूर करने की फिराक में है। आतंकवाद फैलाने वाला हैडमास्टर बना पाकिस्तान गिरगिट की तरह हर पल रंग बदल रहा है। उसका देश तो कट्टर तानाशाहों के लिए हमेशा ही सुरक्षित गढ रहा है। ईमानदाराना बात तो यह है कि कट्टरता का जहर अब हर देश, हर राज्य, हर शहर, हर कस्बे और हर गांव में फैल चुका है। मरने के बाद का सब्जबाग देखने वाले अंधविश्वासी लोगों की जमातें विवेकहीन हो चुकीं हैं। ईरान का जीता जागता उदाहरण देखने के बाद भी संसार के ज्यादातर देश मरघट ज्ञान में डूबे हुए हैं। दूसरों की अन्तिम यात्रा के साथ मुक्तिधाम पहुंचने वाले यह सोचकर संवेदनहीन बन जाते हैं कि मरने वाला तो मर गया, चला गया। हमें तो मौत आना ही नहीं है, हम तो अमर होकर आये हैं। हमारा पैसा, हमारा रुतबा, हमारी पहुंच, हमारे लोग हमें मरने नहीं देंगे। वास्तविकता तो यह है कि हर गली, मुहल्ले में बारूदी सुरंगे बिछाई जा चुकीं हैं। अवैध कब्जा करके सकरी गलियों में बने ऊंचे-ऊंचे मकानों के तहखानों में हथियारों का जखीरा पहले से ही जमा है। इस जखीरे तक पहुंचने के पहले ही आगन्तुकों के परखच्चे उडाने की तैयारियों कब की पूरी हो चुकीं हैं। भारत में तो लाखों-करोडों रोहिंग्या, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी घुसपैठिये मामू, चाचू, दूल्हाभाई जैसे रिश्तेदार बनकर गांव-गांव में जडें जमा चुके हैं। मीरजाफरों के मार्फत आने वाले इन आतंकियों ने तो अब उत्तरदायी तंत्र की नाक के नीचे ही अपने ठिकाने बना लिये हैं। महानगरों के चौराहों से लेकर लावारिश पडी नजूल की जमीनों तक पर इनके अड्डे देखे जा सकते हैं। कहीं तंबू तानकर बस गये, तो कहीं कबाड का काम शुरू कर दिया। कहीं पहाडी पर डेरे डाल लिये तो कहीं पुलों-नालों पर बाड लगा ली। दिन में रोजगार के नाम पर दिखाने के लिए पंचर बनाने बैठ गये, सब्जी की ठिलिया लगा ली, मोटरसाइकिल ठीक करने लगे, पटरी पर फल सजा लिये, जूते-कपडे-वर्तन की सेल लगा ली, फेरीवाला बनकर सामान बेचने निकल पडे। दिन में की गई रेकी को रात में चोरी, डकैती जैसी घटनाओं में बदलने में भी इनको महारत हासिल है। हत्या जैसे जघन्य अपराधों का प्रशिक्षण तो इन्हें बचपन से ही दिया जाता है। कट्टरता की बारूद पर ठहाके लगाते गजवा-ए-दुनिया का रूप अब ज्यादा भयानक हो रहा है। ऐसे में मानवतावादियों को एक साथ मिलकर आतंक के विरोध में खडा होना पडेगा तभी स्वार्थपरिता में आकण्ठ डूबे लोगों के मंसूबों पर पानी फेरा जा सकेगा। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

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