Wednesday, February 25, 2026
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UP SIR सभी विधानसभाओं से ‘गायब’ हुए हजारों मतदाता: क्या यह सूची शुद्धता की नई शुरुआत है या राजनीतिक भूचाल का संकेत?

लखनऊ, अजय कुमार | वेब वार्ता

UP SIR : उत्तर प्रदेश की राजनीति में मतदाता सूची हमेशा से एक रहस्यमयी पहेली रही है, लेकिन इस बार विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की ड्राफ्ट सूची ने नई बहस छेड़ दी है। क्या आप जानते हैं कि प्रदेश की सभी 403 विधानसभाओं से हजारों वोटर ‘गायब’ हो गए हैं? क्या यह शुद्धिकरण का सकारात्मक कदम है, जो फर्जी वोटिंग को रोककर लोकतंत्र को मजबूत करेगा, या फिर आने वाले चुनावों में सियासी दलों के समीकरण बदलने का इशारा?

75 जिलों के आंकड़ों को देखें तो कटौती का पैटर्न जिज्ञासु बनाता है – शहरी क्षेत्रों में भारी कमी, जबकि ग्रामीण इलाकों में संतुलन। चुनाव आयोग की यह पहल सराहनीय है, जो मतदाता सूची को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की दिशा में एक बड़ा प्रयास है। लेकिन सवाल तो उठते हैं – इन ‘गायब’ वोटरों का क्या होगा, और अंतिम सूची में कितने वापस जुड़ेंगे?

SIR अभियान का रहस्य: क्यों हुई इतनी कटौती?

SIR अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची से मृतक, स्थानांतरित और डुप्लीकेट नामों को हटाकर इसे शुद्ध बनाना है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा की टीम ने इस पर महीनों मेहनत की है, और परिणामस्वरूप 2.89 करोड़ नाम कटे हैं। लेकिन क्या यह सिर्फ आंकड़ों का खेल है? जिज्ञासा यह है कि लखनऊ जैसे शहरी जिले में 30% कटौती क्यों, जबकि ललितपुर में सिर्फ 9.95%? चुनाव आयोग के प्रयासों से सूची अब ज्यादा सटीक होगी, जो निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करेगी। सरकारी स्तर पर BLO (बूथ लेवल अधिकारी) और जागरूकता अभियान चलाए गए, जिससे लोग अपने पैतृक स्थानों पर नाम स्थानांतरित करा रहे हैं। यह बदलाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर सकता है, क्योंकि वोटर गांवों की ओर लौट रहे हैं।

ये भी पढ़ें: यूपी में SIR ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी: 2.89 करोड़ नाम हटे, अब 12.55 करोड़ वोटर; मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने दी पूरी जानकारी

जिलेवार कटौती: कौन से इलाके सबसे प्रभावित?

आंकड़ों को देखें तो शहरी और औद्योगिक जिलों में कटौती का प्रतिशत ग्रामीण से ज्यादा है। क्या यह शहरों से पलायन का संकेत है? निम्न तालिका में सभी 75 जिलों की कटौती के प्रमुख आंकड़े दिए गए हैं, जो जिज्ञासा बढ़ाते हैं कि आगे क्या होगा।

क्रमांकजिलाकटौती संख्याकटौती प्रतिशत
1सहारनपुर4,32,53416.37%
2मुजफ्फरनगर3,44,21716.29%
3मेरठ6,65,63524.65%
4गाजियाबाद8,18,13928.83%
5बुलन्दशहर4,03,36915.14%
6गौतम बुद्ध नगर4,47,47123.98%
7बागपत1,77,29918.15%
8आगरा8,36,94323.25%
9अलीगढ़5,20,18918.60%
10मथुरा3,73,79319.19%
11फिरोजाबाद3,44,75218.13%
12मैनपुरी2,26,87516.17%
13एटा2,20,42616.80%
14हाथरस1,89,61616.30%
15बरेली7,14,75320.99%
16बदायूं4,92,99520.39%
17शाहजहांपुर5,03,92221.76%
18पीलीभीत1,99,77213.61%
19मुरादाबाद3,87,61115.76%
20रामपुर3,21,57118.29%
21बिजनौर4,27,15915.53%
22अमरोहा1,81,17713.22%
23कानपुर नगर9,02,14825.50%
24कानपुर देहात2,03,95715.26%
25इटावा2,33,01818.95%
26फर्रुखाबाद2,90,82420.80%
27कन्नौज2,78,09521.57%
28औरैया1,58,05515.36%
29प्रयागराज11,56,30524.64%
30फतेहपुर3,15,46816.32%
31प्रतापगढ़5,00,10919.81%
32कौशांबी2,19,69818.00%
33झांसी2,19,61213.92%
34ललितपुर95,4479.95%
35जालौन2,12,05916.34%
36हमीरपुर90,56010.78%
37महोबा85,35212.42%
38बांदा1,75,42113.00%
39चित्रकूट1,00,09213.67%
40वाराणसी5,73,20318.18%
41जौनपुर5,89,54316.51%
42गाजीपुर4,08,68913.85%
43चंदौली2,30,08615.45%
44मिर्जापुर3,42,76117.94%
45सोनभद्र2,51,96417.93%
46भदोही2,06,32016.73%
47आजमगढ़5,66,60615.25%
48मऊ3,00,22317.52%
49बलिया4,55,97618.16%
50गोरखपुर6,45,62517.61%
51महाराजगंज3,01,02215.11%
52देवरिया4,14,79917.22%
53कुशीनगर5,02,64018.65%
54बस्ती2,98,28715.70%
55सिद्धार्थनगर3,98,90020.33%
56संत कबीर नगर2,66,87019.96%
57लखनऊ12,00,13830.04%
58उन्नाव4,07,17117.51%
59रायबरेली3,48,86216.35%
60सीतापुर6,23,77219.55%
61हरदोई5,44,68218.04%
62लखीमपुर खीरी5,05,80217.50%
63गोंडा4,69,63718.40%
64बहराइच5,41,32820.44%
65बलरामपुर4,11,20025.98%
66श्रावस्ती1,34,99216.51%
67अयोध्या3,35,74217.69%
68सुल्तानपुर3,16,94717.19%
69बाराबंकी3,73,15416.00%
70अंबेडकर नगर2,58,54713.82%
71कासगंज1,72,23816.28%
72अमेठी2,67,24118.60%
73हापुड़2,57,90322.30%
74शामली1,63,45816.75%
75संभल3,18,60120.29%

यह तालिका दर्शाती है कि औसतन 18% कटौती हुई है, लेकिन शहरी जिलों में यह 20-30% तक पहुंच गई है। क्या यह पलायन का परिणाम है या सूची की सफाई का?

राजनीतिक प्रभाव: कौन लाभ में, कौन संकट में?

SIR की कटौती का सियासी असर जिज्ञासु है। शहरी जिलों में भारी कमी से भाजपा का मध्यवर्गीय आधार प्रभावित हो सकता है, जहां वह मजबूत रही है। क्या यह 2027 विधानसभा चुनाव में चुनौती बनेगा? वहीं, ग्रामीण इलाकों में संतुलन सपा के लिए फायदेमंद हो सकता है, जहां किसान और स्थानीय वोटर उसका आधार हैं। बसपा को भी शुद्ध सूची से लाभ मिल सकता है, यदि संगठन सक्रिय हो। मुस्लिम बहुल जिलों में कटौती से सपा गठबंधन को मजबूती मिल सकती है। लेकिन क्या दावा-आपत्तियों से तस्वीर बदलेगी?

चुनाव आयोग के प्रयासों से सूची शुद्ध हो रही है, जो फर्जी वोटिंग रोककर निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करेगी। सरकार की जागरूकता अभियान से लोग नाम स्थानांतरित करा रहे हैं, जो जनता के हित में है।

SIR की सकारात्मकता: लोकतंत्र की मजबूती

जिज्ञासा के बीच सकारात्मक पक्ष यह है कि SIR से डुप्लीकेट नाम हटने से चुनाव पारदर्शी होंगे। सरकार के प्रयासों से BLO ने घर-घर जाकर सूची अपडेट की, जो जनता को लाभ पहुंचाएगा। अंतिम सूची में नाम जुड़वाने से वोटर सशक्त होंगे।

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ये भी पढ़ें: यूपी SIR ड्राफ्ट लिस्ट: 2.89 करोड़ नाम गायब, सियासत में उबाल – कौन हारेगा, कौन जीतेगा?

निष्कर्ष: नई शुरुआत या चुनौती?

SIR ड्राफ्ट सूची से हजारों वोटर गायब होना गंभीर सवाल खड़े करता है, लेकिन यह लोकतंत्र की शुद्धता का संकेत भी है। सरकार के प्रयासों से जनता को निष्पक्ष चुनाव का लाभ मिलेगा, जो विकास और विश्वास की नींव रखेगा। क्या अंतिम सूची से राजनीतिक समीकरण बदलेंगे? समय बताएगा, लेकिन यह प्रक्रिया जनहित में क्रांतिकारी साबित होगी।

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