सिद्धार्थनगर, सन्दीप पाण्डेय | वेब वार्ता
जनपद सिद्धार्थनगर के डुमरियागंज क्षेत्र में मौनी अमावस्या के अवसर पर राप्ती नदी तट स्थित परशुराम वाटिका में धर्म रक्षा मंच के तत्वाधान में आयोजित “राम राम महादंगल” में देश और नेपाल के नामी पहलवानों ने कुश्ती के दांव-पेंच दिखाए। इस दो दिवसीय आयोजन ने न सिर्फ खेल प्रेमियों को रोमांचित किया, बल्कि परंपरा, धर्म और संस्कृति के संगम का अद्भुत उदाहरण भी प्रस्तुत किया।
डीएम, एसपी और पूर्व विधायक ने किया उद्घाटन
दंगल का शुभारंभ जिलाधिकारी शिवशरणप्पा जीएन, पुलिस अधीक्षक डॉ. अभिषेक महाजन और पूर्व विधायक राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने संयुक्त रूप से विधि-विधान से पूजन व फीता काटकर किया। उद्घाटन कुश्ती में पुरुष वर्ग में काला चिता जौनपुर के राजेश पहलवान और अयोध्या के पहलवान के बीच मुकाबला हुआ, जिसमें राजेश पहलवान विजयी रहे। वहीं महिला वर्ग की पहली कुश्ती में नंदनीनगर गोंडा की शिवांगी सिंह ने राजस्थान की हिमांशु यादव को मात दी।
नेपाल सहित कई राज्यों के पहलवानों ने दिखाई ताकत
दंगल में नेपाल, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली, अयोध्या, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा और केरल जैसे राज्यों के पहलवानों ने भाग लिया। हजारों की भीड़ के बीच दर्शकों ने कुश्ती के हर दांव पर तालियों की गूंज से माहौल को जीवंत कर दिया।
- नेपाल के पंडित थापा ने काला पहलवान केरल को हराया।
- हरियाणा के सोनू पहलवान और नेपाल के लक्की थापा के बीच हुए मुकाबले में लक्की थापा विजयी रहे।
- भूटान के चिम चिम डोगरा ने प्रयागराज के देवा पहलवान को मात दी।
- गोरखपुर की नम्रता पहलवान ने बनारस की सोनम पहलवान को हराया।
- संतकबीरनगर के सर्वेश तिवारी ने उत्तर प्रदेश केसरी खिताब जीता।
दंगल में दिखी खेल भावना और सांस्कृतिक परंपरा
पूर्व विधायक राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा के बाद इस दंगल को “राम राम महादंगल” नाम दिया गया है। यह आयोजन भारतीय परंपरा, खेल और संस्कृति को जोड़ने का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि कुश्ती न सिर्फ एक खेल है, बल्कि युवाओं में अनुशासन, स्वास्थ्य और मानसिक दृढ़ता को भी बढ़ावा देती है।
निष्कर्ष: भारतीय परंपरा और खेल संस्कृति का संगम
सिद्धार्थनगर का यह दंगल भारतीय ग्रामीण खेल संस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है। धर्म रक्षा मंच के प्रयासों से यह आयोजन क्षेत्र की पहचान बन चुका है। आयोजन स्थल पर भारी भीड़, उत्साह और पहलवानों के जोश ने यह साबित कर दिया कि कुश्ती आज भी भारत की धरोहर है और इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हम सबकी है।
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