लखनऊ, अजय कुमार | वेब वार्ता
सुप्रीम कोर्ट में सामुदायिक कुत्तों से जुड़े मामले की सुनवाई अचानक समाप्त किए जाने को लेकर देशभर में पशु अधिकार कार्यकर्ताओं में असंतोष देखा जा रहा है। इसी क्रम में गुरुवार रात लखनऊ में पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की एक आपातकालीन बैठक आयोजित की गई, जिसमें न्यायालय की कार्यवाही के तरीके और आदेशों पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गईं।
बिना बैनर के स्वतः आयोजित हुई बैठक
यह बैठक 29 जनवरी 2026 की रात लगभग 8 बजे लखनऊ में आयोजित हुई, जिसमें विभिन्न पशु अधिकार संगठनों और स्वतंत्र कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। यह एक बैनर-रहित और स्वतःस्फूर्त बैठक थी, जिसका उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट द्वारा सामुदायिक कुत्तों के मामले में सुनवाई बंद किए जाने पर सामूहिक प्रतिक्रिया व्यक्त करना था।
सुनवाई प्रक्रिया पर उठे सवाल
कार्यकर्ताओं का कहना है कि न्यायालय ने पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की पुनर्विचार और समीक्षा याचिकाओं पर विचार किए बिना ही आदेशों के अनुपालन की समीक्षा शुरू कर दी और बिना जवाब या प्रत्युत्तर का अवसर दिए सुनवाई को बंद कर दिया। इससे निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों ने भी जताई आपत्ति
बैठक में बताया गया कि कई कानूनी विशेषज्ञ पहले ही आदेश के विभिन्न पहलुओं की आलोचना कर चुके हैं। विशेष रूप से सुनवाई के लिए शुल्क वसूलने की व्यवस्था को कानूनी आधारहीन बताया गया। इसके अलावा, सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियां और “सो कॉल्ड एनिमल लवर्स” जैसे शब्दों के प्रयोग को पशु कल्याण समुदाय ने अपमानजनक और अवैज्ञानिक करार दिया।
शेल्टर और पाउंड पर जबरदस्ती को लेकर चिंता
कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि न्यायालय द्वारा तत्काल शेल्टर और पाउंड बनाने पर जोर दिए जाने से यह आशंका बढ़ गई है कि उनकी याचिकाओं पर निष्पक्ष और संतुलित विचार नहीं किया गया। पशु अधिकार समूहों का मानना है कि स्थायी शेल्टर और पाउंडिंग की नीति क्रूर, अमानवीय और मौजूदा कानूनों के विरुद्ध है।
“लगातार विरोध मोड” में जाने का ऐलान
एक पशु अधिकार कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि कोई भी समाधान जिसमें स्थायी शेल्टर और पाउंडिंग शामिल हो, उन्हें स्वीकार नहीं है। उन्होंने कहा कि जब तक यह आदेश वापस नहीं लिया जाता, तब तक वे “लगातार विरोध मोड” में रहेंगे।
संविधान के तहत आलोचना का अधिकार
कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि वे सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हैं, लेकिन ऐसा कोई आदेश जो उनके अनुसार संविधान के मूल सिद्धांतों के विपरीत हो, उसकी सम्मानजनक आलोचना करना उनका मौलिक अधिकार है।
देशभर में हुए समानांतर आयोजन
बैठक में यह भी जानकारी दी गई कि लखनऊ के साथ-साथ देश के विभिन्न हिस्सों में भी इसी तरह की बैठकें आयोजित की गईं, जहां पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने सामुदायिक कुत्तों से जुड़े आदेशों पर चिंता और असहमति दर्ज कराई।
निष्कर्ष
लखनऊ में आयोजित यह आपात बैठक संकेत देती है कि सामुदायिक कुत्तों के मुद्दे पर न्यायिक आदेशों को लेकर बहस और विरोध अभी थमने वाला नहीं है। आने वाले दिनों में यह मामला कानूनी, सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण से और गहराने की संभावना है।
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