ललितपुर में ‘हिंदी साहित्य भारती’ की परिचय गोष्ठी का भव्य आयोजन — डॉ. रवींद्र शुक्ल बोले, “धर्म से निरपेक्ष होकर समाज गतिमान नहीं रह सकता”

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ललितपुर, आलोक चतुर्वेदी | वेब वार्ता

जगदीश मंदिर के पीछे तालाबपुरा में हिंदी साहित्य भारती की एक भव्य परिचय गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत सोनू बाथम द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण ध्येय गीत से हुई, जिसने वातावरण को साहित्यिक और आध्यात्मिक रंग में रंग दिया।

“हिंदी और साहित्य मां भारती की सेवा के उपकरण हैं” — डॉ. रवींद्र शुक्ल

गोष्ठी में अंतरराष्ट्रीय हिंदी साहित्य भारती के अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. रवींद्र शुक्ल ने संगठन का विस्तृत परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा — “हिंदी और साहित्य मां भारती की सेवा के उपकरण हैं। माँ भारती की सेवा वस्तुतः भारत माता की सेवा है। भारतीय ज्ञान परंपरा का समुचित अवदान आज तक रेखांकित नहीं किया गया है। भारत का नाम भारत इसलिए है क्योंकि इसके निवासी ज्ञान परंपरा में संलग्न रहे हैं, न कि ‘इंडिया दैट इज भारत’ जैसा विदेशी परिभाषा के कारण।”

“धर्मनिरपेक्षता नहीं, धर्म के पक्ष में रहना जरूरी”

डॉ. शुक्ल ने अपने विचारों में कहा कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द असंगत है। उन्होंने स्पष्ट किया — “हम धर्म से निरपेक्ष होकर नहीं रह सकते। समाज या तो धर्म के पक्ष में होता है या अधर्म के पक्ष में। धर्म से निरपेक्ष होकर समाज गतिमान नहीं रह सकता। भारत की परंपरा मानवता का स्वागत करती है, किंतु दानवता का दलन करना भी उसी परंपरा का हिस्सा है।”

36 देशों में सक्रिय है हिंदी साहित्य भारती

डॉ. शुक्ल ने बताया कि हिंदी साहित्य भारती वर्तमान में 36 देशों में सक्रिय है और भारत के अधिकांश राज्यों में इसका संगठन कार्यरत है। उन्होंने कहा कि संगठन की स्थापना को मात्र छह वर्ष हुए हैं, लेकिन इसने अल्प समय में ही वैश्विक स्तर पर हिंदी साहित्य की पहचान स्थापित की है।

साहित्यकारों और विद्वानों की रही उपस्थिति

गोष्ठी में पं. बाबूलाल द्विवेदी मुख्य अतिथि, जबकि अखिलेश मालवीय और विनोद शर्मा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी साहित्य भारती के जिला अध्यक्ष गगन चतुर्वेदी ने की, जिन्होंने संगठन की आगामी कार्यकारिणी की रूपरेखा प्रस्तुत की।

कार्यक्रम का संचालन अच्युत अवस्थी ने किया और आभार ज्ञापन राकेश नारायण द्विवेदी ने किया। सुदामा पाठक ने संगठन के पदाधिकारियों की सूची का वाचन किया। प्रदीप मोदी ने अतिथियों का माल्यार्पण कर स्वागत किया।

प्रश्नोत्तर सत्र में डॉ. शुक्ल से मिले जवाब

कार्यक्रम में नगर के अनेक साहित्यप्रेमी, शिक्षाविद और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे। मुक्ता सोनी, इंजीनियर हाकिम सिंह, करुणाकर शर्मा, राजेंद्र प्रकाश, सुबोध सारस्वत, डॉ. जगवीर सिंह, डॉ. विशाल जैन, डॉ. मधुरेंद्र सहित दर्जनों लोगों ने डॉ. शुक्ल से अपने प्रश्न पूछे, जिनका उन्होंने विस्तार से उत्तर दिया।

इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय हिंदी साहित्य भारती के नवीन दायित्वधारियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए।

  • डॉ. रवींद्र शुक्ल ने कहा — “धर्म से निरपेक्ष होकर समाज आगे नहीं बढ़ सकता।”
  • संगठन अब 36 देशों में कार्यरत, छह वर्ष में वैश्विक पहचान।
  • गोष्ठी में साहित्यकारों, शिक्षकों और बुद्धिजीवियों ने लिया सक्रिय भाग।
  • नवीन पदाधिकारियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए।

कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने एक स्वर में कहा कि हिंदी साहित्य भारती के माध्यम से हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के संरक्षण की दिशा में यह प्रयास ऐतिहासिक सिद्ध होगा।

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