कछौना (हरदोई), लक्ष्मीकांत पाठक | वेब वार्ता
हरदोई जिले के विकासखंड कछौना अंतर्गत ग्राम सभा टिकारी के ग्राम तुसौरा में रहने वाला एक दिव्यांग दंपति वर्षों से जीवन की कठिनाइयों से जूझ रहा था। पति-पत्नी दोनों दिव्यांग हैं और उनके पास आजीविका का कोई स्थायी साधन नहीं था। सरकारी योजनाओं से उम्मीद लगाने के बावजूद उन्हें केवल निराशा ही हाथ लगी, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता प्रियंका सिंह की पहल ने उनके जीवन में नई रोशनी भर दी।
संघर्षों में घिरा था दिव्यांग दंपति का जीवन
वर्षों से यह दंपति दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा था। दिव्यांगता के कारण नियमित रोजगार संभव नहीं था, वहीं सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर भी उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। हालात ऐसे हो गए थे कि आत्मनिर्भर बनने की हर कोशिश असफल साबित हो रही थी।
महिला उषा ने प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत सिलाई मशीन के लिए आवेदन किया, लेकिन लंबी प्रक्रिया और जमीनी स्तर पर लापरवाही के कारण उन्हें कोई लाभ नहीं मिल सका।
सरकारी योजनाओं से नहीं मिला लाभ
| विवरण | स्थिति |
|---|---|
| योजना आवेदन | पीएम विश्वकर्मा योजना |
| लाभ प्राप्त | नहीं |
| रोजगार साधन | कोई स्थायी व्यवस्था नहीं |
| आर्थिक स्थिति | अत्यंत कमजोर |
- कई योजनाओं के बावजूद नहीं मिला वास्तविक लाभ
- आवेदन प्रक्रिया में रही लापरवाही
- परिवार आर्थिक संकट से जूझता रहा
जन सरोकार मंच के माध्यम से पहुंची आवाज
अपनी पीड़ा से परेशान दंपति ने जन सरोकार मंच के समक्ष अपनी व्यथा रखी। मंच के माध्यम से यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता प्रियंका सिंह तक पहुंचा। स्थिति की गंभीरता समझते हुए उन्होंने बिना किसी औपचारिकता के तुरंत सहायता का निर्णय लिया।
सिलाई मशीन बनी आत्मनिर्भरता की राह
मंगलवार को प्रियंका सिंह ने अपने निजी संसाधनों से दिव्यांग महिला उषा को सिलाई मशीन भेंट की। मशीन पाकर उषा की आंखों में खुशी और उम्मीद के आंसू छलक पड़े। वर्षों बाद उन्हें लगा कि अब वे अपने श्रम से परिवार का सहारा बन सकेंगी।
यह सिलाई मशीन केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि उनके लिए सम्मान, स्वाभिमान और नए जीवन की शुरुआत बन गई।
परिवार और ग्रामीणों ने जताया आभार
दंपति और उनके परिजनों ने प्रियंका सिंह के इस मानवीय प्रयास के लिए हृदय से आभार व्यक्त किया। ग्रामीणों ने भी इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रयास समाज में संवेदनशीलता और सहयोग की भावना को मजबूत करते हैं।
यह घटना उन अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के लिए भी एक सवाल बनकर सामने आई है, जो योजनाओं के नाम पर केवल आंकड़ों तक सीमित रहते हैं।
निष्कर्ष
यह मामला दर्शाता है कि जब सरकारी योजनाएं कागजों तक सीमित रह जाती हैं, तब संवेदनशील व्यक्ति ही जरूरतमंदों के लिए आशा की किरण बनते हैं। प्रियंका सिंह की यह पहल साबित करती है कि सच्ची संवेदनशीलता और छोटी-सी मदद भी किसी की पूरी जिंदगी बदल सकती है।
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