शाहाबाद क्षेत्र के गाँव गुजीदेई से होली की पारम्परिक मिठाई गुझिआ का शुभारंभ, लोकविश्वास और इतिहास बना शोध का विषय

हरदोई, लक्ष्मीकांत पाठक | वेब वार्ता

शाहाबाद क्षेत्र के गाँव गुजीदेई से होली की पारम्परिक मिठाई गुझिआ का शुभारंभ होने की लोकमान्यता एक बार फिर चर्चा में है। जनपद हरदोई की तहसील शाहाबाद के ग्रामीण अंचल में प्रचलित मान्यता के अनुसार होली के अवसर पर गुझिआ चढ़ाने की परंपरा की शुरुआत यहीं से मानी जाती है। रंग और आस्था के इस पर्व पर जब घर-घर में गुझिआ बनती है, तब यह प्रश्न भी उठता है कि इस परंपरा का उद्गम कहाँ से हुआ, किस ऐतिहासिक या लोकसांस्कृतिक आधार पर यह विकसित हुई और कैसे पीढ़ियों से जीवित बनी रही। यही कारण है कि शाहाबाद क्षेत्र के गाँव गुजीदेई से होली की पारम्परिक मिठाई गुझिआ का शुभारंभ आज इतिहास, लोकविश्वास और सांस्कृतिक अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय बन गया है।

शाहाबाद क्षेत्र के गाँव गुजीदेई से होली की पारम्परिक मिठाई गुझिआ का शुभारंभ: लोककथा की पृष्ठभूमि

ग्रामीणों के अनुसार, गुजीदेई गाँव का नाम प्राचीन लोकनायक गजुआ दानव से जुड़ा है। मान्यता है कि गजुआ दानव अपने दो भाइयों के साथ इस क्षेत्र में निवास करते थे और समय के साथ लोकदेवता के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। उनकी स्मृति में स्थापित स्थलों पर आज भी श्रद्धालु आस्था अर्पित करते हैं। इसी लोकपरंपरा से शाहाबाद क्षेत्र के गाँव गुजीदेई से होली की पारम्परिक मिठाई गुझिआ का शुभारंभ की कथा जुड़ी मानी जाती है।

ग्राम पंचायत परेली के मजरा कुर्सेली में स्थित गजुआ दानव का स्थान ग्रामीण आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहाँ प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल तृतीया को भव्य मेला आयोजित होता है, जिसे क्षेत्र का प्राचीनतम मेला माना जाता है। लगभग 88 वर्षीय टीकाराम और बलराम पुत्र लोचन जैसे बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।

गहनहा बाबा, ककरहा बाबा और अर्पण की परंपरा

परेली गाँव में भगेल नाला के किनारे स्थित गहनहा बाबा का स्थान तथा मुरीदापुर में ककरहा बाबा का स्थल भी लोकश्रद्धा के केंद्र हैं। मुरीदापुर निवासी 91 वर्षीय वालेश्वर अग्निहोत्री के अनुसार, होली पर नया और पुराना अन्न मिलाकर गुझिआ बनाई जाती थी। सबसे पहले यह गुझिआ होलिका दहन से पूर्व पूजा में अर्पित की जाती, तत्पश्चात ही घरों में गुझिआ बनाने की प्रक्रिया शुरू होती थी।

  • नए और पुराने अन्न का मिश्रण
  • होलिका दहन से पूर्व प्रथम अर्पण
  • चैत्र और आषाढ़ पूर्णिमा पर गुलगुला चढ़ाने की परंपरा
  • सामुदायिक सहभागिता और सामूहिक आस्था
स्थलपरंपरासांस्कृतिक महत्व
कुर्सेली (गजुआ दानव)चैत्र शुक्ल तृतीया मेलालोकदेवता की स्मृति और सामूहिक आस्था
गहनहा बाबाहोलिका पूर्व अर्पणकृषि चक्र से जुड़ा धार्मिक अनुष्ठान
ककरहा बाबानव-अन्न के साथ गुझिआ चढ़ानाफसल और कृतज्ञता का प्रतीक

प्राचीन खेड़ा और ऐतिहासिक संकेत

स्थानीय बुजुर्ग राही गाँव के प्राचीन खेड़े को दानव किले के अवशेष के रूप में देखते हैं। यद्यपि इसके प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, किंतु यह लोकविश्वास इस क्षेत्र में दानव-परंपरा की गहरी सांस्कृतिक जड़ों की ओर संकेत करता है। इतिहास में ‘दानव’ शब्द कई बार प्राचीन जनजातीय समुदायों के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। संभव है कि गजुआ दानव की कथा किसी ऐतिहासिक लोकनायक या समुदाय की स्मृति का रूपांतरण हो।

शाही रसोई से लोकपरंपरा तक गुझिआ

कुछ इतिहासकार गुझिआ की लोकप्रियता को मध्यकालीन और मुगलकालीन शाही रसोई से जोड़ते हैं। मेवे और मावा से भरा यह पकवान विशेष अवसरों पर परोसा जाता था और धीरे-धीरे जनजीवन में रच-बस गया। हालांकि इस संदर्भ में ठोस प्रमाण सीमित हैं, फिर भी यह स्पष्ट है कि शाहाबाद क्षेत्र के गाँव गुजीदेई से होली की पारम्परिक मिठाई गुझिआ का शुभारंभ की जनश्रुति ने इसे धार्मिक और सांस्कृतिक आयाम प्रदान किया।

सांस्कृतिक विरासत और जनजीवन पर प्रभाव

गुझिआ यहाँ केवल एक मिष्ठान नहीं, बल्कि लोकआस्था, कृषि-परंपरा और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। होलिका दहन से पूर्व अर्पण की परंपरा नए अन्न के स्वागत और पूर्वजों की स्मृति का उत्सव है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस परंपरा का विधिवत दस्तावेजीकरण किया जाए, तो यह क्षेत्रीय इतिहास, सांस्कृतिक पर्यटन और ग्रामीण पहचान को नई दिशा दे सकता है।

भले ही ऐतिहासिक प्रमाण अभी शोध की प्रतीक्षा में हों, किंतु शाहाबाद क्षेत्र के गाँव गुजीदेई से होली की पारम्परिक मिठाई गुझिआ का शुभारंभ की मान्यता लोकमानस में आज भी जीवंत है। यह कथा इस तथ्य का प्रमाण है कि भारत के ग्रामीण अंचलों में परंपराएँ केवल निभाई नहीं जातीं, बल्कि उन्हें जिया जाता है।

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