ललितपुर, आलोक चतुर्वेदी | वेब वार्ता
उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में बेतवा नदी के तट पर स्थित ऐतिहासिक देवगढ़ केवल पत्थरों का शहर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और आस्था का जीवंत दस्तावेज है। इसे ‘बेत्त्रवती की गोद’ कहा जाता है। यहां स्थित प्राचीन मंदिरों में भगवान विष्णु के नृवराह स्वरूप को क्षेत्र की समृद्धि और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता था।
किंतु तीन दशक पूर्व हुई एक क्रूरतम घटना ने देवगढ़ की आत्मा को ही उसके मूल स्थान से अलग कर दिया। आज वह मूर्ति, जिसके लिए जनता ने आंदोलन किया और न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, पुरातत्व विभाग के मालखाने में धूल फांकने को विवश है।
वह काली रात, जब देवगढ़ लूट लिया गया
यह घटना 26–27 सितंबर 1990 की मध्यरात्रि की है, जब अंतरराष्ट्रीय मूर्ति तस्करों के एक गिरोह ने घने जंगलों के बीच स्थित प्राचीन नृवराह मंदिर को निशाना बनाया। तस्करों ने तीन दिनों तक जंगल में डेरा डालकर मूर्ति को काटने और उखाड़ने की योजना बनाई।
मूर्ति अत्यंत विशाल और भारी थी, जिसे बिना आधुनिक मशीनों के हटाना संभव नहीं था। अंततः उसे तीन भागों में काटकर ट्रक के माध्यम से जिले की सीमा पार ले जाने का प्रयास किया गया।
सुबह मिली खबर, पूरे जिले में मचा कोहराम
जब अगली सुबह श्रद्धालु मंदिर पहुंचे, तो गर्भगृह सूना था। भगवान नृवराह अपने स्थान से गायब थे। यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई और पूरे ललितपुर में आक्रोश फैल गया।
पुरातत्व विभाग की लापरवाही के खिलाफ जनता सड़कों पर उतर आई। बाजार बंद हुए और विरोध प्रदर्शन तेज हो गया।
आमरण अनशन और जनआंदोलन
ललितपुर के ऐतिहासिक घंटाघर प्रांगण में वरिष्ठ पत्रकार संतोष शर्मा और लेखक राजीव श्रीवास्तव के नेतृत्व में आमरण अनशन शुरू हुआ। समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और आम नागरिकों ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया।
यह आंदोलन इतना व्यापक हुआ कि शासन-प्रशासन को तत्काल कार्रवाई के लिए मजबूर होना पड़ा।
पुलिस की कार्रवाई और मूर्ति की बरामदगी
तत्कालीन एसपी वी.के. बाजपेयी के नेतृत्व में पुलिस ने व्यापक घेराबंदी की। स्थानीय चरवाहों और मुखबिरों की सूचना पर अक्टूबर 1990 के प्रथम सप्ताह में मूर्ति के टुकड़े बरामद कर लिए गए।
इस मामले में अमर सिंह, राजाराम और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार किया गया।
अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क का खुलासा
जांच में अलीगढ़ के कुख्यात तस्कर शैतान सिंह का नाम मुख्य सूत्रधार के रूप में सामने आया। उसका नेटवर्क नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते मूर्तियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाता था।
उस समय इस 1400 वर्ष पुरानी मूर्ति की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगभग पांच करोड़ रुपये आंकी गई थी।
न्याय का ऐतिहासिक फैसला
इस मामले की सुनवाई अपर सत्र न्यायाधीश विष्णु दत्त द्विवेदी की अदालत में हुई। उन्होंने मूर्ति चोरी को केवल संपत्ति का अपराध नहीं, बल्कि “सांस्कृतिक डकैती” करार दिया।
अदालत ने अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जो देश में इस प्रकार का पहला ऐतिहासिक निर्णय माना जाता है।
एएसआई की बेरुखी और धूल फांकती विरासत
विडंबना यह है कि इतनी बड़ी लड़ाई और न्यायिक विजय के बावजूद आज भगवान नृवराह की प्रतिमा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संग्रहालयों और मालखानों में उपेक्षित पड़ी है।
उचित रखरखाव और प्रदर्शन के अभाव में यह अनमोल धरोहर अपनी चमक खो रही है।
सूना पड़ा मंदिर और टूटता विश्वास
देवगढ़ का वह मंदिर, जहां कभी भगवान नृवराह विराजते थे, आज वीरान खंडहर बन चुका है। वहां केवल एक ऊंचा चबूतरा और खामोशी बची है।
श्रद्धालुओं का मानना है कि सुरक्षा के नाम पर भगवान को उनके ही धाम से दूर रखना न्यायसंगत नहीं है।
कब लौटेंगे भगवान नृवराह?
ललितपुर की जनता मांग कर रही है कि आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था जैसे सीसीटीवी, बुलेटप्रूफ कक्ष और सशस्त्र गार्ड की व्यवस्था कर भगवान नृवराह को पुनः उनके मूल स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाए।
जब तक यह प्रतिमा अपने मंदिर में वापस नहीं आती, तब तक देवगढ़ की सांस्कृतिक पुनर्स्थापना अधूरी रहेगी।
निष्कर्ष
भगवान नृवराह की वापसी केवल एक मूर्ति की पुनर्स्थापना नहीं, बल्कि ललितपुर के गौरव, आस्था और सांस्कृतिक अस्मिता की पुनर्बहाली है। यह मामला प्रशासन, पुरातत्व विभाग और समाज—तीनों के लिए आत्ममंथन का विषय है।
जब तक भगवान अपने धाम में वापस नहीं लौटते, तब तक देवगढ़ की आत्मा निर्वासित ही रहेगी।
लेखक: राजीव श्रीवास्तव
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