उत्तराखंड में फिर टूटी प्रकृति की मार: उत्तरकाशी में बादल फटने से प्राचीन कल्प केदार शिव मंदिर मलबे में दबा

उत्तरकाशी, (वेब वार्ता)। उत्तराखंड की धरती एक बार फिर प्राकृतिक आपदा का शिकार बनी है। उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में मंगलवार को बादल फटने की घटना ने भारी तबाही मचाई, जिसमें खीरगंगा नदी में आई बाढ़ से सैकड़ों वर्षों पुराना कल्प केदार शिव मंदिर मलबे में दब गया।

📍 कल्प केदार मंदिर: इतिहास और आध्यात्म का अद्भुत संगम

कल्प केदार शिव मंदिर एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, जिसकी वास्तुकला केदारनाथ धाम के समान है। यह मंदिर कतुरे शैली में बना हुआ था और इसका शिवलिंग नंदी की पीठ के आकार जैसा था — ठीक वैसा ही जैसा केदारनाथ मंदिर में देखा जाता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, यह मंदिर पहले भी किसी पुरानी आपदा के कारण कई वर्षों तक जमीन के भीतर दबा रहा था, और केवल ऊपरी भाग ही नजर आता था। वर्ष 1945 में की गई खुदाई के दौरान इस मंदिर की संरचना फिर से सामने आई थी। खुदाई में मंदिर की पूरी संरचना मिलने के बाद इसे फिर से पूजा स्थल के रूप में उपयोग में लाया गया।

🕉️ मंदिर की अनूठी विशेषताएँ

  • मंदिर जमीन के भीतर स्थित था, जहां भक्तों को नीचे उतरकर गर्भगृह में शिवलिंग के दर्शन करने होते थे।

  • कहा जाता है कि खीरगंगा नदी का पानी अक्सर शिवलिंग तक पहुंचता था, जिसके लिए एक विशेष जल निकासी मार्ग भी बनाया गया था।

  • मंदिर के बाहरी हिस्से में सुंदर पत्थर की नक्काशी मौजूद थी, जो इसकी ऐतिहासिकता को दर्शाती थी।

🌊 बादल फटने से आई आपदा

बादल फटने की घटना ने पूरे धराली क्षेत्र को हिला कर रख दिया है। खीरगंगा नदी में अचानक आई बाढ़ ने इस मंदिर को एक बार फिर मिट्टी और मलबे में दबा दिया है। ग्रामीणों और स्थानीय प्रशासन ने मंदिर को बचाने की काफी कोशिश की, लेकिन तेज बहाव और मलबे के कारण बचाव कार्य मुश्किल हो गया।

🕵️ प्रशासन और पुरातत्व विभाग की प्रतिक्रिया

उत्तरकाशी प्रशासन के अनुसार, मलबा हटाने और मंदिर को पुनः खोजने के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। राज्य पुरातत्व विभाग भी इस घटना को गंभीरता से ले रहा है और जल्द ही स्थल का सर्वेक्षण व पुनर्निर्माण योजना की घोषणा की जा सकती है।

🙏 स्थानीय श्रद्धालुओं में शोक

धराली गांव और आसपास के क्षेत्रों के लोगों में इस घटना को लेकर गहरा शोक और पीड़ा है। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र था, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान भी था।

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