बीज राखी अभियान: हरिद्वार में बालिकाओं को मिला प्रकृति और भाईचारे का संदेश

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हरिद्वार, (वेब वार्ता) – रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक पर्व को पर्यावरणीय चेतना से जोड़ते हुए हरिद्वार आयुष विभाग ने शुक्रवार को एक अनूठी पहल शुरू की। “सेट आधारित राज्य” योजना के अंतर्गत (सीड) बीज राखी कार्यक्रम का आयोजन जिले के चयनित आयुष्मान आरोग्य मंदिरों पर किया गया।

इस पहल के तहत बालिकाओं को बीज युक्त राखियां प्रदान की गईं, जिनमें नीम, तुलसी, सहजन, अमरूद जैसे औषधीय और पर्यावरणीय महत्व वाले पौधों के बीज शामिल थे। इन राखियों को भाई की कलाई पर बांधने के बाद मिट्टी में बोया जा सकता है, जिससे कुछ दिनों में पौधा अंकुरित होकर जीवनदायी वृक्ष का रूप ले लेता है।


📌 कार्यक्रम का उद्देश्य

जिला आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी डॉ. स्वास्तिक सुरेश ने बताया कि यह सिर्फ राखी नहीं, बल्कि धरती मां के प्रति जिम्मेदारी का भी प्रतीक है। उन्होंने कहा:

“हम चाहते हैं कि हर बालिका न केवल भाई के प्रति प्रेम व्यक्त करे, बल्कि एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल भी करे। इससे न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण होगा, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ाव भी बढ़ेगा।”


👩‍⚕️ आयोजकों और विशेषज्ञों की भूमिका

इस कार्यक्रम का संचालन विभिन्न स्थलों पर डॉ. नवीन दास, डॉ. वीरेंद्र सिंह रावत, डॉ. विक्रम रावत, डॉ. फराज़ खान, डॉ. भास्कर आनंद, डॉ. पूजा राय और मनीषा चौहान के मार्गदर्शन में किया गया।
राज्य आयुष मिशन के विशेषज्ञ डॉ. अवनीश उपाध्याय ने कहा:

“पर्यावरणीय संकट के इस दौर में ऐसे प्रयास सिर्फ प्रतीकात्मक न रहकर, व्यवहारिक समाधान का हिस्सा बन सकते हैं। यह आयुष दर्शन और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप है।”


🌱 बच्चियों का उत्साह

कार्यक्रम में शामिल छात्राओं ने बीज राखियां पाकर खुशी जताई और पौधा लगाने व उसकी देखभाल करने की शपथ ली।
उनका कहना था कि यह पहल उन्हें रक्षाबंधन का एक नया, हरित और जीवनदायी रूप दिखाती है।


📊 पर्यावरण और समाज पर असर

  • पर्यावरणीय लाभ: पेड़ लगाने से कार्बन डाइऑक्साइड में कमी, ऑक्सीजन की वृद्धि और जलवायु सुधार।

  • सामाजिक संदेश: भाई-बहन के रिश्ते में प्रकृति संरक्षण का भाव जोड़ना।

  • सतत विकास: स्थानीय समुदाय में पर्यावरण शिक्षा और भागीदारी को प्रोत्साहन।


🌟 निष्कर्ष

सीड राखी कार्यक्रम इस बात का प्रमाण है कि भारतीय परंपराएं समय के साथ बदलकर सकारात्मक सामाजिक बदलाव ला सकती हैं।
हरिद्वार आयुष विभाग की यह पहल दिखाती है कि पारंपरिक त्योहारों को सतत विकास के साथ जोड़ा जा सकता है, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित विरासत तैयार हो सके।

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