Wednesday, February 11, 2026
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रौन थाने में पुलिस की शर्मनाक बर्बरता: शराब के नशे में मजदूरों की पिटाई, जातिसूचक गालियां, जांच की मांग

 भिंड / ग्वालियर, मुकेश शर्मा | वेब वार्ता

मेहगांव विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत थाना रौन में पदस्थ प्रधान आरक्षक मनीष सिंह कुशवाह पर शराब के नशे में दो मजदूरों के साथ मारपीट, जातिसूचक गालियां देने और अवैध वसूली का गंभीर आरोप लगा है। पीड़ित मजदूरों ने इसी थाने में शिकायत दर्ज कराकर न्याय की गुहार लगाई है। यह मामला पुलिस की कार्यप्रणाली और संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

नल-जल योजना के मजदूरों पर किया हमला

घटना रात लगभग 11:10 बजे की है, जब रौन कस्बे में बजाज एजेंसी के सामने जन नल-जल योजना के तहत पाइपलाइन बिछाने का कार्य चल रहा था। मजदूर दीपक बामनिया और राहुल बामनिया कार्य में लगे थे। इसी दौरान प्रधान आरक्षक अपने चार सहयोगियों के साथ मौके पर पहुंचे और कथित रूप से नशे की हालत में मजदूरों से दुर्व्यवहार शुरू कर दिया।

जातिसूचक गालियां और बंदूक के बट से पिटाई

पीड़ितों के अनुसार पुलिसकर्मियों ने पहले जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया और विरोध करने पर बंदूकों के बटों से बेरहमी से पिटाई की। साथ ही शराब के लिए जबरन पैसे मांगे गए। पैसे न देने पर मारपीट और तेज कर दी गई।

बिंदुविवरण
स्थानथाना रौन, भिंड
समयरात लगभग 11:10 बजे
पीड़ितदीपक बामनिया, राहुल बामनिया
आरोपीप्रधान आरक्षक मनीष सिंह कुशवाह
आरोपनशे में मारपीट, गाली-गलौज, वसूली

थाने में ही दिया गया शिकायती आवेदन

पीड़ित मजदूरों ने थाना प्रभारी को लिखित आवेदन देकर पूरी घटना का विवरण दिया है। उन्होंने बताया कि पुलिसकर्मियों का व्यवहार अत्यंत आक्रामक था और उन्हें शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। मजदूरों के शरीर पर चोटों के निशान मौजूद हैं, जो घटना की पुष्टि करते हैं।

  • नशे में ड्यूटी करने का आरोप
  • जातिगत अपमान का मामला
  • अवैध वसूली की कोशिश
  • विभागीय कार्रवाई की मांग

जन नल-जल योजना पर भी उठे सवाल

यह घटना केंद्र सरकार की जन नल-जल योजना की कार्यप्रणाली और जमीनी हालात पर भी सवाल खड़े करती है। योजना का उद्देश्य ग्रामीणों को स्वच्छ जल उपलब्ध कराना है, लेकिन इसमें कार्यरत मजदूरों के साथ ऐसा व्यवहार बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

पुलिस सुधार और जवाबदेही की जरूरत

नशे में ड्यूटी करना, मारपीट करना और जबरन वसूली विभागीय नियमों का गंभीर उल्लंघन है। ऐसी घटनाएं आम जनता में पुलिस के प्रति अविश्वास पैदा करती हैं। स्थानीय प्रशासन और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई आवश्यक है।

निष्कर्ष

रौन थाने की यह घटना केवल दो मजदूरों के साथ हुई ज्यादती नहीं, बल्कि व्यवस्था की खामियों का प्रतीक है। पुलिस को जनता का रक्षक बनकर कार्य करना चाहिए, न कि उत्पीड़क बनकर। पीड़ितों को न्याय दिलाना और दोषियों पर कठोर कार्रवाई करना ही इस मामले का एकमात्र समाधान है।

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