म.प्र. हाउसिंग बोर्ड में नियुक्ति व कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, जाति प्रमाण और प्रशासनिक संरक्षण को लेकर विवाद

भोपाल, मुकेश शर्मा | वेब वार्ता

मध्यप्रदेश गृह निर्माण एवं अधोसंरचना विकास मंडल यानी म.प्र. हाउसिंग बोर्ड में एक वरिष्ठ कर्मचारी की नियुक्ति, जाति प्रमाण और प्रशासनिक संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोपों के अनुसार स्थापना शाखा में कार्यरत उमाकांत बाथम की श्रेणी को लेकर विभाग में लंबे समय से चर्चा चल रही है, जिसे लेकर अब मामला सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है।

क्या है पूरा विवाद

सूत्रों के मुताबिक, उमाकांत बाथम ने हाउसिंग बोर्ड में वर्ष 1996 में नियुक्ति प्राप्त की थी। आरोप है कि उन्होंने अनुसूचित जनजाति (एसटी) कोटे के अंतर्गत नौकरी हासिल की, जबकि उनकी पारिवारिक आईडी में जाति बाथम (ओबीसी वर्ग) दर्ज बताई जा रही है।

इसी आधार पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि नियुक्ति के समय प्रस्तुत दस्तावेज सही थे या बाद में बनाए गए रिकॉर्ड में बदलाव हुआ। इस विषय को लेकर विभागीय स्तर पर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

नियुक्ति और दस्तावेजों से जुड़ी जानकारी

विवरणजानकारीटिप्पणी
नियुक्ति वर्ष1996हाउसिंग बोर्ड में भर्ती
परिवार आईडी2011-12 के बादबाद में निर्मित
भर्ती सूची में श्रेणीएसटीआरोपों का आधार

विभागीय दस्तावेजों और पारिवारिक रिकॉर्ड के बीच कथित अंतर को लेकर जांच की मांग उठ रही है। कर्मचारियों का कहना है कि यह मामला पारदर्शिता और नियमों के पालन से जुड़ा है।

प्रशासनिक संरक्षण के आरोप

आरोप है कि मुख्य प्रशासनिक अधिकारी तृप्ति श्रीवास्तव और मंत्री कार्यालय से जुड़े अधिकारियों का संरक्षण मिलने के कारण संबंधित कर्मचारी वर्षों से एक ही महत्वपूर्ण पद पर बना हुआ है।

सूत्रों के अनुसार, बोर्ड में पदस्थापना और प्रशासनिक फैसलों में पारदर्शिता की कमी को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

  • लंबे समय से एक ही पद पर तैनाती का आरोप
  • प्रशासनिक नियमों के उल्लंघन की शिकायतें
  • वरिष्ठ अधिकारियों पर संरक्षण देने के आरोप
  • आंतरिक लेनदेन को लेकर भी सवाल

पक्षकारों का पक्ष

उमाकांत बाथम का कहना है कि वे पहले एसटी वर्ग में आते थे और बाद में सरकार ने उन्हें ओबीसी वर्ग में शामिल किया। वहीं, तृप्ति श्रीवास्तव ने इस विषय को निजी मामला बताते हुए टिप्पणी से इनकार किया है।

भोपाल कलेक्टर ने कहा है कि यदि संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए जाते हैं, तो उनकी जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

हाउसिंग बोर्ड में कार्यप्रणाली पर सवाल

कर्मचारियों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि हाउसिंग बोर्ड में कई पदों पर अधिकारी वर्षों से जमे हुए हैं, जबकि नियमों के अनुसार अधिकतम तीन वर्ष तक ही एक पद पर तैनाती होनी चाहिए।

इसी कारण विभाग में भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और प्रशासनिक दबाव की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।

निष्कर्ष

म.प्र. हाउसिंग बोर्ड से जुड़ा यह मामला नियुक्ति प्रक्रिया, प्रशासनिक पारदर्शिता और नियमों के पालन से जुड़ा हुआ है। आरोपों और जवाबों के बीच स्थिति स्पष्ट करने के लिए निष्पक्ष जांच आवश्यक मानी जा रही है। अब सबकी नजरें प्रशासन द्वारा संभावित जांच और आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं।

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