ग्वालियर/मुरैना, मुकेश शर्मा | वेब वार्ता
क्या एक कर्मठ और संवेदनशील डॉक्टर होना आज के दौर में अपराध बन गया है? क्या अपनी जेब से ₹15 लाख की मशीन दान कर मरीजों की सेवा करना स्वास्थ्य तंत्र को रास नहीं आता? जिला चिकित्सालय मुरैना में चल रहा विवाद अब पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र हैं – डॉ. शरद शर्मा, जो अपने समर्पण और कार्यनिष्ठा के लिए जाने जाते हैं।
ईगो क्लैश या प्रशासनिक अव्यवस्था?
मामला तब सामने आया जब मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) मुरैना ने 1 जनवरी 2026 को आदेश क्रमांक 58 जारी कर डॉ. शरद शर्मा को जिला चिकित्सालय में जॉइन करने का निर्देश दिया। लेकिन जब वे जॉइनिंग लेटर लेकर अस्पताल पहुंचे, तो सिविल सर्जन ने उन्हें “व्यक्तिगत कारणों” से जॉइन नहीं करने दिया। यह तब हुआ जब अस्पताल में दो सर्जनों के रिटायर होने के बाद विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। सवाल यह उठता है कि क्या किसी अधिकारी का ‘ईगो’ मरीजों की जिंदगी से बड़ा हो गया है?
सेवा का उदाहरण: अपनी मशीन दान कर किए सैकड़ों सफल ऑपरेशन
डॉ. शरद शर्मा ने ₹15 लाख की निजी सर्जिकल मशीन सरकारी अस्पताल को दान की थी, जिससे आयुष्मान भारत योजना के तहत सैकड़ों सफल ऑपरेशन किए गए। उन्होंने सबलगढ़ जैसे दूरस्थ क्षेत्र में पहली बार सिजेरियन ऑपरेशन की शुरुआत की, जिससे अनगिनत जरूरतमंद महिलाओं को जीवन मिला। कोविड-19 महामारी के दौरान उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना सेवा दी – उनके कार्यक्षेत्र में एक भी मौत दर्ज नहीं हुई। उन्होंने मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना के तहत 1100 बुजुर्गों की सुरक्षित सेवा भी सुनिश्चित की।
अनुभवी डॉक्टर की उपेक्षा, जूनियर को प्राथमिकता?
15 वर्षों की सेवा और 6 साल पहले पीजी सर्जरी पूरा करने के बावजूद डॉ. शर्मा को आज तक ‘क्लास-1 सर्जिकल स्पेशलिस्ट’ का दर्जा नहीं दिया गया है। वहीं मेडिकल कॉलेज से पास हुए जूनियर डॉक्टरों को तुरंत ‘विशेषज्ञ’ का दर्जा और उच्च वेतनमान मिल रहा है। इस दोहरी नीति से न केवल समर्पित चिकित्सक हताश हो रहे हैं, बल्कि मरीजों की फॉलो-अप चिकित्सा भी प्रभावित हो रही है। सवाल यह भी उठता है कि अगर किसी मरीज की स्थिति ऑपरेशन के बाद बिगड़ती है, तो जिम्मेदारी कौन लेगा — वह सिविल सर्जन जो जॉइनिंग नहीं दे रहे, या प्रशासन जो चुप है?
न्याय की गुहार उपमुख्यमंत्री से
निराश होकर डॉ. शरद शर्मा ने उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला को पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई है। उन्होंने मांग की है कि उन्हें जिला मुख्यालय पर स्थायी पदस्थापना दी जाए और 15 वर्षों की सेवा का सम्मान करते हुए क्लास-1 विशेषज्ञ का दर्जा प्रदान किया जाए। डॉक्टर का कहना है कि उनका संघर्ष केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन गरीब मरीजों के लिए है जो महंगे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज नहीं करा सकते।
- डॉ. शरद शर्मा ने ₹15 लाख की निजी मशीन दान की थी।
- आयुष्मान योजना के तहत सैकड़ों सफल ऑपरेशन किए।
- सबलगढ़ में पहली बार सिजेरियन ऑपरेशन शुरू किए।
- जॉइनिंग रोकने से जिला अस्पताल में मरीजों की परेशानी बढ़ी।
यदि डॉ. शरद शर्मा जैसे समर्पित चिकित्सक प्रशासनिक तानाशाही और मानसिक उत्पीड़न से तंग आकर सरकारी सेवा छोड़ देते हैं, तो यह हार न सिर्फ एक डॉक्टर की होगी, बल्कि उस मुरैना की जनता की भी होगी जो अब तक उनके अनुभव और सेवा से लाभान्वित होती रही है।
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