Saturday, January 17, 2026
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सीमा पर शहादत और बंद दरवाज़ों की कूटनीति: चीन से बैठकों पर अर्पित मुदगल के तीखे सवाल

ग्वालियर, मुकेश शर्मा | वेब वार्ता

भारत-चीन सीमा पर लगातार बढ़ते तनाव और सैनिकों की शहादत के बीच चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के साथ भारतीय राजनीतिक दलों की बैठकों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। भारत-तिब्बत सहयोग मंच युवा विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष अर्पित मुदगल ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी—दोनों पर निशाना साधते हुए कहा कि जब देश की सीमाएं संकट में हैं, तब चीन के साथ गुप्त या बंद-दरवाज़े बैठकों का औचित्य क्या है?

सीमाएं केवल रेखाएं नहीं, अस्मिता का प्रश्न

अर्पित मुदगल ने कहा कि भारत की सीमाएं केवल नक्शे पर खींची गई रेखाएं नहीं हैं, बल्कि यह देश की अस्मिता, स्वतंत्रता और भविष्य की रक्षा की दीवार हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन लगातार अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में अतिक्रमण की कोशिशें कर रहा है, इसके बावजूद देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के साथ संवाद और मुलाकातों में व्यस्त दिखाई देती हैं।

कांग्रेस और बीजेपी पर समान आरोप

मुदगल ने कहा कि वर्ष 2008 में कांग्रेस द्वारा सीसीपी के साथ किया गया कथित गुप्त समझौता आज भी सवालों के घेरे में है। उनका आरोप है कि उस समय यह समझौता जनता से छिपाया गया और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता नहीं दी गई। उन्होंने दावा किया कि आज वही गलती भारतीय जनता पार्टी दोहरा रही है, जहां सीसीपी के प्रतिनिधिमंडलों के साथ बंद-दरवाज़े बैठकें की जा रही हैं।

  • 2008 में कांग्रेस-सीसीपी कथित गुप्त समझौता
  • वर्तमान में सीसीपी प्रतिनिधिमंडलों से बंद कमरे में मुलाकातें
  • सीमा पर तनाव के बावजूद “Courtesy Call” का तर्क

“Courtesy Call” या सत्ता का सौदा?

अर्पित मुदगल ने इन बैठकों को “Courtesy Call” बताए जाने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि असली प्रश्न यह है कि क्या यह केवल शिष्टाचार भेंट है या फिर सत्ता और राजनीतिक हितों का कोई गुप्त सौदा? उनका कहना था कि जब चीन की ओर से सीमा पर कब्ज़ा और दबाव जारी है, तब इस तरह की मुलाकातें देशवासियों के मन में संदेह पैदा करती हैं।

शहीदों के बलिदान पर राजनीति?

मुदगल ने तीखे शब्दों में पूछा कि जब सीमा पर भारतीय सैनिक शहीद हो रहे हैं, तब नेताओं की गुप्त बैठकों का क्या औचित्य है? क्या राष्ट्रीय सुरक्षा से बड़ा कोई राजनीतिक एजेंडा हो सकता है? उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि आखिर क्यों दोनों प्रमुख दल चीन के सामने नतमस्तक दिखाई देते हैं और स्पष्ट व कठोर नीति अपनाने से बचते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता की मांग

भारत-तिब्बत सहयोग मंच ने मांग की कि चीन से जुड़े हर प्रकार के राजनीतिक और कूटनीतिक संवाद में पूर्ण पारदर्शिता होनी चाहिए। संगठन का कहना है कि जनता को यह जानने का अधिकार है कि देश की सीमाओं और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर क्या बातचीत हो रही है और किन शर्तों पर हो रही है।

निष्कर्ष: जवाबदेही के बिना संवाद अस्वीकार्य

अर्पित मुदगल के बयान ने एक बार फिर भारत-चीन संबंधों में राजनीतिक दलों की भूमिका और पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है। जब सीमा पर हालात संवेदनशील हों और सैनिक बलिदान दे रहे हों, तब किसी भी स्तर पर गुप्त कूटनीति और अस्पष्ट संवाद देशहित के विरुद्ध माने जाएंगे। ऐसे में राष्ट्रीय सुरक्षा, स्पष्ट नीति और सार्वजनिक जवाबदेही की मांग और भी मजबूत हो जाती है।

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