Sunday, January 18, 2026
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भोपाल गोमांस कांड: 35 करोड़ का स्लॉटर हाउस बना अवैध गोमांस फैक्ट्री, ठेकेदार जेल में, सिस्टम सवालों से बाहर

भोपाल, ब्यूरो | वेब वार्ता

भोपाल गोमांस कांड: भोपाल का गोमांस कांड अब केवल अवैध मांस बरामदगी का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह 35 करोड़ रुपये की सरकारी परियोजना, प्रशासनिक निगरानी और संभावित संरक्षण तंत्र पर सीधा सवाल बन चुका है। 26 टन गोमांस की पुष्टि के बाद भी यदि कार्रवाई केवल एक ठेकेदार तक सीमित रहे, तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या पूरा सिस्टम जवाबदेही से बचाया जा रहा है?

35 करोड़ का स्लॉटर हाउस या अवैध गोमांस फैक्ट्री?

आधुनिक तकनीक, सरकारी निगरानी और नगर निगम की सीधी जिम्मेदारी वाले स्लॉटर हाउस से 26 टन गोमांस निकलना सामान्य घटना नहीं हो सकती। यह या तो घोर अक्षमता है या फिर संगठित संरक्षण। सवाल यह नहीं कि गोमांस मिला, सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर यह कैसे, कब और किसकी जानकारी में कटा?

ठेकेदार जेल में, लेकिन फैसले लेने वाले कहां?

ठेकेदार असलम कुरैशी उर्फ असलम चमड़ा की गिरफ्तारी के बाद प्रशासन ने राहत की सांस ली, लेकिन जनता के सवाल खत्म नहीं हुए। क्या 26 टन गोमांस केवल एक व्यक्ति की मर्जी से कट सकता है? निरीक्षण अधिकारी, निगम के जिम्मेदार विभाग और अनुमति देने वाली प्रणाली की भूमिका पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

  • निगम के निरीक्षण रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए?
  • सप्लाई चेन और स्टोरेज की जिम्मेदारी किसकी थी?
  • क्या ठेकेदार को जानबूझकर अकेला छोड़ा गया?

नारकोटिक्स टेस्ट की मांग क्यों डराती है सिस्टम को?

नारकोटिक्स टेस्ट की मांग इसलिए उठ रही है क्योंकि मामला केवल अवैध कटान का नहीं, बल्कि संभावित संगठित अपराध का संकेत देता है। यदि सब कुछ सामान्य था, तो वैज्ञानिक जांच से परहेज क्यों? यही चुप्पी अब प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर रही है।

FIR टली तो सड़क पर उतरेगा विरोध

राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने साफ कहा है कि यदि पूरे नेटवर्क पर एफआईआर दर्ज नहीं हुई, तो आंदोलन होगा। यह चेतावनी केवल राजनीति नहीं, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही तय करने की आखिरी कोशिश मानी जा रही है।

निष्कर्ष: सवाल गोमांस का नहीं, सिस्टम का है

भोपाल गोमांस कांड ने यह साफ कर दिया है कि समस्या केवल अवैध मांस नहीं, बल्कि वह सिस्टम है जो या तो अंधा बना रहा या फिर जानबूझकर चुप रहा। यदि अब भी पारदर्शी जांच नहीं हुई, तो यह मामला प्रशासनिक इतिहास में संरक्षण के प्रतीक के रूप में दर्ज होगा।

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