नई दिल्ली, राजनीतिक डेस्क | वेब वार्ता
उत्तर प्रदेश के एक और बंटवारे को लेकर पश्चिमी प्रदेश निर्माण की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। विकास और रोजगार को आधार बनाते हुए उत्तर प्रदेश के 27 जिलों को अलग कर पश्चिमी प्रदेश बनाने का एक प्रारूप तैयार किया गया है। इस संबंध में नई दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब में एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें केंद्र सरकार से औपचारिक रूप से इस मांग पर विचार करने की अपील की गई।
विकास और प्रशासनिक सुगमता को बताया आधार
बैठक को संबोधित करते हुए पूर्व सांसद एवं पश्चिम प्रदेश निर्माण मोर्चा के संयोजक डी. पी. यादव ने कहा कि बड़े राज्यों में आमजन को प्रशासनिक स्तर पर अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि राज्य का अत्यधिक विस्तार विकास योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बनता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि छोटे और प्रशासनिक रूप से संतुलित राज्य न केवल बेहतर शासन सुनिश्चित करते हैं, बल्कि स्थानीय जरूरतों के अनुसार योजनाओं को लागू करने में भी अधिक सक्षम होते हैं।
विभाजित राज्यों के उदाहरण किए पेश
डी. पी. यादव ने देश में पहले हुए राज्य विभाजनों का हवाला देते हुए कहा कि उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों के गठन के बाद वहां विकास की गति में उल्लेखनीय तेजी आई है।
उनका कहना था कि इन राज्यों में प्रशासनिक जवाबदेही, बुनियादी ढांचे का विकास और रोजगार के अवसर पहले की तुलना में कहीं बेहतर हुए हैं, जिससे आम नागरिकों को सीधा लाभ मिला।
27 जिलों को मिलाकर पश्चिमी प्रदेश का प्रस्ताव
बैठक में प्रस्ताव रखा गया कि उत्तर प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र के 27 जिलों को मिलाकर एक अलग राज्य बनाया जाए। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र औद्योगिक, कृषि और मानव संसाधन की दृष्टि से समृद्ध है, लेकिन बड़े राज्य का हिस्सा होने के कारण अपेक्षित विकास से वंचित रहा है।
- स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे
- औद्योगिक और कृषि विकास को मिलेगा बढ़ावा
- प्रशासनिक निर्णयों में तेजी आएगी
जनसंवाद के बाद तैयार किया गया प्रारूप
डी. पी. यादव ने स्पष्ट किया कि पश्चिमी प्रदेश की अवधारणा किसी एक व्यक्ति की सोच नहीं है। पश्चिम प्रदेश निर्माण मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने विभिन्न क्षेत्रों में जाकर जनसंवाद और विचार-विमर्श किया, जिसके बाद यह प्रारूप तैयार किया गया।
उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों की प्रमुख मांगें—जैसे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं—अलग राज्य बनने से अधिक प्रभावी ढंग से पूरी की जा सकती हैं।
बैठक में अनुपस्थिति भी रही चर्चा में
इस बैठक में पश्चिम प्रदेश निर्माण मोर्चा के संयोजक एवं पूर्व मंत्री चौधरी वीरेन्द्र सिंह की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय रही। हालांकि, आयोजकों की ओर से बताया गया कि आंदोलन और मांग की प्रक्रिया सामूहिक प्रयास के रूप में आगे बढ़ती रहेगी।
निष्कर्ष
पश्चिमी प्रदेश के गठन को लेकर उठी यह मांग उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक संरचना पर एक बार फिर बहस को तेज कर रही है। समर्थकों का मानना है कि राज्य का विभाजन विकास और रोजगार का मार्ग प्रशस्त करेगा, जबकि इस पर अंतिम निर्णय केंद्र सरकार और संसद के स्तर पर होना है। आने वाले समय में यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में बना रह सकता है।
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